रविवार, 10 नवंबर 2013

कौड़ियों के दाम

 अक्सर इस मुहावरे को हम अपने जीवन में इस्तेमाल करते रहते हैं और इसका मतलब भी साफ़ होता है कि ऐसी कोई वस्तु जिसका कोई मोल नहीं। लेकिन इस बार दीवाली पर मैं जब घर गया तो कुछ अनुभव हुआ कि नहीं कौड़ियों के भी कुछ दाम होते हैं।

कौड़ियाँ 
 व्यापारिक परिवार से होने के कारण हमारे यहाँ दीवाली पूजन का बड़ा ही महत्त्व है और दुकान पर पूजा करने से पहले हमारे यहाँ गद्दी को गोबर से लीप करके उस पर 7 कौड़ियों से खेलने की परम्परा है जिसमें से 3 कौड़ियों का खुली हुई तरफ से आना शुभ माना जाता है। इस बार पिताजी से दीवाली की तैयारियों में कुछ एक कौड़ियां टूट गयी जिसके चलते आदेश हुआ कि अब बाज़ार से पूजन सामग्री के साथ कौड़ियां भी लानी होंगी।

 जब मैं पंसारी की दुकान से सारी सामग्री बंधवा रहा था तो मेरी नज़र उसके द्वारा लिख जाने वाले दामों पर गयी और यकीन मानिये कौड़ियों के दाम देखकर मैं दंग रह गया। अब तक तो मैं सोचता था कि सब्ज़ी और रोजमर्रा की वस्तुओं के दामों में आने वाली बढ़त ही मुख्य महंगाई हो सकती है क्यूंकि यह सीधे तौर पर आपके दैनिक बजट को गड़बड़ा देती है लेकिन कौड़ियों का तो आज कोई खास प्रयोग भी नहीं सिर्फ ऐसी ही कुछ रस्मों-रिवाजों का अंग बची है फिर उसके दामों को क्या हो गया, आप विश्वास नहीं करेंगे कौड़ियां 15 रुपये की 10 मिली। तब वाकई लगा कि आज के ज़माने में आदमी की किसी बात का दाम भले ही न हो लेकिन कौड़ियों के दाम जरुर हैं, तो ज़रा अगली बार किसी से यह बात कहने से पहले सोच लीजियेगा कि कौड़ियों के भी दाम होते हैं।

गुरुवार, 10 अक्टूबर 2013

बीरबल के मयखाने से

बीरबल-अकबर-मुल्ला जी
जकल रात को खाना खाने के बाद थोड़ा छत पर टहलने चला जाता हूँ और इसी बहाने इमारत में रहने वाले बाकी लोगों से मिलना-जुलना हो जाता है। हमारे मकान के मालिक से भी बातचीत हो जाती है, वो दिल्ली पर्यटन विभाग में काम करते हैं तो अक्सर मदिरा से जुड़े कई रोचक किस्से कह जाते हैं। ऐसा ही एक किस्सा अकबर-बीरबल का भी उन्होंने सुनाया जो संदेशपूर्ण प्राप्त हुआ तो साझा कर रहा हूँ।
"एक बार की बात है अकबर के दरबार में मुल्ला दो प्याज़ा आये और बोले कि जहाँपनाह क्या आपको पता है कि बीरबल शराब पीते हैं ? अकबर ने उन्हें फटकारते हुए कहा कि आप यूँही बीरबल से जलते हैं इसीलिए उसके बारे में ऐसी-वैसी खबरे उड़ाते रहते हैं। जाइये अपना काम कीजिये, बीरबल तो गऊ आदमी है, वो ऐसा कैसे कर सकता है ?
इस पर मुल्ला दो प्याज़ा बोले कहें तो जनाब को बीरबल की इस जुर्रत के दर्शन करा सकता हूँ। इस प्रकार अकबर तैयार हो गया और साँझ के समय दोनों बीरबल के घर के बाहर झरोखे से बीरबल का कार्यक्रम देखने लगे।
बीरबल वहां एक मेज पर अपना मयखाना सजाकर बैठा था और उसने अपना पहला जाम बनाया और प्याले से कुछ कहने लगा। अकबर, मुल्ला दो प्याज़ा के साथ बाहर झरोखे से सब देख और सुन रहे थे।
बीरबल अपने प्याले से -'ए शाम ए सुहानी घटा में मेरी मदिरा ये बता कि अगर मैं तुझे पियूँ तो तू मुझे क्या देगी?'
मदिरा-'अगर तू मुझे पिएगा तो मैं तुझे दिन भर की थकान से आराम दूंगी।'
बीरबल-'तू मुझे पक्का आराम देगी !'
मदिरा-'हाँ !'
बीरबल घुड़क-घुड़क जाम पी लेता है और दूसरा जाम बना कर उसे उसी तरह हाथ में लेकर फिर से कुछ पूछने लगता है और बाहर झरोखे से अकबर ये सब देख के लाल-पीला हो रहा होता है। बीरबल फिर से अपनी मदिरा से-
बीरबल-'ए जन्नते जहाँ अब अगर मैं तुझे पियूँ तो तू मुझे क्या देगी?'
मदिरा-'अब तू मुझे पिएगा तो मैं तुझे सारे तनाव से मुक्ति दूंगी और तेरे दिमाग को शांत कर तेरी शाम सुकून से भर दूंगी।'
बीरबल-'तू ऐसा करेगी !'
मदिरा-'बिल्कुल !'
बीरबल इस बार भी सारा जाम पी जाता है। अकबर ये सब देख रहा होता है और उसके सब्र का बांध टूट रहा होता है। लेकिन बीरबल अब तीसरा जाम भी बना लेता है और उससे फिर बात करने लगता है।
बीरबल-'ए महबूब सी सुन्दर मेरी जानेमन अब मैं तुझे अपने अधरों से छूऊँ तो बता तू मुझे क्या देगी।'
मदिरा-'मेरी जाने बहार अब अगर तू मुझे अपने होठों के नजदीक लाया तो तू मुझे नहीं पिएगा बल्कि मैं तुझे पियूंगी।'
इसपर बीरबल एकदम से आवेश में आ जाता है और कहता है-'तेरी ये मजाल कि तू मुझे पीयेगी !'
और इसके बाद बीरबल प्याले को हाथ से झटक देता है और सारे मयखाने को हटाकर सो जाता है।
ये देखकर अकबर का सार गुस्सा काफूर हो जाता है और वो मुल्ला दो प्याज़ा से मुखातिब होते हुए कहता है कि देखा मुल्ला साहब 'बीरबल शराब नहीं पीता !'

रविवार, 29 सितंबर 2013

खाऊ देश के लोगों के खाने का जुगाड़

 हम लोग खाने वाले लोग हैं और इसी वजह से ही हमारी सरकार, जनता सब दिन-रात खाने की ही सोचते रहते हैं।कई बार हम से कुछ लोग इतना खा लेते हैं कि जरुरतमंदों तक खाना नहीं पहुँच पाता और इससे फिर सरकार को उनके खाने की भी चिंता होती है। अब देखो न सरकार ने हमारे देश की सत्तर प्रतिशत जनता के खाने का जुगाड़ किया है। अध्यादेश तो सरकार ले आई लेकिन वास्तव में ये किसके खाने का प्रबंध है ये जानना बाकी है।
कृष्ण-सुदामा
 श्रीकृष्ण वाले इस प्रसंग की विभिन्न व्याख्याएं हो सकती हैं लेकिन वर्तमान परिप्रेक्ष्य में यह परंपरा हमारे लिए और सरकार के लिए एक विकराल समस्या का रूप लेती जा रही है और आने वाले समय में यह और भी घातक हो जाएगी। खैर अब बात करते हैं की इस अध्यादेश से किसके खाने का प्रबंध होगा ? खाऊ देश के लोगों के खाने का जुगाड़ है यह बिल। सरकार को कम से कम चिंता तो है कि गरीबों के पेट में खाना पहुंचे लेकिन ये तो सभी जानते हैं कि खाना जनता के पास थोड़े ही पहुंचेगा बल्कि हम आदत से बेइमान लोगों के बीच से गए अधिकारिओं, नेताओं और पता नहीं किन-किन दलालों और राशन की दुकानों वालों के पास पहुंचेगा। तभी तो सरकार ने सोचा कि क्यूँ न गरीबों को इसके पैसे ही दे दिए जाएँ और वो खुद ही बाज़ार से सामान खरीद के खा ले, लेकिन हम ठहरे आदत से मजबूर हैं जिस काम के लिए बोल जाये उसे कैसे कर सकते हैं हम उसे छोड़ के सब करते हैं तो फिर खाने के पैसे हम भारतीय दारु और जुए में नहीं खर्च करेंगे इसकी गारंटी कैसे दे सकते हैं ?
साभार-सतीश जी

 गरीबों को जो काम हमने दिया वो कुछ समय बाद उन्हें बेकार और बेगार दोनों का ही मरीज बना देगा। हमने उन्हें कुछ सिखाने का काम थोड़े ही किया और हमने इस व्यवस्था को कायम कर उनके अन्दर की प्रतियोगिता की भावना को भी ख़त्म किया और अब खाना देकर हम उन्हें नाकारा बनाने का भी जुगाड़ करने जा रहे हैं और कुछ लोगों के खाऊ होने की आदत को हम इतना बढ़ावा दिए जा रहे हैं कि आने वाले दिनों में उनको होने वाले मोटापे और उससे होने वाली बीमारियों के इलाज़ का जुगाड़ करने की भी जिम्मेदारी उठानी पड़ेगी।

 क्या यह अच्छा नहीं होता कि हम उन्हें काम देते और नए काम करने के काबिल बनाते और उन्हें इज्जत से रहना सिखाते ताकि भविष्य में किसी भी स्थिति में वो जी सकें। क्यूंकि ये खाना जो उनके लिए जुटाया जा रहा है इस व्यवस्था में तो उन्हें नसीब होने से रहा। 
 लेकिन अब क्या करें हमें अपने कुछ बड़े लोगों के खाने का जुगाड़ तो करना ही था नहीं तो वो बेचारे और भुखमरी से मर जाते। अध्यादेश तो सब के खाने के लिए है लेकिन देखते हैं कि कौन-कौन सी मछली को दाना नसीब होता है क्यूंकि वो कहावत है न कि दाने-दाने पर लिखा है खाने वाले का नाम।

 हम लोग वैसे भी गरीबों को काम तो देते नहीं हाँ खाना जरुर दे देते हैं। वैसे इस बात के लिए मैं पूरी तरह श्रीकृष्ण को दोषी मानता हूँ, आखिर जब सुदामा उनके पास कुछ अपेक्षा लेकर आया था तो मित्र के नाते उन्होंने उसे काम क्यों नहीं दिया बल्कि मुफ्त में सब सुख-सुविधाएँ उसे देकर सम्पूर्ण भारत के आने वाली पीढ़ियों के लिए गलत परंपरा का प्रतिपादन किया। अगर वो उसे काम देते तो कम से वो अपने और अपने परिवार के लिए कुछ सार्थक कार्य करते और नवीन संभावनाओं का निर्माण होता किन्तु ऐसा नहीं हुआ और हमारे बीज में ही भीख मांगना, खाना देना जैसी परंपरा का विकास हुआ जिस वजह से हमने अपने लोगों को एक लम्बे समय में कामचोर बनाने को प्रशिक्षित किया।

 और बेचारे हमारे अधिकारी, राशन वाले, नेता और दलाल सब इस व्यवस्था के धनात्मक शिकार हैं तभी तो वो इतना माल गटक के भी डकार नहीं लेते। इसमें तो उनके नाम गिनीज बुक रिकॉर्ड है "द वर्ल्ड मोस्ट कलेक्टिव ईटिंग रिकॉर्ड"। खाऊ लोगों के पास इसका तो हक बनता ही है और वैसे भी हमारे खाने की आदत से तो अमेरिका का राष्ट्रपति भी परेशान है।