जब भी मैं दिल्ली के आम ढाबों में मिलने वाले शाही पनीर, दाल मक्खनी और तरह-तरह के पंजाबी खानों से ऊब जाता हूँ तो पुरानी दिल्ली की गलियों का रास्ता अख्तियार कर लेता हूँ और किसी न किसी एक मित्र को साथ चलने के लिए पटा ही लेता हूँ।
गोलगपे मुझे सिर्फ नयी सड़क पर बड़े पेट वाले भाईसाहब के खोमचे के पसंद आते हैं या फिर हल्दीराम के ठीक बगल में ऊंचे दासे वाली दुकान के। इनका नाम पूछने की पिछले आठ साल में मुझे कभी जरुरत महससू ही नहीं हुई क्योंकि मुझे हमेशा ही ऐसा लगा कि ये यहाँ जैसे आदिकाल से हैं। कांजी वड़े की दुकान भी हल्दीराम के पास में ही है तो चांदनी चौक की यह लेन मेरी जायके की यात्रा की सनातनी शुरुआत है।
सोहन हलवा को अगर दिल्ली की मिठाई के तौर पर जाना जाता है तो उसकी एक बड़ी वजह घण्टेवाला ही है। घण्टेवाला के इतिहास की जानकारी आपको आसानी से विकीपीडिया पर मिल जाएगी कि कैसे 200 साल से भी ज्यादा पुरानी परंपरा से इन लोगों ने सोहन हलवे को एक स्थायी मिठाई में स्थान दिलाया। लेकिन इसका यूँ अचानक बंद हो जाना मुझ जैसे मिठाई के शौकीनों के लिए बहुत विस्मय से भरा है।
पुरानी दिल्ली की गलियां न केवल मांस के शौकीनों को अपनी ओर खींचती हैं बल्कि मुझ जैसे शाकाहारियों को भी यहां की कढ़ाहियों से उठने वाली महक सराबोर कर देती है। वैसे भी यहाँ आकर खाने का लालच बढ़ जाता है तो मैं एक दादा जी दौर का नुस्खा अपनाता हूँ ताकि ज्यादा से ज्यादा जायके का आनंद ले सकूँ।
चांदनी चौक में अक्सर मैं खाने की शुरुआत कांजी वड़े या गोलगप्पों से करता हूँ। इन सबकी रेसिपी पर फिर कभी विस्तार से चर्चा करेंगे। हाँ लेकिन यहाँ यह बताना दीगर होगा कि ये दोनों ही हाजमे के लिहाज से बेहतर होते हैं तो शुरुआत के लिए अच्छे हैं। वैसे भी इनके पानी में खट्टे के साथ तीखपन होता है जिसे शांत करने के लिए चांदनी चौक की मिठाइयां जरूरी सी हो जाती हैं।
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| गोलगप्पे का खोमचा |
इसी लेन के ठीक सामने एक दुकान हुआ करती थी घण्टेवाला की, लेकिन इस बार उस दुकान को बंद देखकर मन खिन्न सा हो गया। जब आस-पास पता किया तो पता चला कि कई महीनों पहले ही यहाँ ताले पद गए हैं और उसकी वजह दुकान का घाटे में चलना है।
आमतौर पर लोगों को घण्टेवाला का नाम सोहन हलवे के लिए याद रहता है लेकिन जिसने भी यहाँ पर रसमलाई का स्वाद लिया है, उसके लिए भी घण्टेवाला ख़ास तवज्जो रखता है।
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| घण्टेवाला की दुकान का साइनबोर्ड |
मेरे बचपन में जब भी पिताजी दिल्ली से लौटते थे तो सिर्फ सोहन हलवे का ही इंतज़ार मुझे रहता था। अब जब मैं दिल्ली रहने लगा तो इसका इंतज़ार करने वालों में पिताजी शामिल हो गए और मैं इसे ले जाने वाला। न सिर्फ मेरे बचपन की यादें बल्कि मेरी माँ के बचपन की भी कई यादें घण्टेवाला के सोहन हलवे से जुडी हैं। लेकिन अब यह स्वाद ही याद बन गया है।
घण्टेवाला की दुकान बंद होना एक और सामाजिक-आर्थिक पहलू पर गौर करने के लिए इशारा करती है। इसके ठीक सामने हल्दीराम की दुकान है और इसी बाजार में बीकानेरवाला, कँवरजी जैसी और भी मिठाइयों की दुकानें हैं।
अक्सर यह दलील दी जाती है कि विदेशी जायकों के कारण भारतीय जायकों को नजरअंदाज किया जा रहा है। चॉकलेट की खपत बढ़ने से मिठाइयों की दुकानों पर ताले लगने लगे हैं, लेकिन मैं इससे इत्तेफ़ाक़ नहीं रखता। हल्दीराम और बीकानेरवाला की सफलता की कहानी किसी से छिपी नहीं है।
हल्दीराम के व्यापार का आकार भारत में मेकडोनाल्ड, डोमिनोज और पिज़्ज़ा हट के संयुंक आकर से भी बड़ा है यह बाजार का खुला सच है। तो घण्टेवाला के बंद होने का आर्थिक कारण मेरी समझ से बाहर है कि लोग मिठाई खरीद नहीं रहे थे जिससे दुकान को घाटा लग रहा था, इसलिए उसे बंद करना पड़ा।
मुझे इसमें सामाजिक पहलू ज्यादा महत्त्वपूर्ण नजर आता है। भारतीय समाज वर्तमान में पैकेजिंग के दौर से गुजर रहा है। जिस सामान की पैकिंग जितनी बढ़िया उसकी डिमांड उतनी ज्यादा ( इस थ्योरी को आप राजनीति से भी समझ सकते हैं )।
विदेशी प्रतिस्पर्धा ने समाज की आकांक्षाओं को बढ़ाया है। समय बदल रहा है और लोग वस्तुओं के नए रूप-रंग (अब आप किसी दुकान में जाकर एक नजर ढोकला के प्रकारों पर डालें तो समझ जाएंगे कि मैं क्या कह रहा हूँ ) से अभिभूत हैं। यह समय और भी तेजी से बदलने वाला है।
ऐसे में आप समाज की नयी आकांक्षाओं को पूरा नहीं करते हैं, तब आपके घण्टेवाला का घण्टा सामान लेने के लिए कोई नहीं बजायेगा, और समाज अपना सफर तय कर लेगा। शायद घण्टेवाला की दुकान बंद होने का भी यही समाज की उम्मीदों से तालमेल न रख पाना हो।
अब इन सबके बीच कभी-कभी नुकसान मेरे जैसे जायका प्रेमियों का हो जाता है। लेकिन दस्तूर है जो बदस्तूर जारी है। इस बयानबाजी में दादा जी का नुस्खा बताना तो भूल ही गया.…जब भी चांदनी चौक जाएँ तो आप कितने भी दोस्त हों बस किसी भी खाने वाली चीज का एक ही दोना लें और चखते चलें, इससे ज्यादा खाना भी नहीं पड़ेगा और स्वाद भी सभी का हो जाएगा और कोलेस्ट्रोल, वजन वगेरह की चिंता भी नहीं करनी पड़ेगी। हाँ बस ये सवाल जरूर जेहन में रहेगा कि सोहन हलवा कैसे खायेंगें ?



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