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सोमवार, 4 अप्रैल 2016

माई साहिबा दरगाह : भटकते हुए ठौर का मिल जाना

 कभी-कभी रास्तों पर यूँही घूमते हुए आप ऐसी चीजों से टकरा जाते हैं जो आपके जेहन में बस जाती हैं। ऐसे ही एक बार चांदनी चौक में नयी सड़क पर घूमते हुए "दौलत की चाट" से नजर मिल गयी थी और उसका स्वाद मन में ऐसा बसा कि अब सर्दियों में बकायदा उसे खाने के लिए ही चांदनी चौक जाता हूँ।

 हाल ही में मुझे दिल्ली में साइकिल चलाने का शौक लगा है तो अक्सर मेट्रो से किराए पर साइकिल लेकर मैं कुछ दोस्तों के साथ यूँही तफरी करने चला जाता हूँ। इसी के साथ घूमने का शौक भी पूरा हो जाता है।

 उस दिन रविवार था जब हमने क़ुतुब मीनार के पास संजय वन जाने का मन बनाया और किराए की साइकिल से मैं और मेरे दो मित्र अभिनव एवं गौरव संजय वन पहुँच भी गए, लेकिन मेरा मन रास्ते में अधचिनी गांव के पास पड़ी एक दरगाह पर अटक गया और मैं ऐसा लालयित था कि अगले दिन फिर से मेट्रो से साइकिल लेकर मैं सिर्फ और सिर्फ उस दरगाह को देखने गया।

माई साहिबा की दरगाह
 दरअसल दिल्ली आने वाले हर बाशिंदे को हज़रत निजामुद्दीन की दरगाह के बारे में पूरी खबर रहती है, क्योंकि स्टेशन के नजदीक होने और जग प्रसिद्ध होने के कारण सभी लोग उसका रुख कर लेते हैं लेकिन अधचिनी गाँव से उनका रिश्ता उनके हज़रत बनने से भी पुराना है। अधचिनी गाँव में उनकी माँ साहिबा और बहिन की दरगाह है और आज भी उनके बहिन की करीब 42वीं पीढ़ी के वंशज इस दरगाह की देख-रेख करते हैं।

माई साहिबा की दरगाह का एक अलग स्वररूप

 माई साहिबा की दरगाह जाने का रास्ता आसान है, जब आप अधचिनी से आईआईटी दिल्ली की ओर बढ़ेंगे तो बांयें हाथ पर एक पतली से गली पर एक बोर्ड टंगा है जिस पर लिखा है "हज़रत निजामुद्दीन की माई साहिबा की दरगाह"। बस गली में घुस जाइये तो जैसे ही आप अंदर पहुंचेंगे तो आपके सामने एक बड़ा सा दालान पाएंगे और यंही पर है दरगाह का द्वार।

 मैं जब वहां पहुंचा तो दरगाह के ट्रस्टी सैयद आमिर अली निज़ामी से मेरी थोड़ी गुफ्तगू हुई। वो हज़रत की बहिन हज़रत बीबी जैनब के वंशज हैं। उन्होंने मुझे बताया की जब हज़रत निजामुद्दीन के वालिद का इंतकाल हो गया तो उनकी माँ हज़रत बीबी जुलेखां बाल-बच्चों समेत दिल्ली आ गईं और यंही अधचिनी को अपनी रिहाइश बनाया। निज़ामुद्दीन यूँ तो बदायूं के थे लेकिन उनकी शुरुआती शिक्षा यंही अधचिनी में ही हुई उसके बाद वो ग्यासपुर चले गए जिसे आज हम सभी निजामुद्दीन बस्ती के नाम से जानते हैं।

 निजामुद्दीन बाद में वंही ग्यासपुर में बस गए लेकिन माई साहिबा यंही रहीं और आज उनकी यहाँ मौजूद दरगाह करीब 800 साल पुरानी है। यहाँ एक मुफ्त डिस्पेंसरी भी चलती है जहाँ मुख्य तौर पर यूनानी तरीके से इलाज होता है और शुक्रवार को लंगर भी होता है।

 इस साल माई साहिबा का उर्स 8 मार्च को पड़ा था और हर साल उनका उर्स मार्च के महीने के आस-पास ही पड़ता है।

 मैं तो सलाह दूंगा कि एक बार आप भी इस जगह जरूर जाएं क्योंकि जहाँ एक तरफ निजामुद्दीन की दरगाह पर जायरीनों की संख्या ज्यादा होने और बाहर पूरा बाजार होने से काफी भीड़भाड़ हो जाती हैं वंही उसके उलट यहाँ पर एकदम शांति पसरी रहती है।

 अब मैं तो साइकिल से गया था आप चाहें तो कोई और साधन भी ले सकते हैं, घूम कर आइए आपको यकीन नहीं होगा कि इतने व्यस्त रोड के नजदीक होने और भीड़भाड़ से भरे इलाके में होने के बावजूद इस दरगाह में इतनी शांति क्यों रहती है ? अब रही बात संजय वन क़े वृतांत की तो थोड़ा ठहर के लिखूंगा उस बारे में, तब तक आप भी "माई साहिबा की दरगाह" हो आएंगे ऐसी मैं उम्मीद करता हूँ।