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सोमवार, 20 जून 2016

राजाराम के साथ चाय पर चर्चा

स्रोत - गूगल इमेजेस

 अरे नहीं-नहीं, मैं स्वर्ग में भगवान राम से भेंट करके नहीं लौटा हूँ। वैसे भी मैं उधर जा ही नहीं सकता क्योंकि उसका लाइसेंस तो "भक्तों" के पास है। मैं तो हाल में ग्वालियर की यात्रा पर गया था तो वहां रास्ते में मेरी चप्पल टूट गयी। मैं उसे सुधरवाने जिस "चप्पलों के डॉक्टर" के पास गया था, बस उनका नाम राजाराम है।

 अब वहां बाजार में वो अकेले थे और काम का ढेर भरा, बस फिर क्या था हमने पकड़े चाय के तीन गिलास और उनमें से एक थमा दिया राजाराम जी को और वंही टेक लगा के बैठ गए, तो बस यह ब्यौरा है उनके साथ हुई चाय पर चर्चा का...

"अरे साब इस चाय की क्या जरुरत थी, आप क्यों ले आये, पहले बोला होता तो हम ही मंगा देते।"
"अरे नहीं चाचा, मेरा मन था पीने का तो ले आये, आप बस चाय पियो और अच्छे से सिलाई करना।"
"आप निश्चिन्त रहें, एकदम मजबूत काम करके देंगे, 25 साल से यही काम तो कर रहे हैं।"
"अरे फिर तो आपका तजुर्बा मेरी उम्र से ज्यादा है, तो चाचा आप यंही ग्वालियर के हैं या बाहर से आकर बसे।"
"नहीं साहब, मैं तो यंही का हूँ, बस बाहर कुछ दिन काम करने गया था लेकिन मन नहीं लगा सो वापस यंही आ गया।"

 अब तक राजाराम जी अपनी चाय खत्म करने के करीब पहुंचे थे कि तभी दो और ग्राहक अपनी चप्पल उन्हें दे गए। उन्हें बहुत अर्जेंट चाहिए थी तो चाचा ने तसल्ली भरी निगाहों से मेरी तरफ देखा, मैं तो आया ही समय काटने था तो मैंने भी सहमति दी कि चाचा निपटा लीजिए। चाचा ने चप्पल में कील ठोकी और ग्राहकों से पैसे लेकर उन्हें चलता किया। तब तक मैं भी फ़ोन पर किसी से बात निपटा रहा था फिर जब मैं निपट चुका तो देखा चाचा के हाथ में सफ़ेद धागा था जिसे वो मोम से रगड़ रहे थे।

"अरे निपट गए।"
"हाँ दो कील ही ठोकना था, अब आपका काम ही निपटाएंगे।"
"चलो ठीक है। अच्छा एक बात बताओ कि मैं यहाँ से किला (ग्वालियर का) जाना चाहता हूँ तो कैसे जाऊं।"
"किले के लिए तो सबसे नजदीक उरवाई गए पड़ेगा, यंही से टम्पू मिल जायेगा तो उस से चले जाना।"
"और चाचा यहाँ चौहान साब कैसा काम कर रहे।"
"साब काम तो सबई करते हैं लेकिन अपने को फायदा हो तब कछु समझें।"
"मतलब"
"अरे साब देखो अपन को काम से का लेना देना, अपन को तो रोटी सस्ती चाहिए बस।"
"लेकिन चाचा अब तो सब बढ़िया है, ऐसा ही सुना है।"
"सब सुना ही है ना, हो रहा हो तो बताओ। अब आप तो दिल्ली से आये हैं आप ही बताओ कि वहां वो केजरीवाल कौनो काम कर रहा।"
"अरे चाचा उसे काम करने कहाँ दे रहे लोग।"
"साब ये तो कोरी कोरी बात है। असल बात बताओ।"
"असल में तो मैं बता ही नहीं सकता क्योंकि मेरा वास्ता उससे या उसके काम से पड़ा नहीं।"
"ऐसा ही यहाँ है साब चौहान साब के काम से हमारा वास्ता पड़ा ही नहीं।"

 इसके बाद मेरे पास कोई जवाब नहीं था और न ही बहस बढ़ाने की कोई वजह क्योंकि चाचा ने मुझे एक ही पंक्ति में चुप करा दिया था। फिर मैंने सोचा कि क्यों न मोदी जी (नरेंद्र) का जिक्र छेड़ा जाये, शायद चाचा उनके बारे में कुछ कहें।

"अच्छा चाचा एक बात बताओ ये मोदी जी कछु करेंगे या नहीं।"
"देखो भाईसाब उनने काम तो बहुत सारे करने की कही थी, लेकिन अभी तो मन की बात ही सुनी है।"
"ये तो मजाक वाली बात हो गयी, असल में आपको क्या लगता है, मोदी जी करेंगे कुछ।"
"अरे साब हम भी अख़बार सुनते हैं, टीवी देखते हैं। आपई बताओ गरीब की सुनै है कौनो।"
"वो तो ठीक है चाचा लेकिन मोदी जी तो बहुत काम करते हैं।"
"देखो साब हम बैठते पटरी पर, और दिन के चार आने कम लेते कि बस रोटी कहकर डरे रहें। अब कौनो सरकार आये, मोदी आये या केजरीवाल आये हमाये लाने सब वैसा का वैसा ही है।"

 इसके बाद चाचा से दो चार बातें और हुई। तब तक मेरी चप्पल भी सिल गयी। उनके साथ इस चाय पर चर्चा का कोई निष्कर्ष तो नहीं निकला लेकिन फिर मेरे दिमाग में एक बात जरूर रह गयी।

 चुनाव, नेता, पार्टी और उनके वादों को लेकर ये गरीब जनता जब इतनी निश्चिन्त है तो वो वोट किस आधार पर देती है और क्यों देती है ? जब वो जानते हैं कि सरकार और पार्टियां कुछ नहीं करेंगी तो वो सरकार में उठापटक क्यों कर देते हैं ? क्यों वो हमेशा इस आस में रहते हैं कि उन्हें कुछ मिलेगा ? क्या यही हमारा संविधान उन्हें अब तक दे पाया है...एक अनोखी सी तसल्ली जिसमें बेचैनी तो है लेकिन छटपटाहट नहीं और उसे दूर करने का जुझारूपन भी नहीं। मैं अभी इन प्रश्नों के जवाब तलाश रहा हूँ, अगर आपको किसी भी एक प्रश्न का जवाब मिले तो बताना... 

रविवार, 8 मई 2016

दिल छीछालेदर, फेंक जूता लेदर


 ये बॉलीवुड फिल्म "गैंग्स ऑफ वासेपुर" का एक गाना है जिसके शब्दों को मैंने बस थोड़ा इधर-उधर करके लिखा है। अब लिखूं भी क्यूँ नहीं, हम सब अब इसी काम में तो लगे पड़े हैं, एक-दूसरे की छीछालेदर करने और आपस में एक-दूसरे पर जूता उछालने में।

  हाल के दिनों में आप ज़रा नज़र दौड़ाएं तो आपको समझ आएगा कि हम कहाँ जा रहे हैं। वैसे मुझे कहने का हक़ नहीं है लेकिन फिर भी गौर करें कि राजनीतिक जीवन का हमारे निजी जीवन में कितना अतिक्रमण हो गया है। आम तौर पर राजनीति और निजी जीवन के बीच एक तटस्था रहनी चाहिए लेकिन पिछले कुछ सालोंं में हम नितांत राजनीतिक हो गए हैं और समाज के परिदृश्य से ये ज्यादा अच्छा नहीं है। 

 हालाँकि ये मेरा निजी मत हो सकता है कि इस तरह हमारा राजनीतिक होते चले जाना या यूँ कहूं कि राजनीति में पगलाए जाना सामाजिक जीवन को गर्त में ले जाने वाला है वंही कुछ लोग इसे लोकतंत्र की मजबूती मान सकते हैं।

 लोकतंत्र में लोग किसी एक पार्टी के समर्थक या किसी दूसरी पार्टी के विरोधी होते रहे हैं लेकिन आप देखें इस जमात में "भक्त" एक नया शब्द आया है। भक्त कहना हमारे लोए थोड़ा सुविधाजनक है क्योंकि भारत में आपको इनके अनगिनत प्रकार मिलेंगे जिनमें राजनीतिक भक्त भी शामिल रहे हैं लेकिन आजकल इसका चलन थोड़ा ज्यादा हो गया है।

 लेकिन अब इस जमात का काम तर्कों और कुतर्कों पर बहस करने तक सीमित नहीं रहा बल्कि अब ये एक दूसरे की छीछालेदर और जूता फिंकाई का काम करने पर ही अपना ध्यान लगाते हैं। इसके दो फायदे हैं नेता-अभिनेता का प्रचार हो न हो इनकी साख जरूर बढ़ जाती है।

 अब इसे ज़रा ऐसे समझें कि जब स्मृति ईरानी की शिक्षा पर प्रश्न खड़ा हुआ तो हमने राहुल गांधी, तोमर इत्यादि सबकी शिक्षा पर प्रश्न खड़े कर दिए। मतलब सनम हम तो डूबेंगे ही लेकिन साथ तेरा वहां भी ना छोड़ेंगे। फिर वो चाहे बाद में गिरिराज सिंह, कठेरिया और भी ना जाने कितने नाम आये लेकिन हमारी कोशिश अपना दामन बचाने से ज्यादा दूसरे का गन्दा करने की रही।

 जनाब हम कब कह रहे हैं कि हमे पढ़े-लिखे नेता की जरुरत है क्योंकि मनमोहन सिंह पढ़े-लिखे हैं और हमने उनकी सरकार देखी है। इसके अलावा लालू यादव कथित तौर पर नहीं पढ़ें हैं, हमने उनकी भी सरकार देखी है तो नेता की पढ़ाई से भारतीयों को उतना फर्क नहीं पड़ता।

 पड़ेगा भी कैसे, हम तो अभी तक सामाजिक तौर पर बच्चों की पढ़ाई की जद्दोजहद में व्यस्त हैं। हम उन्हें पढ़ाई में लगाएं या कमाई में , बेटों को पढ़ाएं या बेटियों को हम इसी में पिसे जा रहे हैं तो भला नेताओं की पढ़ाई का हम क्या आचार डालेंगे ?

 माना कि आप पढ़े नहीं हैं तो फिर शर्माना कैसा? भैया दुनिया में ऐसे बहुत से लोग हैं जिन्होंने बिना पढ़े ही बड़े काम किये हैं।  एडिसन, सचिन तेंदुलकर ऐसे ही नाम हैं। तो आप शरमाते क्यों हैं बल्कि आप कुछ ऐसा सकारात्मक क्यों नहीं करते कि लोगों के सामने मिसाल पेश की जा सके कि देखो बिना पढ़ा-लिखा इंसान भी कमाल कर सकता है।

 जनाब तकलीफ आपके गैर पढ़े-लिखे होने से किसी को कहाँ है समस्या तो आपके दोगलेपन से है जो सामने कुछ बात करते हैं और पीठ पीछे कुछ। यही हाल आपने "भारत माता की जय" के नारे का भी किया।

 खैर राजनीति में ये जूता फिंकाई होती रही है वो बात और है कि मम्मी-पापा ने बचपन में ही बता दिया था कि "आजकल जमाना बड़ा ख़राब है" नहीं तो हम इसे ही ज़माने का सच मान बैठते।


लेकिन अब हम एक नए तरह की छीछालेदर बॉलीवुड में भी देख रहे हैं। मान लो कि कंगना-ऋतिक का प्रेम प्रसंग रहा और ये खबर लीक भी हो गयी लेकिन उसके बाद क्या..? हम और वो दोनों भी एक दूसरे की छीछालेदर करने उतर आये फिर बीच में सुमन-सुत भी कूद पड़े।

 आप इस बात को छोड़ दीजिये, हमने तो रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन के "अंधों में काना राजा" वाली बात तक की छीछालेदर की जबकि उन्होंने सिर्फ एक मुहावरे का प्रयोग करके यथास्थिति बताने की कोशिश की थी। वो तो भले मानुष ठहरे राजन साहब जो माफ़ी मांग ली वरना लोग उनके बयां के साथ-साथ उनकी भी छीछालेदर करना जल्दी ही शुरू कर देते।

 अब ज़रा इसे गौर से समझें कि ऐसा क्यों हुआ? क्योंकि हम वास्तव में नितांत राजनीतिक होते जा रहे हैं और हमारा अब हमने छीछालेदर को प्रचार बना दिया है। पहले हम कीचड़ मुंह पर लगने पर साफ़ कर लेते थे लेकिंन अब साफ़-सफाई तो हम झाड़ू की फोटो के साथ करते हैं हाँ लेकिन कीचड़ हाथ में लेकर दूसरे पर उसी समय फेंक देते हैं।

 इसलिए तो मैंने शुरुआत में ही कहा कि हमारा समाज "एक दूसरे की दिल से छीछालेदर" और "फेक लेदर का जूता नहीं" बल्कि "फेंक जूता लेदर" की ओर बढ़ रहा है। गौर से देखिये अपने आस-पास जो राजनीति के नाम पर हो रहा है वो क्या वाकई राजनीति है या बस हमने छीछालेदर को ही राजनीति बना दिया है या जिस समाज की ओर हम बढ़ रहे हैं वो अच्छा समाज है या नहीं, ये हमें सोचना होगा।

 बाकि आप जावेद अख्तर साहब का संसद का आखिरी भाषण सुनिए एवं समझिए और "भक्तों" को ढिंढोरा पीटने दीजिये क्योंकि वो इसी काम में माहिर हैं।

राज्यसभा टीवी के यूट्यूब चैनल से साभार