| समय के साथ गुजरते दिन |
यहाँ ब्लॉग की दुनिया में मुझे यूँ तो लगभग पांच साल हो गए हैं लेकिन इस ब्लॉग की उम्र अभी भी एक मास ही हुई है। इस दौरान मैं कई अनुभवों से गुजरा, कुछ को यहाँ दर्ज कर पाया तो कुछ सिर्फ जेहन में ही रह गए। हाँ लेकिन जीवन का हिस्सा बन चुके इस ब्लॉग पर जब भी समय मिलता है मैं चला आता हूँ।
पहले इस ब्लॉग का नाम मैंने "बस ऐसे ही.… " रखा था, फिर थोड़े समय बाद बदलकर इसका नाम "अपने देस में" में भी रखा लेकिन ये नाम इस ब्लॉग के अधूरेपन को पूरा नहीं कर पा रहे थे, क्योंकि एक आम इंसान के तौर पर आप दायरे में नहीं बंधे होते बस आपकी कुछ सीमाएं होती हैं। आप किसी एक विषय पर बात करने के दायरे में नहीं बंधे होते बल्कि हर विषय पर बात करने आपकी कुछ सीमा होती है।
जब मैंने इसका नाम "नुक्कड़ की चाय" रखा तो लगा कि यह नाम के सूनेपन को ख़त्म करता है, क्योंकि आपके नुक्कड़ पर जो चाय की दुकान होती है उसके यहाँ आपको बहुत से लोग मिलते हैं और उन लोगों के साथ कई कहानियां, खेल-फिल्म-राजनीति-सामाजिक पहलुओं के कई विषय आपसे बस यूँही मिलने चले आते हैं। आपके जीवन से जुड़ी लगभग हर तरह की बात को वहां कई सारे चरित्र चरितार्थ करते हैं। आपके अनुभव सिर्फ आपके नहीं हैं यह भी आपको वहीं पता चलता है।
उस नुक्कड़ वाले की चाय के साथ जब आप अपने मित्रों, चचेरे-ममेरे-भाइयों, हमउम्र चाचा-मामा और ऑफिस के साथियों के साथ आप गपशप शुरू करते हैं तो किस्से बुने जाते हैं, बचपन की यादें संजोयी जाती हैं, ऑफिस की फ्रस्टेशन बाहर निकाली जाती है और भी ना जाने ऐसे कितने वाकये कह सुनाये जाते हैं जो बस यादों में रहते हैं या आपका अनुभव भर होते हैं।
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| दिनों में बीतते मास-साल |

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