मंगलवार, 13 सितंबर 2016

दो रूपये का प्लेटफाॅर्म टिकट

 स दिन मैंने उसके लिए सिर्फ एक दो रूपये का प्लेटफाॅर्म टिकट ही तो खरीदा था बस, आठ साल करीब बीत चुके हैं इस घटना को। वो टिकट भी मैंने उसके लिए सिर्फ इसलिए लिया क्योंकि उसके पास खुले रूपये नहीं थे और उसे एक रिश्तेदार को गाड़ी में बिठाने जाना था। इसके अलावा हमारी कोई जान-पहचान नहीं थी तब।

 वो अपनी बुआ को छोड़ने आया था। उनकी और मेरी सीट आस-पास ही थी तो इस वजह से मेरी और जतिन की गाड़ी में ही थोड़ी बातचीत हुई। फिर जब ट्रेन चलने लगी तो वो मुझसे यह कहकर चला गया कि बुआजी को ग्वालियर उतारकर मैं उसे फोन कर दूं। मैंने ऐसा ही किया और उसके बाद बात आयी-गयी हो गई।

 उसके बाद मेरी और जतिन की एक-दो बार और बातचीत हुई। फिर एक बार वो राजौरी गार्डन में मेरी किराये की कोठी पर मिलने भी आया और उसके बाद हम अपने काम-धाम में व्यस्त हो गए। बस फेसबुक पर हमारी कभी-कभी राम-राम हो जाती थी, इससे ज्यादा मिलना-जुलना हो नहीं पाया।

 वैसे भी जतिन पुणे, कतर और भी ना जाने कहां-कहां काम के सिलसिले में गया तो मुलाकात तो वैसे भी संभव नहीं हो पायी। एक बार जतिन जब कतर से लौटकर आया तो ग्वालियर जाने से पहले उसने नयी दिल्ली स्टेशन पर मिलने के लिए बोला और मैं बस समय निकालकर पहुंच गया। उसके बाद हमारी करीब तीन साल बाद मुलाकात एक सफर में हुई जब मैं झांसी अपने घर और वो ग्वालियर अपने घर जा रहा था।

 आज मैं जब यह वृतांत लिख रहा हूं तो यह ख्याल मन में आ रहा है कि पिछले आठ सालों में हमारे बीच कुछ भी अनोखा नहीं घटा और एक सामान्य जान-पहचान का रिश्ता ही रहा। लेकिन फिर भी एक अलग तरह की घनिष्ठता है इस संबंध में, कम से कम मेरी ओर से तो है और जब मैं इसके पीछे की वजह टटोलता हूं तो मुझे लगता है कि इस दौरान शायद हमने आपस में एक-दूसरे से किसी भी तरह की कोई अपेक्षा नहीं रखी।

 आजकल के समय में संबंधों में अपेक्षाओं का बड़ा जंजाल देखने को मिलता है। दोस्ती से इतर वाले संबंधों में तो यह बड़े पैमाने पर दिखता है।

 जतिन और मेरे बीच सिर्फ सम्मान का भाव है, एक-दूसरे के व्यवहार के प्रति सम्मान। अपेक्षाएं कुछ भी नहीं, कम से कम मेरी ओर से तो बिल्कुल भी नहीं और शायद इसलिए यह मित्रता कायम है।
हमारे बीच आपस में कोई डबल स्टैंडर्ड नहीं है। एक-दूसरे को उसी रूप में स्वीकारते हैं क्योंकि वैसे भी हम मनुष्य हैं, मशीन नहीं कि एक जैसे सब हो जाएं। मेरे लिए वह वैसा ही दोस्त रहा जैसे कि मेरे कुछ और दोस्त हैं और शायद उसकी ओर से भी यही बात रही।

 शायद हम दोनों को यह भी समझ है कि किसी संबंध में प्रगाढ़ता के लिए जरूरी नहीं कि रोज बातचीत की जाए या अक्सर मुलाकात की जाए, हां लेकिन संबंधों में विश्वास बनाए रखा जाए।

 आज यह बात इसलिए लिख रहा हूं क्योंकि कुछ दिन पहले किसी से संबंधों के बारे में चर्चा हो रही थी तो मैंने उसे यह उदाहरण दिया कि संबंध को निभाना होता है वह भी निष्काम भाव से और उसे अपेक्षाओं से जितना दूर रखो उतना बेहतर वह होगा। बस अपना आत्मसम्मान बनाए रखो और दूसरे को बराबरी का सम्मान देते रहो। संबंध कभी खराब नहीं होंगे।

 अब जतिन से मेरी आखिरी मुलाकात और बातचीत उसके विवाह पर हुई थी। छह माह से ज्यादा हो चुके हैं और उसके परिवार से उस दौरान मैं पहली बार मिला था। पहली बार में उन्होंने जो सम्मान और आदर दिया बस इस दोस्ती में वह काफी है।

 अब यह दो रूपये का प्लेटफाॅर्म टिकट सरकार ने भले दस रूपये का कर दिया हो लेकिन उसकी वजह से जतिन की अच्छी दोस्ती फिलहाल मेरे पास है और दुआ है कि आगे भी बनी रहेगी। बाकी देखते हैं कि अब अगली मुलाकात कब होती है।

सोमवार, 15 अगस्त 2016

पुलिस का एक रूप ये भी

 यूँ तो ये एक किस्सा भर है लेकिन हकीकत में यह उस बदलाव को दिखाता है जो व्यवस्था में आ रहा है।

अब ऐसा नहीं हो तो बेहतर है
 पिछले दिनों मैं अपने चाचा को छोड़ने नयी दिल्ली रेलवे स्टेशन गया था तो एक बात ने मेरा ध्यान खींचा। रेलवे स्टेशन पर फुटओवर ब्रिज से मैंने देखा कि लोग एक लंबी लाइन लगाकर ट्रेन आने का इंतज़ार कर रहे हैं। मालूम करने पर पता चला कि यह ट्रेन के जनरल डब्बे में सवारी करने वाले यात्रियों की लाइन है जो एक-एक करके उस डब्बे में चढ़ने की तैयारी में खड़े हैं।

 जिन लोगों ने कभी भी भारतीय रेल में जनरल डब्बे से यात्रा की है तो उन्हें पता होगा कि इस डब्बे में घुसना किसी जंग जीतने से कम नहीं है और बिहार जाने वाले मेरे साथियों के लिए यह विश्वयुद्ध के समान होता है। यह हमारी व्यवस्था की खामी है कि हमारी अधिकांश आबादी हमारी योजनायों का हिस्सा नहीं और अगर है भी तो उन योजनाओं में भारतीयता की निहायत कमी है। 

 भारत में अक्सर लोग बिना किसी पूर्व योजना के यात्रा करते हैं। इसलिए रेलवे में तत्काल वाली व्यवस्था बिलकुल हिट रही है और यही वजह है कि जनरल डब्बे जन सैलाब से भरे होते हैं।

 जनरल डब्बे में चढ़ने के दौरान अक्सर भगदड़ और जेबतराशी की घटनाएं होना अपने यहाँ आम हैं। जब इससे पार पाने के पुलिस के देसी तरीके को मैंने नयी दिल्ली रेलवे स्टेशन पर देखा तो मैं सोचा कि ये व्यवस्था का पूरी तरह भारतीयकरण है। 

 हम अक्सर पुलिस के डंडा बजाने की आदत का विरोध करते हैं, करना भी चाहिए लेकिन अगर यह जनता के भले के लिए इस्तेमाल हो रही है तो क्या बुराई है। पहले डंडे के दर पर अगर किसी अच्छी आदत का विकास किया जा सकता है तो यह बेहतर है। उस दिन मैंने स्टेशन पर देखा कि एक कांस्टेबल हाथ में डंडा लिए लोगों की लाइन लगवा रहा था जो उस ट्रेन के जनरल डब्बे में सवार होना चाहते थे। 

 मैंने कांस्टेबल प्रदीप से जब बात की तो उसने कहा कि साहब आपको तो मालूम है कि हमारे यहाँ डंडे का हुकम चलता है। आप लाख चिल्ला लें लेकिन ये जनता डंडे से चलती है। हमें तो ऊपर से आदेश आये कि ट्रेन में यात्रियों को आराम से चढ़ाना है ताकि भगदड़ वगैरह न मचे, पहले एक दो दिन लाइन लगवाने की कोशिश की जब नहीं हुआ कुछ तो फिर डंडा खटकाया और लाइन लग गयी बस।

 उसने कहा कि अब आप देखो कितने आराम से सब चढ़ रहे हैं। कोई मारामारी नहीं। अब अगर यही लोग खुद से कर लें तो हमे भी डंडा नहीं उठाना पड़े। लेकिन हमारे बिना हड़काये कोई काम ही नहीं होता। हमारी भी म्हणत की बचत हुई। जेब कटना कम हो गया, भगदड़ नहीं मचती। पहले अक्सर ट्रेन में चढ़ते वक़्त लोग डब्बे और स्टेशन के बीच फंस जाते थे लेकिन तीन महीने से जब से इस सिस्टम को अपनाया है तो बस पांच मिनट की म्हणत और बाकी का आराम। इसके दो फायदे और हुए महिलाओं और विकलांगो के डब्बे में जबरदस्ती घुसने वालों पर रोक लग गयी।

 फिर मैंने भी प्रदीप से कहा कि ये तो बहुत बढ़िया है और सोचा कि आखिर पुलिस ने इस डंडा पिलाई का काम किया किसके भले के लिए। हमारे और अपने लोगों के लिए ही न तो फिर हम पुलिस के ऐसे कामों की तारीफ क्यों नहीं करते? बुराई तो पुलिस की होती ही रहती है लेकिन उसकी तारीफ भी होनी चाहिए जब वो देसी जुगाड़ हमारे लिए इस्तेमाल करती है।

रविवार, 17 जुलाई 2016

कितने दूर चले गए हमारे नेता?


 भी पिछले दिनों एक किताब "डिकोडिंग राहुल गांधी" को पढ़कर ख़त्म किया। ये राहुल गांधी के 2012 तक के सफर (अमूमन असफलताओं) की कहानी कहती है। पत्रकार आरती रामचंद्रन की इस किताब को आये लम्बा समय बीत चुका है इसलिए उसके बारे में बहुत कुछ लिखा और पढ़ा जा चुका होगा, ऐसा मुझे लगता है। इसलिए मैं यहाँ किताब के बारे में ज्यादा ज़िक्र नहीं करूँगा। लेकिन हाँ इस किताब ने मन में कई सवालों को जन्म दिया उन पर तो बात की ही जा सकती है।

 इस किताब को आप राहुल गांधी की एक अनाधिकारिक जीवनी (क्योंकि राहुल के बारे में कोई अन्य किताब उपलब्ध नहीं है) मान सकते हैं जो उनके जीवन के बहुत छोटे से कालखंड की बात करती है। लेकिन यह कितना विचित्र है कि राहुल पर लिखी गयी किताब में लेखक ने अपनी सिर्फ एक मुलाकात का ज़िक्र किया है बाकि जितने भी संदर्भ और वर्णन हैं वो सब दस्तावेजों और सहयोगियों से जुटाए गए हैं।

 अब ये मेरी समझ से परे है कि किसी से एक मुलाकात में आप कितना उसके बारे में जान पाएंगे। यहाँ आम जीवन में रोज़ाना दफ्तर या कामकाज के दौरान में मिलने वाले लोगों को हम सही से नहीं जान पाते तो एक नेता को कैसे जान सकते हैं ? खैर किताब में राहुल के बारे में कई रोचक जानकारियां हैं जिनके बारे में शायद आम जनता को पता भी नहीं हो।

 आज़ादी के हमारे नायकों ने अपने जीवन में कई किताबों को लिखने का श्रम किया। उस दौर में वो अपने साथियों को पत्र लिखा करते थे जिसमें उनकी अपनी निजी भावनाओं का पता चलता था। अगर जानना है कि पत्र किसी के अंदर ने मनुष्य को कैसे बाहर निकालते हैं तो गांधीजी और टॉलस्टॉय के बीच का पत्राचार पढ़िए। खैर इस दौर की तो कमी यही है कि इतिहास विलुप्त हो रहा है और नया इतिहास लिखा जा रहा है।

 नेहरू-गांधी परिवार में राजीव गांधी के बाद जब से नयी पीढ़ी का उदय हुआ है तो ये लिखने की परंपरा कंही पीछे छूट गयी है। नेताओं का जन संवाद खत्म हो गया है और उसकी जगह चाटुकारों ने ले ली है। इसलिए आरती की किताब में भी राहुल का चित्रण उनके चाटुकारों के माध्यम से ही ज्यादा हुआ है।

 खैर मैं राहुल की बात का अंत यंही करना चाहूंगा क्योंकि उनके जमा खाते में कुल मिलाकर "स्वयं सहायता समूह" की एक मात्र उपलब्धि है। वैसे यह कार्य भी मनमोहन सरकार की योजनाओं का हिस्सा था इसमें राहुल क्या योगदान है वो मुझे नहीं पता ! किताब भी राहुल के समस्याओं से भागने की ही बात करती है। 

 रंज इस बात का नहीं कि हम अपने नेताओं के बारे में कितना जानते हैं, सवाल ये है कि लोकतंत्र में सुरक्षा के नाम पर हमारे नेता लोक से ही दूर हो चलें हैं। फिर वो चाहें अपने आप को चाटुकारों से मुक्त बताने वाले नरेंद्र मोदी हों या अरविन्द केजरीवाल। इनमें से कोई भी जनता के लिए आसानी से उपलब्ध नहीं है। 

 मैंने अपने बड़ो से नेहरू-गांधी दौर के कई किस्से सुने हैं उनमें से एक किस्सा नेहरू से जुड़ा है- (अभी इसकी सत्यता की जाँच की जानी बाकी है, लेकिन फिर भी किस्सा तो है, जांचने वाले इस किस्से जुड़े तथ्य बताएं तो बेहतर होगा।)
"एक बार जवाहरलाल नेहरू तीनमूर्ति वाले घर से निकल रहे थे तो उन्होंने एक बुजुर्ग सफाईकर्मी को झाड़ू लगाते देखा। उस समय झाड़ू में डंडा नहीं लगा होता था तो उस बुजुर्ग को झुककर झाड़ू लगानी पड़ रही थी। यह देखकर नेहरू रुक गए और उस बुजुर्ग से बात करने पहुँच गए। उसके बाद उन्होंने सरकारी सफाईकर्मियों की झाड़ू में डंडा लगाने का निर्णय लिया और ऐसे ये परंपरा शुरू हुई।"
  हालाँकि मोदी ने भी एक दो बार ये जताया कि वो सर्व सुलभ होने की इच्छा रखते हैं। लेकिन यह मुझे रस्मी ज्यादा लगा। भारतीय राजनीति अन्य उभरते सितारे केजरीवाल के बारे में तो यही कहा जाता है कि सर्व सुलभ होना तो दूर वो तो कई बार अपने विधायकों के लिए भी उपलब्ध नहीं होते।

 सोचना हमें ही है कि क्या हम अपने नेताओं को ऐसे ही दूर से देख के मनोरंजन करना चाहते हैं या उन्हें अपने जीवन में अपनाकर लोकतंत्र का उत्सव मनाना चाहते हैं क्योंकि मांगेगे नहीं तो मिलेगा भी नहीं। रही बात मनोरंजन की तो देखने से भी हो जाता है जबकि उत्सव में भाग लेना होता है।

 वैसे अब नेताओं ने लिखना छोड़ दिया है और सरकारी अधिकारियों ने लिखना शुरू कर दिया है। नेहरू-गांधी परिवार में इंदिरा के बाद तो शायद ही किसी ने कुछ लिखा हो, तो हमें अपने नेताओं के बारे में पता कैसे चलेगा। भाजपा में लिखने को अच्छी विधा नहीं माना जाता तभी तो लिखने वाले जसवंत सिंह का क्या हश्र हुआ सबको पता है और लाल कृष्ण आडवाणी भी "माय लाइफ माय कंट्री" लिखने के बाद कहाँ हैं ये भी सभी को दिखाई दे रहा है।

 खैर अभी इंतज़ार करिये क्या पता मनमोहन सिंह ही कुछ लिख दें...