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शुक्रवार, 10 जून 2016

छोटू with छोटू दो अंतिम

पुनः जारी छोटू with छोटू ...
जलीस सर के साथ हमारी यादों की
" जमापूंजी "

 हाँ "पुनः जारी" इसलिए लिखा है क्योंकि "भाषा" में काम करने के दौरान मेरा इससे कई बार वास्ता पड़ा है और "दो अंतिम" इसलिए क्योंकि इस कहानी का अंतिम भाग इसी पोस्ट में समाप्त हो रहा है...

 ऊपर बताये दोनों शब्द युग्म भाषा में हमारे काम अभिन्न हिस्सा हैं। इस पोस्ट का संदर्भ भी ऐसा ही है। यहाँ मैं अपनी पिछली पोस्ट के आगे की कहानी बयां कर रहा हूँ, इसलिए पुनः जारी...

 पिछली पोस्ट मेरे भाषा में आकर छोटू बनने की बात करती है वहीं इस पोस्ट में मेरे भाषा में बड़े होने की कहानी है। भाषा में मेरे इन दोनों परिवर्तनों के साक्षी रहे हैं जलीस सर...

 भाषा में काम के दौरान डेस्क, रिपोर्टिंग इत्यादि कई सारे काम करने का अवसर मिलता है। यहाँ मुझे रिपोर्टिंग पर जाने का जब भी मौका मिलता है तो मैं ख़ुशी से जाता हूँ क्योंकि मुझे रिपोर्टिंग हमेशा से पसंद रही है। जब हम रिपोर्टिंग करके वापस लौटते तो हमें जलीस सर की कड़ी परीक्षा से गुजरना होता, हाँ यह बात अलग है कि उस दौरान कई बार बहुत से रोचक किस्से हमें सुनने को मिल जाते।

 खैर यहाँ बात भाषा में मेरे पहले साल की है, उस साल मुझे यूँ तो राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों की रिपोर्टिंग करने का अवसर मिला था लेकिन जब जनवरी में गणतंत्र दिवस परेड की रिपोटिंग में जाने का मौका मिला तो ख़ुशी से फूला न समाया...
"उस दिन सुबह-सुबह छः बजे घर से निकले और परेड स्थल पहुंचे। सैम अंकल ( बराक ओबामा जी ) के आने की वजह से सुरक्षा चौकस थी और बारिश भी हो रही थी। खैर किसी तरह उस दिन हम रिपोर्टिंग करके ऑफिस पहुंचे। गनीमत है कि उस दिन मुझे एक अलग स्टोरी मिल गयी थी और वो यह कि गणतंत्र दिवस पर जिन तोपों से सलामी दी जाती है वो अंग्रेजों के ज़माने की हैं। जब ये स्टोरी लेकर मैं ऑफिस पहुंचा तो जलीस सर खुश हुए और उन्होंने पूरे मन से उसका सम्पादन किया। एक बात उन्होंने मुझसे कही कि मैं बिल्कुल पीटीआई में ही पहले काम कर चुके उमेश उपाध्याय जी की तरह हूँ। उस दिन मुझे ये बात अच्छी लगी लेकिन असल में मैं भाषा में बड़ा हुआ इस घटना के ठीक एक साल बाद।
एक साल बाद फिर से 26 जनवरी की रिपोर्टिंग करने जाना था। इस बार किसी गड़बड़ी की वजह से प्रेस विंग में बैठने की जगह नहीं मिल पायी थी तो हम आम जनता के बीच बैठकर रिपोटिंग कर रहे थे। (हम इसलिए क्योंकि इस बार मेरे साथ मेरा ही एक साथी अंकित भी रिपोर्टिंग करने गया था। ) तो इसकी रिपोर्टिंग से पहले मैं जलीस सर से बस पूछने गया कि क्या-क्या रिपोर्टिंग करनी है, तो उन्होंने कहा कि पिछले साल जैसा ही कुछ अलग लाने की कोशिश करना। इसी के साथ उन्होंने एक बात कही, "इस बार तुम वरिष्ठ रिपोर्टर की तरह रिपोर्टिंग करने जा रहे हो, तो बढ़िया से करना।" 
बस यही वो समय था जब मुझे लगा कि अब मैं छोटू नहीं रहा बल्कि बड़ा हो गया हूँ। 
किस्मत मेरे साथ थी कि इस बार भी मुझे और मेरे साथी को एक स्टोरी मिल गयी। स्टोरी ये थी कि गणतंत्र दिवस की परेड के दौरान जो लोग लोगों के चेहरे पर तिरंगा बना रहे होते हैं वो दरअसल में पानीपत के युवाओं का एक समूह है जो बस ऐसे अवसरों पर ही दिल्ली आता है और लोगों के चेहरे पर तिरंगा बनाकर अपना काम चलाता है। जलीस सर इस खबर पर खुश थे और हम इसलिए खुश थे क्योंकि सुबह के भूखे हम दोनों को जलीस सर के हाथ की बनी खीर और उनके घर के आलू पराठे खाने को मिले थे।और फिर इस बार तो खीर खाने के साथ मैं बड़ा भी हो गया था तो आनंद दुगना था।"
 इस तरह वो दिन था जब जलीस सर ने मुझे भाषा का छोटू नहीं रहने दिया। मैं उस दिन भाषा में बड़ा हो गया। हालाँकि मैं छोटू तो अभी भी हूँ लेकिन जलीस सर रिटायरमेंट से पहले मुझे भाषा में जिस तरह से बड़ा बना गए उसकी यादें तो जेहन में हैं ही।

 उनके रिटायरमेंट वाले दिन हम सभी भाषा में उनके साथ बितायी यादों का एक छोटा सा तोहफा ही उन्हें दे पाये। उस जमापूँजी की फोटो ऊपर चस्पा की है और साथ ही जलीस सर का ये एक फोटो भी साझा कर रहा हूँ जिसमें उनका सबसे पसंदीदा पौधा ट्यूब रोज है। हाँ धन्यवाद अंकित को भी देना होगा क्योंकि अगर रिटायरमेंट वाले दिन वह नहीं होता तो शायद हम अपनी यादों की ये जमापूंजी जलीस सर को कभी नहीं दे पाते...
जलीस सर अपने सबसे पसंदीदा ट्यूब रोज पौधे के साथ ...

रविवार, 29 मई 2016

छोटू with छोटू

छोटू with छोटू

 जी हाँ, इस तस्वीर को किसी साथी ने यही कैप्शन दिया तो मैंने शीर्षक में यही लिख दिया क्योंकि इससे बेहतर वैसे भी कुछ नहीं हो सकता। इस फोटो में मेरे साथ जलीस सर हैं जो हाल ही में भाषा से रिटायर हुए हैं और अपनी जिंदगी की नयी इनिंग शुरू कर चुके हैं। उनकी रिटायरमेंट पार्टी के दौरान ही हमें पता चला कि उनका एक नाम छोटू भी है वरना हम सभी के लिए तो वो जलीस सर ही हैं। मेरे साथ छोटू नाम यहाँ भाषा में आकर ही जुड़ा, तो आज यहाँ बात मेरा नाम छोटू पड़ने की क्योंकि इसमें जलीस सर का योगदान है और फिर अगली कड़ी में बात मेरे बड़े होने की और उसमें भी उनका ही योगदान है।

 दरअसल घर में मुझे छोटू होने का सुख प्राप्त नहीं है क्योंकि मुझसे छोटा मेरा एक भाई है और घर में सब उसे छोटू बुलाते हैं, वैसे भी एक ही घर में दो लोगों के एक ही नाम होना थोड़ा अजीब होता और फिर इस किस्से के शीर्षक की तरह हम भी घर में छोटू-1 और छोटू-2 होते। 

 हम एक ही घर में दो चाचाओं के बच्चों के साथ रहते हैं। मैं उनमें सबसे बड़ा हूँ तो मेरा उनके बीच हकीकत में कोई नाम ही नहीं हैं, उन सब के लिए मैं भैया हूँ और इस वजह से कभी-कभी मेरी माँ भी मुझे भैया बुलाती है। मोहल्ले-पड़ोस, रिश्तेदार कंही भी मैं छोटू नहीं हूँ क्योंकि वो छोटे भाई का हक़ है लेकिन हाँ यहाँ मेरे ऑफिस "भाषा" में मैं ही छोटू हूँ।

 हालाँकि जब ऑफिस में मुझे ये नाम मिला तो शुरुआत में मुझे कोई समस्या नहीं थी क्योंकि जब कोई उम्र में बड़ा व्यक्ति आपको इस नाम से बुलाए तो उसमें उनका प्यार झलकता है लेकिन जब आपके हम उम्र भी आपको छोटू कहने लगें तो मानव मनोविज्ञान के हिसाब से कोई भी झेंप जायेगा।

 इसी तरह मैंने भी कई जंग लड़ी इस नाम से छुटकारा पाने के लिए फिर अंततः मेरी तमाम असफल कोशिशों के बाद मैंने इस नाम को अपना ही लिया। मैंने मान लिया कि मुझसे छोटों के आने के बावजूद भाषा का छोटू मैं ही रहूँगा, और अब तो मैं इस पर अपना अधिकार मानता हूँ, कोई लेकर तो दिखाए मुझसे ये नाम अब। 

 तो किस्सा शुरू करते हैं कि भाषा में मुझे ये नाम मिला कहाँ से, इससे जुड़ी एक घटना का जिक्र करना चाहूंगा जिसके गवाह जलीस सर रहे हैं।
"भाषा में आये बहुत दिन नहीं बीते थे तब, हम ( यह यूपी-बिहार वाला हम नहीं हैं यहाँ इसका मतलब मेरे कुछ साथियों से है ) पहली बार संसद गए थे तब, सदन की कार्यवाही देखने का पहला अनुभव होने के चलते मैं कौतूहल से भरा हुआ था। 
कार्यवाही देख के निकले तो फोटो वगैरह खिंचवाने की सारी मुरादों को पूरा कर हम संसद में भाषा का कामकाज देखने गए, अरे भई नया-नया ही तो आया था तो जानना चाहता था कि एजेंसी में आखिर कैसे काम होता है। कई अच्छी यादों के साथ हम वहां भाषा के ऑफिस से बाहर निकले और चाय बोर्ड की चाय लेकर वहीं संसद के गलियारे में खड़े हो गए।
उस दौरान जलीस सर ने भाषा के शुरुआती संपादकों में से एक रहे एक सज्जन से हमारा परिचय कराया। (सज्जन इसलिए लिखा क्योंकि मुझे उनका नाम याद नहीं रहा, वैसे भी मेरी कमजोरी है कि एक मुलाक़ात में मुझे नाम याद नहीं होता, हाँ चेहरा जरूर याद रह जाता है। ) 
हाँ, तो उन सज्जन ने मुझे देखते ही कहा कि क्या भाषा में अब आठवीं पास छोटे-छोटे बच्चों को भी काम पर रखने लगे हैं। बस इसके बाद सब ठहाका मार कर हँस पड़े, मैं भी हँसा क्योंकि मेरे पास इसका कोई जवाब नहीं था।"
 अगले दिन इस घटना का ज़िक्र ऑफिस में छिड़ा और जो लोग मेरे साथ गए थे उन्होंने मेरी काफी टांग खिंचाई की। दो दिन बाद सप्ताहांत में 12 बजे करीब जब जलीस सर दफ्तर आये तो उन्होंने इस घटना का ज़िक्र शब्दशः और लोगों के साथ किया और फिर उसके बाद जब सीनियर्स ने दिल खोलकर जो हँसा वो मुझे अच्छा लगा क्योंकि अगर वो उस बात पर हँसे नहीं होते तो शायद आज यहाँ लिखने को कुछ नहीं होता।

 तो तब से मैं भाषा का छोटू बना और तभी से भाषा के इस छोटू यानी कि मुझे अब इंतज़ार करता है कि कोई तो मेरी टांग खींचे और इसके लिए कई बार उड़ता हुआ तीर पकड़ने में भी मुझे गुरेज नहीं हैं। इसके पीछे भी वजह है कि अगर वो तीर दूसरी दिशा में चला गया तो मेरे पास तो इन किस्से-कहानियों का टोटा पड़ जायेगा...जो मैं होने नहीं देना चाहता।

गुरुवार, 21 अप्रैल 2016

ग्रीन टी, मैं और वो

हमारी बात उस दिन,
शुरू हुई थी चाय पर,
काम के बीच वही तो पल,
मिलते हैं कुछ फुर्सत के,

इस पर भी गौर फरमाएं....
नया-नया शौक चढ़ा है,
ग्रीन टी पीने का,
साथियों के साथ मैं,
झेल रहा था उस कड़वेपन को,

वो मीठी मुस्कान सी वहां आई,
पर उससे किसी ने नहीं पूछा,
तो मैंने ही पूछ लिया,
बस फिर शुरू हुईं हमारी,
" सिर्फ बातें "
जहां सारा मशगूल हो गया चर्चाओं में,
कुछ समय यूँ ही मेल-मुलाकात,
गुफ़्तगू में ज़ाया होने लगा,
जबकि शहर ने हमारा,
विवाह तक रचा डाला,

फिर एक दिन,
मैंने ही उससे कहा कि,
किस्से सुनाए जा रहे हैं हमारे,
उसने बड़े दिल से कहा,
ये जहान तो हमेशा बैरी रहा है,
हम बस यूँ ही मेल-मुलाकात,
और गुफ़्तगू करते रहेंगे... 

मंगलवार, 12 अप्रैल 2016

परिवर्तन और अनुभव...

वर्ष 2007 में बनाया था मैंने इसे...
 हते हैं कि धरती पर परिवर्तन शाश्वत है। यही वो एकमात्र ऐसी बात है जो सदा होती रहती है निरन्तर, हर क्षण। हम एक परिवर्तन के दौर से लगातार गुजरते रहते हैं लेकिन हम अक्सर इन परिवर्तनों पर गौर नहीं करते और ये हमें महसूस ही नहीं होते। सम्भवतया इसी से दिनचर्या का निर्माण होता है जिससे हम अपना काम नियमित तौर पर कर सकें और यह प्रति क्षण होने वाले परिवर्तन हमारे लक्ष्य के लिए बाधक नहीं बनें। इसलिए हम बस लगातार चलते रहते हैं।

 राजकपूर के गाने 'मेरा जूता है जापानी...' की एक पंक्ति है 'चलना जीवन की कहानी, रुकना मौत की निशानी',  मेरे हिसाब ये दो वाक्य परिवर्तन की इस पूरी परिभाषा को समझाने में सक्षम हैं क्योंकि मनुष्य के जीवन में मौत के बाद ही परिवर्तन का अंत होता है उसके बाद परलौकिक दुनिया की जितनी भी कहानियां है वह सभी काल्पनिक हैं और उनकी सत्यता का कोई प्रमाण नहीं है। मृत्यु शाश्वत है....लेकिन उसके बाद की बातें कोरी कपोल कल्पना।

 खैर परिवर्तन से जुड़ी इतनी बातें करने के पीछे की मंशा 'ज्ञान' देना नहीं थी और ना ही किसी बहुत बड़े खुलासे से पहले की भूमिका बांधना। दरअसल यह बस उन कुछ अनुभवों को साझा करने का प्रयास है जो बीते दो साल के दौरान दफ्तर में काम के दौरान हुए और अब जब उस कड़ी में कुछ नया जुड़ने जा रहा है तो सोचा क्यों न एक बार यादों के पन्ने पलट लिए जाएँ।

 शुरू से मेरा रुझान राजनीतिक ख़बरों की तरफ कम रहता है इसके पीछे वजह ये है कि अब राजनीतिक पत्रकारिता एक तरफ़ा अधिक हो गयी है और वहां सृजन की सम्भावनाएं कम ही दृष्टिगोचर होती हैं। फिर नृत्य, संगीत और लेखन से जुड़ाव भी मुझे राजनीतिक ख़बरों के प्रति आकर्षित नहीं करता।

 इसीलिए घुमक्कड़ी, सिनेमा, नाटक, प्रदर्शनियां, नवाचार, स्वास्थ्य, फीचर और विज्ञान से जुडी ख़बरों पर ही मेरा अधिकतर ध्यान रहता है। इसलिए 'भाषा' में काम करते हुए जब पहली बार मुझे राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों की रिपोर्टिंग का अवसर प्राप्त हुआ तो मैं बहुत प्रसन्न था, क्योंकि इस पूर्व घोषित कार्यक्रम में भी सृजन की सम्भावना बची हुई थी।

 यहाँ मुझे कई बार विज्ञान की ऐसी ख़बरों से दो-चार होना पड़ा जिनका भारतीय समुदाय से कोई लेना-देना नहीं था लेकिन हमेशा उन ख़बरों का अनुवाद करते समय मैं उन ख़बरों में 'ह्यूमन कनेक्ट' को ढूंढने का प्रयास करता और फिर उसे भारतीय समाज से जोड़कर कॉपी बनाने का प्रयास करता। इस वजह से मैंने कई बार अपने सम्पादकों से डांट भी खायी कि खबर का इंट्रो छोटा और तथ्यपरक ज्यादा होना चाहिए और मैं हूँ जो भूमिका में ही दो पैराग्राफ खा जाता हूँ लेकिन फिर जब वो कॉपी ज्यादा छपती तो मैं अपनी बात को स्थापित कर देता कि आखिर हम ख़बरों को पढ़ते क्यों हैं क्योंकि हम 'ह्यूमन' हैं और इसलिए खबरों में 'ह्यूमन कनेक्ट' ढूंढने की मेरी कोशिश होती है।

 'भाषा' में कभी-कभी हमें काम के दौरान फिल्म समीक्षा का भी अनुवाद करना पड़ता है। यह बहुत दुष्कर काम है, इस काम में आपको अपनी रचनात्मकता और सृजनात्मकता को बक्से में बंद करना होता है और बिना किसी फिल्म को देखे हुए उसकी समीक्षा करनी होती है। लेकिन मैं हमेशा इसमें भी प्रयास करता हूँ कि वह समीक्षा मात्र अनुवाद न लगे और इसलिए मैं उसमें अपना अक्स जोड़ ही देता हूँ और बाद में संपादक की थोड़ी डांट खा लेता हूँ।

 खैर ये तो बीते अनुभवों की बात है लेकिन अब जो नया अनुभव प्राप्त करने के लिए मैं अग्रसर हूँ वो यह कि कुछ दिनों के लिए मैं अब अर्थ-वित्त से जुडी ख़बरों से रूबरू होने जा रहा हूँ। मुझे दो साल बाद ऐसा लग रहा है कि फिर से नयी नौकरी मिल गयी हो, क्योंकि ये जो परिवर्तन हुआ है मैं उसे सकारात्मक तौर पर लेता हूँ। जिस सृजन के चलते मैं खुद को राजनीतिक खबरों से दूर रखने  का प्रयास करता हूँ अब क्षेत्र से जुड़ी नयी ख़बरों को बनाने, उनका अनुवाद करने और उसकी रिपोर्टिंग करने के लिए जो उत्सुकता मेरे भीतर है वो एक नए सृजन को जन्म दे रही है क्योंकि कुछ नया सीखना भी तो सृजन है।

 अर्थ जगत में मेरी थोड़ी रूचि पहले से भी रही है क्योंकि देश कैसे चलता है और हम स्वयं कैसे धन से शासित होते हैं यह अर्थ जगत का हिस्सा है और इसे जानना अच्छा ही होता है एवं इसे मैंने खुद से थोड़ा-थोड़ा जानकर ही जाना है।

 उम्मीद है कि यह परिवर्तन नए अनुभव देगा। वैसे भी मेरा मानना है कि जीवन से जुड़ा हर परिवर्तन आपको आपकी स्थापित सीमाओं से बाहर आने का अवसर प्रदान करता है और इस तरह आने वाले बहुत से परिवर्तन आपको सीमाओं से परे ले जाते हैं।

रविवार, 10 अप्रैल 2016

वो बस वाली लड़की...

स्रोत - गूगल सर्च से साभार 

चार दिन से वो मुझे रोज़ बस में मिल रही है,
सुंदर आँखें लेकिन खोयी-खोयी,बस दीदार की मूरत वो, लेडीज़ सीट पर शांत सी बैठी,

और नज़र मिलने पर दोनों शरमाते,मैं भी कनखियों से उसे झांकता, आँखें उसकी न गुस्सा होती,न जाने कब से वो न मुस्कुराई है,


न हँसती, न विरोध जताती,कुछ तो है जो वो मन में दबायी है,क्या पता कंही किसी रोज़, अब मैं रोज उसी बस से आता हूँ,उसके सीट के बगल में खड़ा हो जाता हूँ,उसकी आँखें मेरे सवालों का जवाब दे दें...

Note- To read on facebook please click the link-https://goo.gl/fk85hN

रविवार, 7 जून 2015

मासभर का ये ब्लॉग

समय के साथ गुजरते दिन

 हाँ ब्लॉग की दुनिया में मुझे यूँ तो लगभग पांच साल हो गए हैं लेकिन इस ब्लॉग की उम्र अभी भी एक मास ही हुई है। इस दौरान मैं कई अनुभवों से गुजरा, कुछ को यहाँ दर्ज कर पाया तो कुछ सिर्फ जेहन में ही रह गए। हाँ लेकिन जीवन का हिस्सा बन चुके इस ब्लॉग पर जब भी समय मिलता है मैं चला आता हूँ।

 पहले इस ब्लॉग का नाम मैंने "बस ऐसे ही.… " रखा था,  फिर थोड़े समय बाद बदलकर इसका नाम  "अपने देस में" में भी रखा लेकिन ये नाम इस ब्लॉग के अधूरेपन को पूरा नहीं कर पा रहे थे, क्योंकि एक आम इंसान के तौर पर आप दायरे में नहीं बंधे होते बस आपकी कुछ सीमाएं होती हैं। आप किसी एक विषय पर बात करने के दायरे में नहीं बंधे होते बल्कि हर विषय पर बात करने आपकी कुछ सीमा होती है।

 जब मैंने इसका नाम "नुक्कड़ की चाय" रखा तो लगा कि यह नाम के सूनेपन को ख़त्म करता है, क्योंकि आपके नुक्कड़ पर जो चाय की दुकान होती है उसके यहाँ आपको बहुत से लोग मिलते हैं और उन लोगों के साथ कई कहानियां, खेल-फिल्म-राजनीति-सामाजिक पहलुओं के कई विषय आपसे बस यूँही मिलने चले आते हैं। आपके जीवन से जुड़ी लगभग हर तरह की बात को वहां कई सारे चरित्र चरितार्थ करते हैं। आपके अनुभव सिर्फ आपके नहीं हैं यह भी आपको वहीं पता चलता है।

 उस नुक्कड़ वाले की चाय के साथ जब आप अपने मित्रों, चचेरे-ममेरे-भाइयों, हमउम्र चाचा-मामा और ऑफिस के साथियों के साथ आप गपशप शुरू करते हैं तो किस्से बुने जाते हैं, बचपन की यादें संजोयी जाती हैं, ऑफिस की फ्रस्टेशन बाहर निकाली जाती है और भी ना जाने ऐसे कितने वाकये कह सुनाये जाते हैं जो बस यादों में रहते हैं या आपका  अनुभव भर होते हैं।

दिनों में बीतते मास-साल
 आज इस पोस्ट के साथ ब्लॉग पर मेरी कुल जमा 31 पोस्ट होंगी लेकिन समय पांच साल गुजरा है। समय के साथ उम्र बढ़ी और सोच-भावनाओं में बदलाव, राजनीतिक चिंतनों इत्यादि में परिवर्तन इन सभी पोस्ट में दिखता है। इसलिए आज जब पोस्ट के लिहाज से यह ब्लॉग एक मास पूरा कर रहा है तो बस यही चाहत है कि मेरे घर के नुक्कड़ के पास हमेशा चाय खतकती रहे ताकि जीवन से जुड़ी बातें साझा होती रहें।