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गुरुवार, 26 मई 2016

मौसम की वो आख़िरी बारिश..


छज्जों पर हमारे प्यार की..
पींगें बढ़ रही थीं..
उस पर बारिश का मौसम..
नए रंग में उसे रंग रहा था..
शायद ये मेरा पहला..
एहसास था प्यार का..
और बारिश भी तो पहली ही थी..

फिर दस्तक दी सर्दियों ने..
लेकिन बारिश वो तो..
होए ही जा रही थी..
मन में समय में प्रेम की..
उस पहली मुलाकात की प्यास..
बुझाना..
कहाँ इस बारिश के बस में था..

फिर एक दिन..
हल्की गुनगुनी धूप में..
छज्जे पर वो आई..
मैं रह न सका, और..

एक कागज़ी उस छज्जे में फेंक दी..
पर्ची क्या मिलने की अर्ज़ी थी..
जवाब जब हाँ आया..
लगा निकाह कबूल हो गया..

पड़ोसी की छत पर..
आई वो बहाना करके..
उस दरमियाँ सिर्फ वो मुंडेर..
हाँ वही तो बीच में थी..

फिर बस शुरू हुई बातें..
चलती रहीं न जाने कब तक..
कहना जो था पहली बारिश..
के वक़्त से अब तक की दास्ताँ..

दूर पड़ोसी की लड़की..
छत पर खड़ी हमें देखती रही..
तब अचानक बदरा गरजे..
हमारी बातें टूटी..

उसने कहा जा रही है वो..
वो चली गयी..
भीगते बालों को संवारते..
मेरे पास बस..
उन हाथों का स्पर्श ही बचा..

मैं खड़ा रहा दिनभर..
भीगता रहा उस बारिश में..
फिर उस मौसम में न बारिश हुई..
और ना छज्जे पर वो आई..

जेहन में बसी रही जो..
वो बस उसके हाथों की छुअन..
और और..
मौसम की उस आखिरी बारिश का एहसास..

नोट - यह इस कड़ी की आखिरी कविता है। इससे पहले दो भाग और हैं इस कविता के, पहला भाग पहली बारिश का एहसास.. और दूसरा भाग बारिश में प्यार का खुमार.. है।

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शनिवार, 14 मई 2016

बारिश में प्यार का खुमार..


कनखियों से देख-देख कर हम,
एक दूसरे के लिए जिंदा थे,

बारिश के मौसम में,
रोज एक दूसरे को देखने,
हम हो जाते बेताब थे,

पहली बारिश के बाद दूसरी,
फिर तीसरी, चौथी और,
बस इंतजार रहता,बारिश हो,
छत-छज्जे जहाँ भी हों,
बस किसी तरह दीदार हो,

दिल की बातें ज़ुबाँ पर आएँ,
उनकी नज़रों से गुलजार अब,
मेरा मन,छत-छज्जा सब था,

इल्म नहीं रहता कई बार,
कि क्या कर रहे होते,
कहाँ जाना है कहाँ चले जाते,

फिर एक दिन,बारिश की बूँदों के बीच,
उसने कुछ कहना चाहा,
पर मैं उसे सुन न पाया,

इन निगाहों से मैं,
उसे निहारता रहा,
जब मैं समझा उसकी बात,
तो बस आगे क्या कहूँ,
चलो उसे फिर कभी कहता हूँ...


यह मेरी पिछली कविता पहली बारिश का एहसास का दूसरा भाग है..

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मंगलवार, 3 मई 2016

पहली बारिश का एहसास..


आज की बारिश ने पहली बारिश के
अहसास को ताज़ा कर दिया..
मैं खड़ा था छत पर
कि तभी नज़र वो आई..
बारिश का मौसम इतना सुहाना
पहले कभी नहीं लगा..

अब छत से भागे हम उसके पीछे
पर वो फुरफुरा रही थी,काँप रही थी..
जब वैसे में उसने मुझे देखा..
तो वो सहम गयी..
अपने परों को समेटकर..
टकटकी निगाहों से मुझे देखने लगी..

मैं भी उसके पास जाने को बेताब था..
तभी एक हवा के झोंके ने उसे..
फिर मोहिनी रूप दे दिया..
और मैं अपने को रोक न सका..

चला उसको अपनी बाहों में बांधने..
उसे अपने आकंठ से लगाने..
उसका आलिंगन करने..

बारिश में उसका अधर रस..
पीने को मैं लालायित..

किन्तु जैसे ही मैं उसके नज़दीक पंहुचा..
वो शर्मा गयी..
और छिपा के आँचल में अपना मुखड़ा..
चली गयी घर के अन्दर..

फिर छज्जे पर वो खड़ी हो गयी.
तब से शुरू हुआ एक नया अध्याय..
मेरा और उसका खिडकियों से झाँकता..
प्रेमगान..!! 


नोट - इस कड़ी में दो और कविताएं लिखी हैं जिन्हें आगे साझा करूँगा. ( It is a poetry trilogy.)
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