पुनः जारी छोटू with छोटू ...
यहाँ "पुनः जारी" इसलिए लिखा है क्योंकि "भाषा" में काम करने के दौरान मेरा इससे कई बार वास्ता पड़ा है और "दो अंतिम" इसलिए क्योंकि इस कहानी का अंतिम भाग इसी पोस्ट में समाप्त हो रहा है...
ऊपर बताये दोनों शब्द युग्म भाषा में हमारे काम अभिन्न हिस्सा हैं। इस पोस्ट का संदर्भ भी ऐसा ही है। यहाँ मैं अपनी पिछली पोस्ट के आगे की कहानी बयां कर रहा हूँ, इसलिए पुनः जारी...
पिछली पोस्ट मेरे भाषा में आकर छोटू बनने की बात करती है वहीं इस पोस्ट में मेरे भाषा में बड़े होने की कहानी है। भाषा में मेरे इन दोनों परिवर्तनों के साक्षी रहे हैं जलीस सर...
भाषा में काम के दौरान डेस्क, रिपोर्टिंग इत्यादि कई सारे काम करने का अवसर मिलता है। यहाँ मुझे रिपोर्टिंग पर जाने का जब भी मौका मिलता है तो मैं ख़ुशी से जाता हूँ क्योंकि मुझे रिपोर्टिंग हमेशा से पसंद रही है। जब हम रिपोर्टिंग करके वापस लौटते तो हमें जलीस सर की कड़ी परीक्षा से गुजरना होता, हाँ यह बात अलग है कि उस दौरान कई बार बहुत से रोचक किस्से हमें सुनने को मिल जाते।
खैर यहाँ बात भाषा में मेरे पहले साल की है, उस साल मुझे यूँ तो राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों की रिपोर्टिंग करने का अवसर मिला था लेकिन जब जनवरी में गणतंत्र दिवस परेड की रिपोटिंग में जाने का मौका मिला तो ख़ुशी से फूला न समाया...
उनके रिटायरमेंट वाले दिन हम सभी भाषा में उनके साथ बितायी यादों का एक छोटा सा तोहफा ही उन्हें दे पाये। उस जमापूँजी की फोटो ऊपर चस्पा की है और साथ ही जलीस सर का ये एक फोटो भी साझा कर रहा हूँ जिसमें उनका सबसे पसंदीदा पौधा ट्यूब रोज है। हाँ धन्यवाद अंकित को भी देना होगा क्योंकि अगर रिटायरमेंट वाले दिन वह नहीं होता तो शायद हम अपनी यादों की ये जमापूंजी जलीस सर को कभी नहीं दे पाते...
![]() |
| जलीस सर के साथ हमारी यादों की " जमापूंजी " |
यहाँ "पुनः जारी" इसलिए लिखा है क्योंकि "भाषा" में काम करने के दौरान मेरा इससे कई बार वास्ता पड़ा है और "दो अंतिम" इसलिए क्योंकि इस कहानी का अंतिम भाग इसी पोस्ट में समाप्त हो रहा है...
ऊपर बताये दोनों शब्द युग्म भाषा में हमारे काम अभिन्न हिस्सा हैं। इस पोस्ट का संदर्भ भी ऐसा ही है। यहाँ मैं अपनी पिछली पोस्ट के आगे की कहानी बयां कर रहा हूँ, इसलिए पुनः जारी...
पिछली पोस्ट मेरे भाषा में आकर छोटू बनने की बात करती है वहीं इस पोस्ट में मेरे भाषा में बड़े होने की कहानी है। भाषा में मेरे इन दोनों परिवर्तनों के साक्षी रहे हैं जलीस सर...
भाषा में काम के दौरान डेस्क, रिपोर्टिंग इत्यादि कई सारे काम करने का अवसर मिलता है। यहाँ मुझे रिपोर्टिंग पर जाने का जब भी मौका मिलता है तो मैं ख़ुशी से जाता हूँ क्योंकि मुझे रिपोर्टिंग हमेशा से पसंद रही है। जब हम रिपोर्टिंग करके वापस लौटते तो हमें जलीस सर की कड़ी परीक्षा से गुजरना होता, हाँ यह बात अलग है कि उस दौरान कई बार बहुत से रोचक किस्से हमें सुनने को मिल जाते।
खैर यहाँ बात भाषा में मेरे पहले साल की है, उस साल मुझे यूँ तो राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों की रिपोर्टिंग करने का अवसर मिला था लेकिन जब जनवरी में गणतंत्र दिवस परेड की रिपोटिंग में जाने का मौका मिला तो ख़ुशी से फूला न समाया...
"उस दिन सुबह-सुबह छः बजे घर से निकले और परेड स्थल पहुंचे। सैम अंकल ( बराक ओबामा जी ) के आने की वजह से सुरक्षा चौकस थी और बारिश भी हो रही थी। खैर किसी तरह उस दिन हम रिपोर्टिंग करके ऑफिस पहुंचे। गनीमत है कि उस दिन मुझे एक अलग स्टोरी मिल गयी थी और वो यह कि गणतंत्र दिवस पर जिन तोपों से सलामी दी जाती है वो अंग्रेजों के ज़माने की हैं। जब ये स्टोरी लेकर मैं ऑफिस पहुंचा तो जलीस सर खुश हुए और उन्होंने पूरे मन से उसका सम्पादन किया। एक बात उन्होंने मुझसे कही कि मैं बिल्कुल पीटीआई में ही पहले काम कर चुके उमेश उपाध्याय जी की तरह हूँ। उस दिन मुझे ये बात अच्छी लगी लेकिन असल में मैं भाषा में बड़ा हुआ इस घटना के ठीक एक साल बाद।
एक साल बाद फिर से 26 जनवरी की रिपोर्टिंग करने जाना था। इस बार किसी गड़बड़ी की वजह से प्रेस विंग में बैठने की जगह नहीं मिल पायी थी तो हम आम जनता के बीच बैठकर रिपोटिंग कर रहे थे। (हम इसलिए क्योंकि इस बार मेरे साथ मेरा ही एक साथी अंकित भी रिपोर्टिंग करने गया था। ) तो इसकी रिपोर्टिंग से पहले मैं जलीस सर से बस पूछने गया कि क्या-क्या रिपोर्टिंग करनी है, तो उन्होंने कहा कि पिछले साल जैसा ही कुछ अलग लाने की कोशिश करना। इसी के साथ उन्होंने एक बात कही, "इस बार तुम वरिष्ठ रिपोर्टर की तरह रिपोर्टिंग करने जा रहे हो, तो बढ़िया से करना।"
बस यही वो समय था जब मुझे लगा कि अब मैं छोटू नहीं रहा बल्कि बड़ा हो गया हूँ।
किस्मत मेरे साथ थी कि इस बार भी मुझे और मेरे साथी को एक स्टोरी मिल गयी। स्टोरी ये थी कि गणतंत्र दिवस की परेड के दौरान जो लोग लोगों के चेहरे पर तिरंगा बना रहे होते हैं वो दरअसल में पानीपत के युवाओं का एक समूह है जो बस ऐसे अवसरों पर ही दिल्ली आता है और लोगों के चेहरे पर तिरंगा बनाकर अपना काम चलाता है। जलीस सर इस खबर पर खुश थे और हम इसलिए खुश थे क्योंकि सुबह के भूखे हम दोनों को जलीस सर के हाथ की बनी खीर और उनके घर के आलू पराठे खाने को मिले थे।और फिर इस बार तो खीर खाने के साथ मैं बड़ा भी हो गया था तो आनंद दुगना था।"इस तरह वो दिन था जब जलीस सर ने मुझे भाषा का छोटू नहीं रहने दिया। मैं उस दिन भाषा में बड़ा हो गया। हालाँकि मैं छोटू तो अभी भी हूँ लेकिन जलीस सर रिटायरमेंट से पहले मुझे भाषा में जिस तरह से बड़ा बना गए उसकी यादें तो जेहन में हैं ही।
उनके रिटायरमेंट वाले दिन हम सभी भाषा में उनके साथ बितायी यादों का एक छोटा सा तोहफा ही उन्हें दे पाये। उस जमापूँजी की फोटो ऊपर चस्पा की है और साथ ही जलीस सर का ये एक फोटो भी साझा कर रहा हूँ जिसमें उनका सबसे पसंदीदा पौधा ट्यूब रोज है। हाँ धन्यवाद अंकित को भी देना होगा क्योंकि अगर रिटायरमेंट वाले दिन वह नहीं होता तो शायद हम अपनी यादों की ये जमापूंजी जलीस सर को कभी नहीं दे पाते...
![]() |
| जलीस सर अपने सबसे पसंदीदा ट्यूब रोज पौधे के साथ ... |






