कनखियों से देख-देख कर हम,
एक दूसरे के लिए जिंदा थे,
बारिश के मौसम में,
रोज एक दूसरे को देखने,
हम हो जाते बेताब थे,
पहली बारिश के बाद दूसरी,
फिर तीसरी, चौथी और,
बस इंतजार रहता,बारिश हो,
छत-छज्जे जहाँ भी हों,
बस किसी तरह दीदार हो,
दिल की बातें ज़ुबाँ पर आएँ,
उनकी नज़रों से गुलजार अब,
मेरा मन,छत-छज्जा सब था,
इल्म नहीं रहता कई बार,
कि क्या कर रहे होते,
कहाँ जाना है कहाँ चले जाते,
फिर एक दिन,बारिश की बूँदों के बीच,
उसने कुछ कहना चाहा,
पर मैं उसे सुन न पाया,
इन निगाहों से मैं,
उसे निहारता रहा,
जब मैं समझा उसकी बात,
तो बस आगे क्या कहूँ,
चलो उसे फिर कभी कहता हूँ...
यह मेरी पिछली कविता पहली बारिश का एहसास का दूसरा भाग है..
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