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मंगलवार, 24 मई 2016

सैर सुबह की : हुमायूँ का मकबरा

हुमायूँ का मकबरा
ये बात उसी दिन की है जब मैं और मनीष सुबह की सैर पर हुमायूँ का मकबरा देखने गए थे। सबसे पहले हमने ईसा खान का मकबरा देखा था जिसके बारे में मैंने पहले लिखा है। ईसा खान का मकबरा देखने के बाद हमने मुख्य इमारत की ओर अपना मार्ग प्रशस्त किया।
अरब की सराय में जाने वाला दरवाजा

 जैसे ही हम आगे बढ़े हमारे पीछे वो तीन लड़के भी आ गए जो अपने संभवतः नए-नवेले डीएसएलआर कैमरे से ईसा खान के मकबरे में खेल रहे थे। मनीष उनसे पहले ही खीझ चुका था इसलिए हम अरब की सराय की ओर मुड़ गए।

 अरब की सराय के बारे में ज्यादा कुछ खास जानकारी तो हमें हासिल नहीं हो पायी लेकिन इतना पता चला कि इसका निर्माण हुमायूँ के मकबरे का निर्माण करने वाले मजदूरों के रहने के लिए कराया गया था। इसी से लगी अफ़सर की मस्ज़िद पर हम थोड़ी देर रुके और कई फोटो लिए।

अफ़सर की मस्ज़िद के पास योग करती महिलाएं
 हुमायूँ के मकबरे का परिसर वहां आस-पास रहने वाले लोगों के लिए खुला है इसलिए सुबह के समय लोग कसरत करते, योग करते हुए आपको इस परिसर में यहाँ-वहाँ दिख जाएंगे। हमें भी अफ़सर की मस्जिद से लगे हुए अफ़सर के मकबरे के आगे दो युवतियां योगाभ्यास करते हुए नज़र आयीं। पता नहीं क्यों हम दोनों को वहां घूमता देख वो थोड़ी देर के लिए रूक गईं। शायद हम दोनों अकेले लड़के थे इसलिए या लड़कों के बारे में हमारे समाज की लड़कियों के मन में जिस तरह का असुरक्षा का भाव व्याप्त है उस वजह से लेकिन वो थोड़ी देर तक बिलकुल शांत रही। जब उन्हें लगा कि हमसे उन्हें कोई हानि नहीं होगी तो वो फिर से अपने योगाभ्यास में व्यस्त हो गईं।

मकबरे के मुख्य द्वार का एक दृश्य
 इसके बाद अंततः हम मुख्य परिसर की ओर चल दिए और अब तक वो तीन लड़के भी हमसे दूर हो चले थे जिनकी वजह से विशेष तौर पर मनीष परेशान था। मैं तो हुमायूँ के मकबरे को तीसरी बार देखने आया था लेकिन मनीष के लिए यह अनुभव नया था क्योंकि वो पहली बार यहाँ आया था। इतनी बड़ी इमारत देख के उसे कैसा लगा ये तो वही जाने लेकिन मुझे इस इमारत की जो बात सबसे पसंद है वो है इसकी तकनीक।

 आज जैसे अत्याधुनिक साधनोंं के बिना इतनी बड़ी इमारत की परिकल्पना और उसमें भी ख़ूबसूरती को पिरोना अपने आप में अभूतपूर्व है। मैं तो इतिहास का विद्यार्थी रहा हूँ तो मेरी दिलचस्पी शुरू से ऐसी इमारतों में रही है। भले ही आजकल तथाकथित बुद्धिजीवी इन्हें सामंतवाद या निरंकुशता का प्रतीक मानते हों लेकिन कल्पना कीजिये कि ये प्रतीक नहीं होते तो फिर हमारे पास इतिहास के नाम पर होता क्या ?

गुम्बद के अंदर का नज़ारा,
साथ में लटकता झाड़फानूस
 खैर यहाँ ये चर्चा का विषय नहीं है, मैं बात कर रहा था हुमायूँ के मकबरे की। इस मकबरे की सबसे बड़ी खासियत जो मुझे लगती है वो है इसका गुम्बद क्योंकि ये मुख्य इमारत की मूल पहचान है और इसे साधने में जो तकनीक इस्तेमाल की गयी है वो काबिले तारीफ है। बचपन में हम पढ़ा करते थे कि यदि किसी वस्तु के भार को विभिन्न भागों में बाँट दिया जाये तो उसे साधना आसान हो जाता है ठीक वैसे ही जैसे किसी बड़े पत्थर को हटाने के लिए हम एक बांस का प्रयोग कर खुद की मेहनत कम कर लेते थे और उसका भार उस बांस पर डाल दिया करते थे। अब ये नियम कौन सा है वो मुझे याद नहीं लेकिन इस इमारत में भी गुम्बद के वजन को इसके आस-पास की दीवारों पर डाल दिया गया है तभी तो कई फुट ऊंचे प्लेटफॉर्म पर स्थित होने के बावजूद ये गुम्बद अटल खड़ा है।

झरोखा
 हुमायूँ के मकबरे की एक और खास बात इसमें प्रयोग की गयी जालियां हैं जो बाद में मुग़लकाल की लगभग हर इमारत में नज़र आती हैं और सलीम चिश्ती की दरगाह (फतेहपुर सीकरी) में संगमरमर में ढलकर इसका अनोखा स्वरूप उभर के आता है। मुग़लकाल की 'बादशाह का झरोखा दर्शन' परंपरा में भी इन जालियों का अहम योगदान है। इस इमारत में झरोखे की अहमियत मुझे इसलिए ज्यादा नज़र आती है क्योंकि ईमारत को ठंडा, हवादार और प्रकाशमान बनाए रखने में इसी का सर्वाधिक योगदान है। हर तरफ से और हर समय की सूर्य की रोशनी मुख्य इमारत के बीच बनी हुमायूँ की कब्र तक पहुंचाने का बंदोबस्त ये झरोखे ही करते हैं।


नहर-ए-बहिश्त
 इसके पीछे एक वजह ये भी कि दरअसल इस इमारत को जन्नत का स्वरूप देने की कोशिश की गयी है और बादशाह को परवरदिगार के बराबर का दर्ज दिया गया है। इसलिए इसमें चारबाग शैली के बीच में मुख्य इमारत बनायी गयी है। चारों बागों को एक नहर विभाजित करती है जो दिल्ली के लाल किले की नहर-ए-बहिश्त की तरह है और जिसकी तस्दीक ताजमहल में भी होती है। कब्र का प्रतीक जमीन से ऊपर बनाया गया है जो अल्लाह के हमसे ऊपर होने का संकेत देता है। उस कक्ष में भरपूर रोशनी, उसकी दुनिया में उजियारे का स्वरूप है और विस्मय से भर देने वाली इसकी भव्यता अल्लाह की अभूतपूर्व छवि का निर्माण करने के लिए हैं जिसके बराबर यहाँ बादशाह को दर्जा दिया गया है।

 असल में यह विशेषताएं मुग़लकाल की सभी इमारतों का मूल स्रोत है जिसकी परिणति आगरा के ताजमहल में जाकर होती है। वहां पर अल्लाह का स्वरुप और सौम्य रूप में सामने आता है और जन्नत का भव्यतम दृश्य भी दृष्टिगोचर होता है क्योंकि वह  इमारत पूरी तरह सफ़ेद संगमरमर से बनी है। 

नाई का मकबरा
 इसी इमारत में एक नाई का मकबरा भी है जिसके बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है लेकिन हाँ मनीष इसे देखकर बहुत खुश हुआ और अंततः उसने एक फोटो तो इस मकबरे के साथ खिचवाई वरना इस पूरी सैर के दौरान मैं ही मॉडलिंग करता रहा। मनीष के यहाँ पहुंचकर खुश होने की वजह शायद यहां पसरी वो छाँव थी जो उस धूप के मौसम की दरकार थी या वहां उठता वो धुआं जिसकी मनमोहक महक ने उसके मन को आबाद किया, लेकिन ये सिर्फ मेरा आकलन है असल बात तो वही जानता होगा। 

 तो गर्मियां बीतने दें और एक छोटी-सी सैर आप भी कर आएं इस खूबियों से भरी ऐतिहासिकता की।







हुमायूँ के मकबरे का स्मरणीय दृश्य

NOTE-All Picture Courtesy-Manish Sain

सोमवार, 4 अप्रैल 2016

माई साहिबा दरगाह : भटकते हुए ठौर का मिल जाना

 कभी-कभी रास्तों पर यूँही घूमते हुए आप ऐसी चीजों से टकरा जाते हैं जो आपके जेहन में बस जाती हैं। ऐसे ही एक बार चांदनी चौक में नयी सड़क पर घूमते हुए "दौलत की चाट" से नजर मिल गयी थी और उसका स्वाद मन में ऐसा बसा कि अब सर्दियों में बकायदा उसे खाने के लिए ही चांदनी चौक जाता हूँ।

 हाल ही में मुझे दिल्ली में साइकिल चलाने का शौक लगा है तो अक्सर मेट्रो से किराए पर साइकिल लेकर मैं कुछ दोस्तों के साथ यूँही तफरी करने चला जाता हूँ। इसी के साथ घूमने का शौक भी पूरा हो जाता है।

 उस दिन रविवार था जब हमने क़ुतुब मीनार के पास संजय वन जाने का मन बनाया और किराए की साइकिल से मैं और मेरे दो मित्र अभिनव एवं गौरव संजय वन पहुँच भी गए, लेकिन मेरा मन रास्ते में अधचिनी गांव के पास पड़ी एक दरगाह पर अटक गया और मैं ऐसा लालयित था कि अगले दिन फिर से मेट्रो से साइकिल लेकर मैं सिर्फ और सिर्फ उस दरगाह को देखने गया।

माई साहिबा की दरगाह
 दरअसल दिल्ली आने वाले हर बाशिंदे को हज़रत निजामुद्दीन की दरगाह के बारे में पूरी खबर रहती है, क्योंकि स्टेशन के नजदीक होने और जग प्रसिद्ध होने के कारण सभी लोग उसका रुख कर लेते हैं लेकिन अधचिनी गाँव से उनका रिश्ता उनके हज़रत बनने से भी पुराना है। अधचिनी गाँव में उनकी माँ साहिबा और बहिन की दरगाह है और आज भी उनके बहिन की करीब 42वीं पीढ़ी के वंशज इस दरगाह की देख-रेख करते हैं।

माई साहिबा की दरगाह का एक अलग स्वररूप

 माई साहिबा की दरगाह जाने का रास्ता आसान है, जब आप अधचिनी से आईआईटी दिल्ली की ओर बढ़ेंगे तो बांयें हाथ पर एक पतली से गली पर एक बोर्ड टंगा है जिस पर लिखा है "हज़रत निजामुद्दीन की माई साहिबा की दरगाह"। बस गली में घुस जाइये तो जैसे ही आप अंदर पहुंचेंगे तो आपके सामने एक बड़ा सा दालान पाएंगे और यंही पर है दरगाह का द्वार।

 मैं जब वहां पहुंचा तो दरगाह के ट्रस्टी सैयद आमिर अली निज़ामी से मेरी थोड़ी गुफ्तगू हुई। वो हज़रत की बहिन हज़रत बीबी जैनब के वंशज हैं। उन्होंने मुझे बताया की जब हज़रत निजामुद्दीन के वालिद का इंतकाल हो गया तो उनकी माँ हज़रत बीबी जुलेखां बाल-बच्चों समेत दिल्ली आ गईं और यंही अधचिनी को अपनी रिहाइश बनाया। निज़ामुद्दीन यूँ तो बदायूं के थे लेकिन उनकी शुरुआती शिक्षा यंही अधचिनी में ही हुई उसके बाद वो ग्यासपुर चले गए जिसे आज हम सभी निजामुद्दीन बस्ती के नाम से जानते हैं।

 निजामुद्दीन बाद में वंही ग्यासपुर में बस गए लेकिन माई साहिबा यंही रहीं और आज उनकी यहाँ मौजूद दरगाह करीब 800 साल पुरानी है। यहाँ एक मुफ्त डिस्पेंसरी भी चलती है जहाँ मुख्य तौर पर यूनानी तरीके से इलाज होता है और शुक्रवार को लंगर भी होता है।

 इस साल माई साहिबा का उर्स 8 मार्च को पड़ा था और हर साल उनका उर्स मार्च के महीने के आस-पास ही पड़ता है।

 मैं तो सलाह दूंगा कि एक बार आप भी इस जगह जरूर जाएं क्योंकि जहाँ एक तरफ निजामुद्दीन की दरगाह पर जायरीनों की संख्या ज्यादा होने और बाहर पूरा बाजार होने से काफी भीड़भाड़ हो जाती हैं वंही उसके उलट यहाँ पर एकदम शांति पसरी रहती है।

 अब मैं तो साइकिल से गया था आप चाहें तो कोई और साधन भी ले सकते हैं, घूम कर आइए आपको यकीन नहीं होगा कि इतने व्यस्त रोड के नजदीक होने और भीड़भाड़ से भरे इलाके में होने के बावजूद इस दरगाह में इतनी शांति क्यों रहती है ? अब रही बात संजय वन क़े वृतांत की तो थोड़ा ठहर के लिखूंगा उस बारे में, तब तक आप भी "माई साहिबा की दरगाह" हो आएंगे ऐसी मैं उम्मीद करता हूँ। 

सोमवार, 15 फ़रवरी 2016

सैर सुबह की : ईसा खान का मक़बरा

 म तौर पर धूल  और शोरगुल से भरी रहने वाली दिल्ली में सुबह की सैर का आनंद थोड़ा मजेदार होता है यदि वह दक्षिणी दिल्ली में हुमायूँ के मकबरे के बाग़-बगीचों में की जाए। ऐसे ही एक दिन मैं और मनीष भोर में पौ फूटने से पहले ही जा पहुंचे हुमायूँ के मकबरे पर और दिल्ली की एक सुहानी सुबह देखी जो कई मायनों में यादगार रही।

 मनीष और मेरी लंबे  समय से योजना थी कि दिल्ली दर्शन पर निकला जाये और एक-एक करके विभिन्न स्थानों का भ्रमण किया जाए। सौभाग्य से उस रविवार को मुझे अवकाश मिल गया था ऑफिस से और मनीष का मन भी था इतने सुबह उठकर जाने का अन्यथा रविवार को सुबह कौन नींद ख़राब करता ? हम दोनों ने घर के बाहर से ऑटोरिक्शा लिया और पहुंच गए हुमायूँ के मकबरे पर।

 टिकट वगैरह खरीदने के बाद हमने सबसे पहले वहां स्थित ईसा खान के मकबरे का रुख किया। ईसा खान शेरशाह सूरी का दरबारी था। उसके जीवनकाल में ही इस मकबरे का निर्माण हो गया था।

मुख्य द्वार से प्रवेश ...
 यह मक़बरा अष्टकोणीय आकार में बना है और इसके चारों ओर चारबाग़ शैली के बाग़ हैं जिनके चारों ओर अष्टकोणीय दीवार है। हकीकत में यह मक़बरा हुमायूँ के मकबरे से पुराना है और इसलिए इसकी हालत थोड़ी खस्ता है जिसकी वजह से उन दिनों में यहाँ पर इसके संरक्षण का कार्य चल रहा था। 

 हमारी यह यात्रा इसलिए यादगार रही क्योंकि मनीष इतने सुबह उठकर सिर्फ इसलिए गया था ताकि वह अपने कैमरे से इन इमारतों के कुछ बेहतरीन शॉट्स ले सके लेकिन......

 ईसा खान के मकबरे में हमारा स्वागत कुछ लड़कों के एक समूह ने किया। वे संभवतः कॉलेज जाने वाले नए छात्र लग रहे थे। उनके हाथ में एक डीएसएलआर कैमरा था और संभवतः वह भी नया ही था। अजीब बात जो हमें लगी वो यह कि वे लोग इस कैमरे से भी सेल्फ़ी ले रहे थे। 

 खैर इस बात से मनीष को कोई परेशानी नहीं थी क्योंकि वे भी पर्यटक थे , घूमने आएं थे तो फोटो तो लेंगे ही, मनीष की परेशानी का सबब दूसरा था।

बेचारा मनीष, कोशिश जारी है.... 
 ईसा खान के मकबरे के भीतर जब हमने प्रवेश किया तो सामने तीन मुख्य कब्रें देखीं। वहां हल्का अँधेरा था तो मनीष के फोटो लाइट कम होने की वजह से साफ़ नहीं आये।  इससे उसे थोड़ी खीझ हुई कि काश उसके पास भी उन लड़कों जैसा कैमरा होता, खैर ये एक आम मानवीय प्रतिक्रिया थी लेकिन उसे मलाल इस बात का था कि तीन कब्रों पर रोशनदानों से पड़ने वाले रोशनी के मनोरम दृश्य को वह अपने कैमरे में कैद नहीं कर पा रहा  था। 

 इसके बाद जब हम ईसा खान के मकबरे के मुख्य गुम्बद के बाहर के अष्टकोणीय गलियारे में आये तो वहां देखा कि बहुत सारे स्तम्भों के बीच में इस इमारत के बनने के दौरान छत पर बनाये गए बेल-बूटों, कलाकारी को नया रूप देकर संवारा जा रहा है, यहाँ रोशनी ठीक थी तो मनीष ने फोटो ले लिए कि तभी पीछे काफी शोरगुल करता हुआ उन लड़कों का समूह आ गया तो मैंने और मनीष ने उसी अहाते में स्थित मस्जिद की ओर  रुख किया।

सुन्दर, अप्रतिम... 
 मस्जिद की ओर पहुंचकर हमने देखा कि गुम्बदों के ऊपर टाइल्स का काम फिर से दुरुस्त किया जा रहा है। तभी वहां एक मोर ने अपने पंख फैलाये जिस कारण से सबका ध्यान उसकी ओर आकृष्ट हो गया। उन लड़कों का समूह भी उसे देखने के लिए मस्जिद की ओर चला आया। अब  मनीष के चेहरे पर थोड़ी चिंता व्यक्त हो रही थी क्योंकि उसे लग रहा था कि वह अब ठीक तरह से ईसा खान के मकबरे की मुख्य इमारत का फोटो नहीं ले पायेगा।

 मस्जिद की ओर  से मक़बरा काफी शानदार दिखाई दे रहा था। सुबह की सूरज की लाल किरणें उसके मुख्य गुम्बद की सफेदी को आलोकित कर रहीं थीं। अष्टकोण के प्रत्येक कोण पर गुम्बद के नीचे बनी एक छतरी और उसके नीचे बने तीन मेहराबों को जब आप मस्जिद की ओर से देखते हैं तो तीन कोणों को मिलाकर एक अभूतपूर्व दृश्य बनता है जिसके बीचों-बीच एक रास्ता आस-पास के बाग़ को स्पष्ट रूप से दो भागों में बाँट देता है। ज्यामिति का छात्र अगर कोई हो तो इतनी कुशलता को देखकर मंत्रमुग्ध हो जाये।

 खैर मनीष को इस चिंता से मैंने दूर किया और उसे सुझाव दिया कि  इमारत की अष्टकोणीय बाहरी दीवार पर हम तब तक टहल लेते हैं जब तक उन लड़कों का समूह डीएसएलआर से सेल्फ़ी लेकर चला नहीं जाता। यह दीवार असल में इतनी चौड़ी है कि पांच लोग एक साथ दौड़ प्रतियोगिता कर सकें। हम दीवार पर टहलने लगे। पूरा चक्कर काटने के बाद हम मुख्य द्वार तक पहुंचे और वहां हम सीढ़ियों से उतरने को जैसे ही आगे बढे मेरे कदम ठिठक गए। सामने द्वार के ऊपर जाने की सीढ़ियां तो थी लेकिन वहां से नीचे बाग़ तक जाने की नहीं और हमारा ध्यान वहां नहीं गया था तो बस हम गिरते-गिरते बचे।

उन्हीं बेहतरीन शॉट्स में से एक.....
 दीवार पर टहलने के दौरान दूर से मनीष ने गुम्बद और मस्जिद के काफी बेहतरीन शॉट्स लिए और फिर अंततः हम मस्जिद वापस आये और वहां से तीन कोण वाला अपना पसंदीदा फोटो लिया। मनीष ने मस्जिद के भी अच्छे शॉट लिए जिसमें से एक में उसने मुझसे टाइटैनिक का चिरस्थायी पोज बनाने को कहा।
 उस समय तक उन लड़कों का समूह इस परिसर के दूसरे इलाके की ओर जा चुका था तो वहां हमने बिलकुल शांत वातावरण में कुछ देर उस सुबह की धूप से रोशन होते मकबरे को निहारा और सोचा कि उन कब्रों में सो रहे लोगों को अब ये रोशनी भी नहीं जगा सकती। सिर्फ इस धूप की गर्मी ही है जो उन्हें अब तक सही सलामत रखे हुए है और मौसम की मार से उनके इस शयनकक्ष को बचाये हुए है।
अंततः..... 

सोमवार, 7 सितंबर 2015

अब सोहन हलवा कैसे खाएंगे...?

 ब भी मैं दिल्ली के आम ढाबों में मिलने वाले शाही पनीर, दाल मक्खनी और तरह-तरह के पंजाबी खानों से ऊब जाता हूँ तो पुरानी दिल्ली की गलियों का रास्ता अख्तियार कर लेता हूँ और किसी न किसी एक मित्र को साथ चलने के लिए पटा ही लेता हूँ।

 पुरानी दिल्ली की गलियां न केवल मांस के शौकीनों को अपनी ओर खींचती हैं बल्कि मुझ जैसे शाकाहारियों को भी यहां की कढ़ाहियों से उठने वाली महक सराबोर कर देती है। वैसे भी यहाँ आकर खाने का लालच बढ़ जाता है तो मैं एक दादा जी दौर का नुस्खा अपनाता हूँ ताकि ज्यादा से ज्यादा जायके का आनंद ले सकूँ।

 चांदनी चौक में अक्सर मैं खाने की शुरुआत कांजी वड़े या गोलगप्पों से करता हूँ। इन सबकी रेसिपी पर फिर कभी विस्तार से चर्चा करेंगे। हाँ लेकिन यहाँ यह बताना दीगर होगा कि ये दोनों ही हाजमे के लिहाज से बेहतर होते हैं तो शुरुआत के लिए अच्छे हैं।  वैसे भी इनके पानी में खट्टे के साथ तीखपन होता है जिसे शांत करने के लिए चांदनी चौक की मिठाइयां जरूरी सी हो जाती हैं। 

गोलगप्पे का खोमचा
 गोलगपे मुझे सिर्फ नयी सड़क पर बड़े पेट वाले भाईसाहब के खोमचे के पसंद आते हैं या फिर हल्दीराम के ठीक बगल में ऊंचे दासे वाली दुकान के। इनका नाम पूछने की पिछले आठ साल में मुझे कभी जरुरत महससू ही नहीं हुई क्योंकि मुझे हमेशा ही ऐसा लगा कि ये यहाँ जैसे आदिकाल से हैं।  कांजी वड़े की दुकान भी हल्दीराम के पास में ही है तो चांदनी चौक की यह लेन मेरी जायके की यात्रा की सनातनी शुरुआत है।

 इसी लेन के ठीक सामने एक दुकान हुआ करती थी घण्टेवाला की, लेकिन इस बार उस दुकान को बंद देखकर मन खिन्न सा हो गया। जब आस-पास पता किया तो पता चला कि कई महीनों पहले ही यहाँ ताले पद गए हैं और उसकी वजह दुकान का घाटे में चलना है।

 आमतौर पर लोगों को घण्टेवाला  का नाम सोहन हलवे के लिए याद रहता है लेकिन जिसने भी यहाँ पर रसमलाई का स्वाद लिया है, उसके लिए भी घण्टेवाला ख़ास तवज्जो रखता है।

घण्टेवाला की दुकान का साइनबोर्ड
 सोहन हलवा को अगर दिल्ली की मिठाई के तौर पर जाना जाता है तो उसकी एक बड़ी वजह घण्टेवाला ही है। घण्टेवाला के इतिहास की जानकारी आपको आसानी से विकीपीडिया पर मिल जाएगी कि कैसे 200 साल से भी ज्यादा पुरानी परंपरा से इन लोगों ने सोहन हलवे को एक स्थायी मिठाई में स्थान दिलाया। लेकिन इसका यूँ अचानक बंद हो जाना मुझ जैसे मिठाई के शौकीनों के लिए बहुत विस्मय से भरा है। 

 मेरे बचपन में जब भी पिताजी दिल्ली से लौटते थे तो सिर्फ सोहन हलवे का ही इंतज़ार मुझे रहता था। अब जब मैं दिल्ली रहने लगा तो इसका  इंतज़ार करने वालों में पिताजी शामिल हो गए और मैं इसे ले जाने वाला। न सिर्फ मेरे बचपन की यादें बल्कि मेरी माँ के बचपन की भी कई यादें घण्टेवाला के सोहन हलवे से जुडी हैं। लेकिन अब यह स्वाद ही याद बन गया है। 

 घण्टेवाला की दुकान बंद होना एक और सामाजिक-आर्थिक पहलू पर गौर करने के लिए इशारा करती है। इसके ठीक सामने हल्दीराम की दुकान है और इसी बाजार में बीकानेरवाला, कँवरजी जैसी और भी मिठाइयों की दुकानें हैं।