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बुधवार, 15 जून 2016

आता क्या है तुम्हें...?

आता क्या है तुम्हें ?
जान छिड़कना...
किस पर ?
दोस्त-यार-परिवार...
और काम ?
बिल्कुल इनका कोई भी काम...
इसमें प्रियतमा कहाँ ?
आँखों-सपनों में...
हक़ीक़त में नहीं ?
होती तो वो जान होती...
हम्म!


मंगलवार, 3 मई 2016

पहली बारिश का एहसास..


आज की बारिश ने पहली बारिश के
अहसास को ताज़ा कर दिया..
मैं खड़ा था छत पर
कि तभी नज़र वो आई..
बारिश का मौसम इतना सुहाना
पहले कभी नहीं लगा..

अब छत से भागे हम उसके पीछे
पर वो फुरफुरा रही थी,काँप रही थी..
जब वैसे में उसने मुझे देखा..
तो वो सहम गयी..
अपने परों को समेटकर..
टकटकी निगाहों से मुझे देखने लगी..

मैं भी उसके पास जाने को बेताब था..
तभी एक हवा के झोंके ने उसे..
फिर मोहिनी रूप दे दिया..
और मैं अपने को रोक न सका..

चला उसको अपनी बाहों में बांधने..
उसे अपने आकंठ से लगाने..
उसका आलिंगन करने..

बारिश में उसका अधर रस..
पीने को मैं लालायित..

किन्तु जैसे ही मैं उसके नज़दीक पंहुचा..
वो शर्मा गयी..
और छिपा के आँचल में अपना मुखड़ा..
चली गयी घर के अन्दर..

फिर छज्जे पर वो खड़ी हो गयी.
तब से शुरू हुआ एक नया अध्याय..
मेरा और उसका खिडकियों से झाँकता..
प्रेमगान..!! 


नोट - इस कड़ी में दो और कविताएं लिखी हैं जिन्हें आगे साझा करूँगा. ( It is a poetry trilogy.)
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रविवार, 10 अप्रैल 2016

वो बस वाली लड़की...

स्रोत - गूगल सर्च से साभार 

चार दिन से वो मुझे रोज़ बस में मिल रही है,
सुंदर आँखें लेकिन खोयी-खोयी,बस दीदार की मूरत वो, लेडीज़ सीट पर शांत सी बैठी,

और नज़र मिलने पर दोनों शरमाते,मैं भी कनखियों से उसे झांकता, आँखें उसकी न गुस्सा होती,न जाने कब से वो न मुस्कुराई है,


न हँसती, न विरोध जताती,कुछ तो है जो वो मन में दबायी है,क्या पता कंही किसी रोज़, अब मैं रोज उसी बस से आता हूँ,उसके सीट के बगल में खड़ा हो जाता हूँ,उसकी आँखें मेरे सवालों का जवाब दे दें...

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