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मंगलवार, 12 अप्रैल 2016

परिवर्तन और अनुभव...

वर्ष 2007 में बनाया था मैंने इसे...
 हते हैं कि धरती पर परिवर्तन शाश्वत है। यही वो एकमात्र ऐसी बात है जो सदा होती रहती है निरन्तर, हर क्षण। हम एक परिवर्तन के दौर से लगातार गुजरते रहते हैं लेकिन हम अक्सर इन परिवर्तनों पर गौर नहीं करते और ये हमें महसूस ही नहीं होते। सम्भवतया इसी से दिनचर्या का निर्माण होता है जिससे हम अपना काम नियमित तौर पर कर सकें और यह प्रति क्षण होने वाले परिवर्तन हमारे लक्ष्य के लिए बाधक नहीं बनें। इसलिए हम बस लगातार चलते रहते हैं।

 राजकपूर के गाने 'मेरा जूता है जापानी...' की एक पंक्ति है 'चलना जीवन की कहानी, रुकना मौत की निशानी',  मेरे हिसाब ये दो वाक्य परिवर्तन की इस पूरी परिभाषा को समझाने में सक्षम हैं क्योंकि मनुष्य के जीवन में मौत के बाद ही परिवर्तन का अंत होता है उसके बाद परलौकिक दुनिया की जितनी भी कहानियां है वह सभी काल्पनिक हैं और उनकी सत्यता का कोई प्रमाण नहीं है। मृत्यु शाश्वत है....लेकिन उसके बाद की बातें कोरी कपोल कल्पना।

 खैर परिवर्तन से जुड़ी इतनी बातें करने के पीछे की मंशा 'ज्ञान' देना नहीं थी और ना ही किसी बहुत बड़े खुलासे से पहले की भूमिका बांधना। दरअसल यह बस उन कुछ अनुभवों को साझा करने का प्रयास है जो बीते दो साल के दौरान दफ्तर में काम के दौरान हुए और अब जब उस कड़ी में कुछ नया जुड़ने जा रहा है तो सोचा क्यों न एक बार यादों के पन्ने पलट लिए जाएँ।

 शुरू से मेरा रुझान राजनीतिक ख़बरों की तरफ कम रहता है इसके पीछे वजह ये है कि अब राजनीतिक पत्रकारिता एक तरफ़ा अधिक हो गयी है और वहां सृजन की सम्भावनाएं कम ही दृष्टिगोचर होती हैं। फिर नृत्य, संगीत और लेखन से जुड़ाव भी मुझे राजनीतिक ख़बरों के प्रति आकर्षित नहीं करता।

 इसीलिए घुमक्कड़ी, सिनेमा, नाटक, प्रदर्शनियां, नवाचार, स्वास्थ्य, फीचर और विज्ञान से जुडी ख़बरों पर ही मेरा अधिकतर ध्यान रहता है। इसलिए 'भाषा' में काम करते हुए जब पहली बार मुझे राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों की रिपोर्टिंग का अवसर प्राप्त हुआ तो मैं बहुत प्रसन्न था, क्योंकि इस पूर्व घोषित कार्यक्रम में भी सृजन की सम्भावना बची हुई थी।

 यहाँ मुझे कई बार विज्ञान की ऐसी ख़बरों से दो-चार होना पड़ा जिनका भारतीय समुदाय से कोई लेना-देना नहीं था लेकिन हमेशा उन ख़बरों का अनुवाद करते समय मैं उन ख़बरों में 'ह्यूमन कनेक्ट' को ढूंढने का प्रयास करता और फिर उसे भारतीय समाज से जोड़कर कॉपी बनाने का प्रयास करता। इस वजह से मैंने कई बार अपने सम्पादकों से डांट भी खायी कि खबर का इंट्रो छोटा और तथ्यपरक ज्यादा होना चाहिए और मैं हूँ जो भूमिका में ही दो पैराग्राफ खा जाता हूँ लेकिन फिर जब वो कॉपी ज्यादा छपती तो मैं अपनी बात को स्थापित कर देता कि आखिर हम ख़बरों को पढ़ते क्यों हैं क्योंकि हम 'ह्यूमन' हैं और इसलिए खबरों में 'ह्यूमन कनेक्ट' ढूंढने की मेरी कोशिश होती है।

 'भाषा' में कभी-कभी हमें काम के दौरान फिल्म समीक्षा का भी अनुवाद करना पड़ता है। यह बहुत दुष्कर काम है, इस काम में आपको अपनी रचनात्मकता और सृजनात्मकता को बक्से में बंद करना होता है और बिना किसी फिल्म को देखे हुए उसकी समीक्षा करनी होती है। लेकिन मैं हमेशा इसमें भी प्रयास करता हूँ कि वह समीक्षा मात्र अनुवाद न लगे और इसलिए मैं उसमें अपना अक्स जोड़ ही देता हूँ और बाद में संपादक की थोड़ी डांट खा लेता हूँ।

 खैर ये तो बीते अनुभवों की बात है लेकिन अब जो नया अनुभव प्राप्त करने के लिए मैं अग्रसर हूँ वो यह कि कुछ दिनों के लिए मैं अब अर्थ-वित्त से जुडी ख़बरों से रूबरू होने जा रहा हूँ। मुझे दो साल बाद ऐसा लग रहा है कि फिर से नयी नौकरी मिल गयी हो, क्योंकि ये जो परिवर्तन हुआ है मैं उसे सकारात्मक तौर पर लेता हूँ। जिस सृजन के चलते मैं खुद को राजनीतिक खबरों से दूर रखने  का प्रयास करता हूँ अब क्षेत्र से जुड़ी नयी ख़बरों को बनाने, उनका अनुवाद करने और उसकी रिपोर्टिंग करने के लिए जो उत्सुकता मेरे भीतर है वो एक नए सृजन को जन्म दे रही है क्योंकि कुछ नया सीखना भी तो सृजन है।

 अर्थ जगत में मेरी थोड़ी रूचि पहले से भी रही है क्योंकि देश कैसे चलता है और हम स्वयं कैसे धन से शासित होते हैं यह अर्थ जगत का हिस्सा है और इसे जानना अच्छा ही होता है एवं इसे मैंने खुद से थोड़ा-थोड़ा जानकर ही जाना है।

 उम्मीद है कि यह परिवर्तन नए अनुभव देगा। वैसे भी मेरा मानना है कि जीवन से जुड़ा हर परिवर्तन आपको आपकी स्थापित सीमाओं से बाहर आने का अवसर प्रदान करता है और इस तरह आने वाले बहुत से परिवर्तन आपको सीमाओं से परे ले जाते हैं।