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| स्रोत - गूगल सर्च से साभार |
चार दिन से वो मुझे रोज़ बस में मिल रही है,
सुंदर आँखें लेकिन खोयी-खोयी,बस दीदार की मूरत वो, लेडीज़ सीट पर शांत सी बैठी,
और नज़र मिलने पर दोनों शरमाते,मैं भी कनखियों से उसे झांकता, आँखें उसकी न गुस्सा होती,न जाने कब से वो न मुस्कुराई है,
न हँसती, न विरोध जताती,कुछ तो है जो वो मन में दबायी है,क्या पता कंही किसी रोज़, अब मैं रोज उसी बस से आता हूँ,उसके सीट के बगल में खड़ा हो जाता हूँ,उसकी आँखें मेरे सवालों का जवाब दे दें...
सुंदर आँखें लेकिन खोयी-खोयी,बस दीदार की मूरत वो, लेडीज़ सीट पर शांत सी बैठी,
और नज़र मिलने पर दोनों शरमाते,मैं भी कनखियों से उसे झांकता, आँखें उसकी न गुस्सा होती,न जाने कब से वो न मुस्कुराई है,
न हँसती, न विरोध जताती,कुछ तो है जो वो मन में दबायी है,क्या पता कंही किसी रोज़, अब मैं रोज उसी बस से आता हूँ,उसके सीट के बगल में खड़ा हो जाता हूँ,उसकी आँखें मेरे सवालों का जवाब दे दें...
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