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| वडाली बंधु कपिल के शो में |
उनके नए शो में कलाकारों की प्रस्तुति, उसके अतिथियों में, उसकी भाषा में और विषयवस्तु अभी में बहुत बदलाव आया है जो उन्हें फिर से नकलची होने से बचाता है और ये बताता है कि असल की ताकत बहुत बड़ी है।
खैर यहाँ बात उनके हाल में आए वडाली बंधु वाले एपिसोड की करते हैं। आम तौर मेरे जैसे संगीत प्रेमियों का वडाली बंधुओं से परिचय उनके गीतों से ही है। उनका 'तू माने या न माने दिलदारा' गाना मुझे कॉलेज के समय से पसंद है और नयी पीढ़ी के लखविंदर वडाली का 'चरखा' अभी कुछ समय पहले ही मन में बसा है। उनका गायक के अलावा एक आम इंसान के रूप में परिचय कपिल के सोनी पर आने के बाद ही हो पाया। उन्हें किस्सागोई करते, डांस करते देखना कितना नया है? मात्र चाय न पिलाने के कितने किस्से, सब स्मृति में समाने लायक।
सोनी पर आने के बाद कपिल का शो बॉलीवुड के परकोटे से बाहर आया है। उनके शो में अब बॉलीवुड फिल्मों के पब्लिक रिलेशन और प्रचार मंच से आगे बढ़ने की कसक दिख रही है। मराठी फिल्म 'सैराट' के कलाकारों को हिंदी के दर्शकों से रूबरू कराना अपने आप में बताता है कि कपिल की सोच में बदलाव आया है। मैं यह बात इसलिए भी लिख रहा हूँ क्योंकि कपिल इस शो के सह-निर्माता भी हैं।
सानिया मिर्जा और ड्वेन ब्रावो की बॉलीवुड सितारों के साथ जोड़ी बनाकर किया गया उनका प्रयोग स्पष्ट करता है कि वो असल करने में विश्वास करते हैं,नक़ल में नहीं। अब यूँ तो हम नवजोत सिंह सिद्धू को कई बरसों से हँसते देख रहे हैं लेकिन उनका परिवार कैसा है इसके बारे में हमें कपिल के शो ने ही बताया।
देखा जाए तो कपिल का शो अब ज्यादा मानवीय स्वरूप लिए हुए है। इससे पहले टीवी पर आए फारुख शेख के 'जीना इसी का नाम है' और ऋचा अनिरुद्ध के 'ज़िंदगी लाइव' जैसे टॉक शो ही मुझे याद हैं जिनके मूल में मानवीय संवेदनाएं हैं। 'जीना इसी का नाम है' में फिल्म, राजनीति, कारोबार, प्रशासन और खेल जगत से जुड़ी कई हस्तियां शामिल रही तो वहीं 'ज़िंदगी लाइव' में ये संवेदनाएं आम लोगों के जीवन संघर्ष से जुड़ गईं।
हालाँकि मेरा प्रयास यहाँ किसी भी प्रकार से इन सभी शो की तुलना करना नहीं है क्योंकि कपिल का शो अच्छा है लेकिन अभी भी इन दोनों शो के स्तर का नहीं है। चूँकि कपिल के शो में हास्य प्रधान है तो उसमें संवेदनाएं भी हल्के-फुल्के अंदाज वाली हैं, अब आप चाहें तो गोविंदा या राहत फ़तेह अली खान के शो को ही देख लें।
टीवी के लिए शेखर सुमन, सिमी ग्रेवाल, करण जौहर, रजत शर्मा और अनुपम खेर ने भी टॉक शो बनाए, लेकिन इनमें से अधिकतर या तो चकाचौंध भरे या उपदेशात्मक रहे। सितारों के जीवन की मानवीय संवेदनाएं इन शो में उतने अच्छे से उजागर ही नहीं हुई। इस जमात में आमिर खान का 'सत्यमेव जयते' और अमिताभ बच्चन का 'आज की रात है जिंदगी' भी शामिल किये जा सकते हैं लेकिन ये मूलतः टॉक शो नहीं थे।
वडाली बंधुओं वाला एपिसोड न सिर्फ कपिल को टाइप्ड होने से बचाता है बल्कि हमारा परिचय उस किस्सागोई से भी कराता है जो स्मार्टफोन की तकनीक और समाज से खत्म होते हास्य बोध से हमारे जूझने के बीच खत्म हो रही है। ये हमें वापस व्यक्तिवाद से सामाजिक बनने को प्रेरित करता है और हमारे जीवन के हर पहलू में घुस चुकी राजनीति से हमे थोड़ी देर के लिए दूर ले जाता है।
ज़रा सोचिये कि सिर्फ चाय न पिलाने जैसी बात पर कितनी बातें और कितने ठहाके इस शो में लगे। ये 'तारक मेहता का उल्टा चश्मा' के अंत में दावा किये जाने वाले ठहाकों से तो बेहतर ही है। छोटे शहरों में जब लाइट चली जाती थी तो लोग छत की मुंडेर पर बैठकर ऐसी ही किस्सागोई किया करते थे। खैर सरकार अब गांवों में भी 24 घंटे बिजली देने में लगी है तो पता नहीं भविष्य में भी ये वहां बचेगी या नहीं क्योंकि सार्वजानिक यात्रा का सामाजिक संवाद तो वैसे ही कान में ठुंसे हेडफोन खा गए। कितना विचित्र है कि हर सुविधा भी हमारे लिए नामाकूल ही है।
कपिल के शो की अंतिम बात जो मुझे पसंद है वो यह कि उसकी भाषा बिल्कुल सहज और जमीन से जुड़ी है। उसमें वही देसीपन है जो हमारे आपके बीच संवाद में होता है। वो बेड़ियों में वैसे नहीं बंधी है, जैसे कि "भाभी जी घर पर हैं' की भाषा में जकड़न है। कपिल में एक और जो बदलाव इस शो में दिख रहा है वो यह कि अब उनके ऊपर उनकी 'श्रेष्ठता' का अहम हावी नहीं है तभी तो वो सुनील ग्रोवर को पूरा मौका देते हैं और सुनील ग्रोवर जो कर रहे हैं उसकी चर्चा फिर कभी...
सोनी पर आने के बाद कपिल का शो बॉलीवुड के परकोटे से बाहर आया है। उनके शो में अब बॉलीवुड फिल्मों के पब्लिक रिलेशन और प्रचार मंच से आगे बढ़ने की कसक दिख रही है। मराठी फिल्म 'सैराट' के कलाकारों को हिंदी के दर्शकों से रूबरू कराना अपने आप में बताता है कि कपिल की सोच में बदलाव आया है। मैं यह बात इसलिए भी लिख रहा हूँ क्योंकि कपिल इस शो के सह-निर्माता भी हैं।
सानिया मिर्जा और ड्वेन ब्रावो की बॉलीवुड सितारों के साथ जोड़ी बनाकर किया गया उनका प्रयोग स्पष्ट करता है कि वो असल करने में विश्वास करते हैं,नक़ल में नहीं। अब यूँ तो हम नवजोत सिंह सिद्धू को कई बरसों से हँसते देख रहे हैं लेकिन उनका परिवार कैसा है इसके बारे में हमें कपिल के शो ने ही बताया।
देखा जाए तो कपिल का शो अब ज्यादा मानवीय स्वरूप लिए हुए है। इससे पहले टीवी पर आए फारुख शेख के 'जीना इसी का नाम है' और ऋचा अनिरुद्ध के 'ज़िंदगी लाइव' जैसे टॉक शो ही मुझे याद हैं जिनके मूल में मानवीय संवेदनाएं हैं। 'जीना इसी का नाम है' में फिल्म, राजनीति, कारोबार, प्रशासन और खेल जगत से जुड़ी कई हस्तियां शामिल रही तो वहीं 'ज़िंदगी लाइव' में ये संवेदनाएं आम लोगों के जीवन संघर्ष से जुड़ गईं।
हालाँकि मेरा प्रयास यहाँ किसी भी प्रकार से इन सभी शो की तुलना करना नहीं है क्योंकि कपिल का शो अच्छा है लेकिन अभी भी इन दोनों शो के स्तर का नहीं है। चूँकि कपिल के शो में हास्य प्रधान है तो उसमें संवेदनाएं भी हल्के-फुल्के अंदाज वाली हैं, अब आप चाहें तो गोविंदा या राहत फ़तेह अली खान के शो को ही देख लें।
टीवी के लिए शेखर सुमन, सिमी ग्रेवाल, करण जौहर, रजत शर्मा और अनुपम खेर ने भी टॉक शो बनाए, लेकिन इनमें से अधिकतर या तो चकाचौंध भरे या उपदेशात्मक रहे। सितारों के जीवन की मानवीय संवेदनाएं इन शो में उतने अच्छे से उजागर ही नहीं हुई। इस जमात में आमिर खान का 'सत्यमेव जयते' और अमिताभ बच्चन का 'आज की रात है जिंदगी' भी शामिल किये जा सकते हैं लेकिन ये मूलतः टॉक शो नहीं थे।
वडाली बंधुओं वाला एपिसोड न सिर्फ कपिल को टाइप्ड होने से बचाता है बल्कि हमारा परिचय उस किस्सागोई से भी कराता है जो स्मार्टफोन की तकनीक और समाज से खत्म होते हास्य बोध से हमारे जूझने के बीच खत्म हो रही है। ये हमें वापस व्यक्तिवाद से सामाजिक बनने को प्रेरित करता है और हमारे जीवन के हर पहलू में घुस चुकी राजनीति से हमे थोड़ी देर के लिए दूर ले जाता है।
ज़रा सोचिये कि सिर्फ चाय न पिलाने जैसी बात पर कितनी बातें और कितने ठहाके इस शो में लगे। ये 'तारक मेहता का उल्टा चश्मा' के अंत में दावा किये जाने वाले ठहाकों से तो बेहतर ही है। छोटे शहरों में जब लाइट चली जाती थी तो लोग छत की मुंडेर पर बैठकर ऐसी ही किस्सागोई किया करते थे। खैर सरकार अब गांवों में भी 24 घंटे बिजली देने में लगी है तो पता नहीं भविष्य में भी ये वहां बचेगी या नहीं क्योंकि सार्वजानिक यात्रा का सामाजिक संवाद तो वैसे ही कान में ठुंसे हेडफोन खा गए। कितना विचित्र है कि हर सुविधा भी हमारे लिए नामाकूल ही है।
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| सुनील और कपिल |


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