गुरुवार, 18 जुलाई 2013

गाइड से दामुल के बीच

पिछले कुछ दिनों में कुछ ऐसी फ़िल्में देखी, जिनका नाम बहुत सुना था और देखने की इच्छा थी। गॉडमदर, दामुल,गाइड… और भी बहुत पर अभी यहाँ सिर्फ दो ही की बात करना मुनासिब समझता हूँ, हो सकता है कि फिलहाल देखी हुई सभी फिल्मों में से इन दोनों से मैं थोडा प्रभावित हुआ हूँ या ये भी हो सकता है कि कंही मेरी उम्मीद इनसे बहुत ज्यादा थी। खैर जो भी हो यहाँ हम अब शुरू भी करते हैं क्यूंकि भारत में दर्शन तो कोई भी पढ़-पढ़ा सकता है।

बात करते हैं विजय आनंद की गाइड और प्रकाश झा की दामुल की। दोनों कहानियों में पूरे बीस साल का फर्क है जैसे पूरी पीढ़ी ही बदल गयी हो लेकिन फ़िल्में उतनी बदली नज़र नहीं आई। बात शुरू करते हैं गाइड से, पता नहीं क्यों मुझे इस फिल्म का क्लाइमेक्स कुछ अटपटा सा लगा ये समझ से परे लगता है कि नायक क्या कहना चाहता है, वो लोगों को जीने का फलसफा बता रहा है या उनके अन्धविश्वास को बढ़ा रहा है। अब चाहे तो कुछ लोग आक्षेप लगा सकते हैं कि मेरी समझ कम है किन्तु यहाँ पूरी फिल्म गुजरने के बाद लगता है कि मनुष्य को मोक्ष कैसे प्राप्त करना है यही बताया गया हो लेकिन रास्ता क्या है-अन्धविश्वास का। गाइड में किसान सूखे से मर रहा है और यहाँ नायक उनके नाम पर अपने मोक्ष का रास्ता तैयार कर रहा है। गाइड का दौर वो था जब देश घिरा था युद्ध की त्रासदी से और खुद देश का प्रधानमंत्री उपवास की अपील कर रहा था लेकिन वो बात कम से कम तार्किक थी अन्धविश्वासी नहीं। पर यहाँ उपवास के मायने कुछ और नज़र आते हैं, जिस बात का मुझे बुरा लगा कि क्या वाकई उस दौर में भारतीय नायक इतना कमजोर था की लोगों की आस्था के सामने उसका समझाना, जगाना और तर्क करना बेमानी था। वो बात अलग है कि अब हमारा नेतृत्व कुतर्क ही करता है पर चलो तब कम से कम किसान के पास आस्था और अन्धविश्वास का सहारा था ये संदेसा हम तक फिल्म से पहुँच जाता है।
अब कहानी को मैं भी सीरियल किलर की तरह बीस साल आगे धकेल के दामुल पर पहुँचता हूँ। तुलना तो मैं दोनों की नहीं करने वाला हूँ क्यूंकि दोनों का समय और कहानी अलग है, बस अपनी ही बात है जो कहनी है। दामुल में हमारा नायक थोडा सधा नजर आता है हो सकता है ये उस दौर का असर हो क्यूंकि 65 में हम नौसिखिये थे लेकिन 85 में तो हम बाप हो गए। लेकिन यहाँ नायक मजबूर किसान है जहाँ गाइड का किसान अन्धविश्वास का सहारे पर जिंदा है वंही हमारे पुनाई का बेटा थोडा यथार्थ में जीता है तभी तो चोरी से लेकर मर्डरवा तक कर देता है सब कर्जा के चक्कर में, वो भी वो जो वो लिया ही नहीं। किसान परेशान यहाँ भी है लेकिन वो अंत तक आते-आते कम से लड़ने की सोचता है ये अच्छा लगा न कि भगवान और भाग्य विधाता के भरोसे में खड़ा जन-गण बना रहता है वो बात अलग है कि किसान अब बीस साल बाद भी जूझ ही रहा होता है, हाँ हमारी तरक्की इतनी हो जाती है कि बाढ़, सूखे से मरने वाले किसान को हम अब क़र्ज़ से भी मारने पे तुले होते हैं और भगवान नाम का सहारा भी छीन चुके होते हैं।
वैसे आज इन बातों का कोई मतलब तो नहीं बनता क्यूंकि ज़माना चिल्ला रहा है कि वो बदल गया है, बस बदला नहीं तो बाढ़-सूखा और कर्जा। पर मेरे चिल्लाने से भी क्या बदलने वाला है बस मिअन तो कुछ कह रहा था तो कह दिया।

गुरुवार, 11 अप्रैल 2013

संवेदनाओं का प्रचार


भा रत में घटने वाली घटनाओं का भी अपना एक मौजूं मिजाज है पता नहीं किस बात से बिगड़ जाएँ या न जाने किस बात से उत्सव का माहौल रच डालें। अब हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने संजय दत्त को सजा क्या सुनाई हंगामा ही बरपा गया। बात-बेबात एक बहस छिड़ गई कि इस देश में कानून के कितने दर्जे हैं ? क्या ये भी  बाज़ार की तरह उच्च, मध्यम और निम्न दर्जे के लिए अलग-अलग तरह से व्यव्हार करता है। हम तो बचपन से यही पढ़ते आये कि कानून का दर्जा सर्वोच्च है।

खैर बात अगर यंही ख़त्म हो जाती तब भी ठीक था इस व्यवधान ने हमें यह भी आभास कराया कि हमारे यहाँ मानवतावादियों की एक पूरी की पूरी पलटन खड़ी है। ऐसी ही फ़ौज थोड़े दिन पहले अफजल गुरु को फांसी मिलने के दौरान भी मोर्चाबंद दी थी। मैं हैरान हूँ जानकार कि  इतने मानवीय वकील होने के बाद भी देश में गोधरा, पंजाब, कश्मीर और भोपाल के पीड़ितों को न्याय कैसे नहीं मिल सका। जरुर दोष उन पीड़ितों का ही है जो कि इन लोगों तक पहुँच ही नहीं सके जो उन्हें न्याय दिला सके।

इस घटना ने एक और बढ़िया काम किया भारत को एक नया संवेदनाओं का उत्सव प्रदान किया। संजय को काटजू से लेकर बालन तक सब की संवेदनाएं प्राप्त हुई। वो भले ही कहते रहे "मामू इस बार दिल जेल जाना मांगता है।" पर लोग हैं कि उन्हें "माफ़ी की झप्पी" ही देते रहे।

दरअसल यह सारी कवायद संजय के उस प्रचार कद के कारण हुई जो उन्होंने खुद बनाया और थोडा बहुत विरासत में मिला। पिता सुनील एक बड़े अभिनेता और राजनेता रहे, बहन प्रिया एक सफल कॉंग्रेसी हैं और संजय खुद समाजवादी बनने को आतुर। तो संवेदनाओं का भंडार तो घर पहुंचना ही था। अब अमर और जयाप्रदा को ही लें वो तो समाजवादियों से जले-भुने बैठे हैं तो राख के ढेर को झाड़ने का इससे अच्छा अवसर कहाँ मिलता। वैसे मैं उन्हें इस संवेदना उत्सव को मनाने वालो में अव्वल मानता हूँ, बेचारे काटजू कहते ही रहे कि वो राज्यपाल के पास जायेंगे लेकिन ये दोनों तो पहुँच भी गए अर्जी लेकर बिना यह जाने कि राज्यपाल  माफ़ी देने के काबिल ही नहीं हैं।

वकील अपनी संवेदनाएं और तर्क से अपनी वकालत चमकाने का ही जुगाड़ करते रहे और फ़िल्मी कलाकारों का ऐसा करना होड़ की भागदौड़ करना था। कुछ तो ऐसे भी नज़र आये जिन्हें देख जनता भी सोच में पड़ गयी कि बाप रे ये लोग अभी भी मायानगरी में टिके हैं। वैसे इस चिल्लम बाज़ार को देख कर एक किस्सा याद आ गया।

"हमारे क्षेत्र में शर्मा जी वकील थे जिन्होंने जनता की सेवा करने के लिए पार्षद से लेकर सांसद तक का चुनाव लड़ा। भले ही वो एक भी चुनाव आज तक नहीं जीते लेकिन इन चुनावों के बहाने प्रचार हुआ और उनकी ख्याति दूर-दूर तक के गाँव में हो गई और उनकी वकालत चमक गई।"

वर्तमान प्रचार का दास हो चुका है और संजय बाबा फिलहाल संवेदनाओं के। इस दासता का बोझ इतना बढ़ गया की उन्हें रो-रो कर दुहाई देनी पड़ी कि बंद करो माफ़ी की झप्पी देना और जाने दो उन्हें जेल। क्यूंकि शायद वे भी बखूबी जानते हैं कि ये उनके प्रति लोगों की सहानुभूति नहीं बल्कि लोगों की खुद की "संवेदनाओं का प्रचार" है।

शुक्रवार, 22 फ़रवरी 2013

अब तो हर काम से डर लगता है !

जकल तो घर से बाहर निकलने में भी डर लगता है कि कंही किसी कीड़े-मकौड़े , चींटा-चींटी का कुछ आहत न हो जाये। इसीलिए अभी जब तक सर्दी है तो कम्बल में दुबक ले जब गर्मी आएगी तो सो जाएँगे चादर तान के वैसे भी बचा क्या है इस देश में करने को, अब हमारे होने वाले ष्महाराजष् जनता के सुख के लिए जहर पीने जा रहे हैं और "राजमाता" हैं की अपने बेटे के इस बलिदान को देखकर रोने के लिए कंधा ढूंढ़ रही हैं। वैसे महाराज जब "युवराज" थे तो देश के गरीबों के घर जा जाकर अपना सालाना बहादुरी करतब दिखाया करते थे और रेल से घूम-घूम कर उन्होंने रेलवे का ही बेडा गर्क कर दिया अब ये नया तमाशा उससे आगे की कहानी है। एक और हैं इस देश में "विकासपुरुष" जो इसी उधेड़ बुन में हैं की वो महाराज की गद्दी पर बैठ पाएंगे या नहीं या उनके घर वाले ही उनकी इस ख़्वाबी लंका की लुटिया डुबो देंगे।

मैं तो खुद वैसे ही हैरान हूँ अगर मैं महाराज के लिए कुछ बोलू तो सामन्ती बन जाता हूँ और अगर विकासपुरुष के लिए कुछ कहूँ तो सांप्रदायिक। अब इन्हें कौन समझाए की मुझ जैसा आम आदमी यहाँ दो वक़्त की रोटी के जुगाड़ में ही उलझा पड़ा है और ये हैं की मुझ गरीब पे ही पिले पड़े हैं। इनकी और इनके चाटुकारों की नौटंकी की तो आदत सी हो गयी है लेकिन कमाल तो तब हो गया जब छोटे-छोटे झुण्ड के लोग बात-बात पर अपनी भावनाए भड़काकर जहाँ जाऊं वहां चले आते हैं धमकाने। अब जब सब आहत हुए तो मैं भी थोडा आहत होकर इस खोज में लग गया कि क्या कुछ ऐसा भी बचा है इस देश में जिससे कोई आहत न होता हो इसी बहाने मैं इन मुगालतों से भी बाख जाऊंगा और एक बढ़िया शोध भी हो जायेगा।

विषय जटिल जरुर है लेकिन नामुमकिन नहीं तो मैंने पहला प्रयास तो ये किया कि  ये पता लगाया जाये की ऐसी भावनाएं कितने प्रकार की हैं जो आहत हो जाती हैं खैर ये बड़ा स्तर है अगर इस शोध हो तो पूरा देश डॉक्टरेट हो जाये।  मैं अभी प्रयास में लगा हूँ कि आहत न होने के लिए क्या बचा है तो सोचा विश्विद्यालय से अच्छा क्या होगा इस काम के लिए तो जब वहां पहुंचा तो देखा द्वार पे ही राम-सीता खुद ही आहत मिल गए मैं तो उलटे पाँव लौट आया  । फिर सोचा शायद कला क्षेत्र से कुछ मिल सकता है तो पहुंचा मैं नीलीनगरी में तो वहां तो "दीदी" की भावनाएं आग उगल रही थीं कला से ही डरने लगा अच्छा हुआ छोड़ दिया उसे भी वरना अभी यहाँ शहरों के शहर में खामखा पिट-पिटा  जाता यहाँ तो तलवार वाली बहुत सारी दीदियाँ थीं।

फिर ख्याल आया की फिल्मे समाज का आइना होती हैं तो उन्हें भी एक बार टटोल लिया जाये लेकिन वहां तो कपडे कंट -छंट के उतरने की नौबत आ गयी। अब बेचारा साहित्य ही था किन्तु यहाँ पर लोग अपनी भावनाएं आहत रखने में गिनीज का रिकॉर्ड बना चुके हैं 20 साल से आहत बैठे हैं और जब साहित्य वालों ने सोचा कि चलो बिसरी बातें भुलाकर कुछ आधुनिक टीमटाम  जुटाकर बहस कराइ जाये तो बेचारे समाज के सेवक को ही थाने ले गए अपनी भावनाएं आहत करके। खैर इस आधुनिकता का भी खेल निराला ही लगा मुझे आप अब फेसबुक पर कुछ लिखो तो शहरी शेरों की सेना आपके पीछे पड़  जाएगी और ट्विटर पर तो सरकारी पंडित राहु-केतु की दशा लगाये बैठे हैं। अब अंततः संगीत में कुछ  उम्मीद थी लेकिन पता नहीं कानों की इस घाटी में वो फिर कब सुना जायेगा।

खैर मैं अभी लगा हूँ प्रयास में अगर आप सुधी पाठको, जो इससे आहत न हुए हों उन्हें कोई विषय मिले तो बताएं जरुर मेरी मेहनत  कुछ कम हो जाएगी और थोडा आराम भी हो जायेगा।