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मंगलवार, 16 नवंबर 2010

अब भी बाकी है!


काली रात का अँधियारा,
डूबते को तिनके का सहारा,
हवा में फैला कोलाहल सारा,
बेगुनाहों की वो सुगबुगाहट, 
अब भी बाकी है!


मध्यरात्रि का अर्द्ध प्रहर,

फैला बस ज़हर ही ज़हर,
बरसा क्या भयानक कहर!
अनजान से खतरे की आहट,
अब भी बाकी है!


मासूम-बेगुनाह-निर्दोष,
भाग रहे बेसुध-बेहोश,
तय करें किस, किसका दोष?
गले में अटकी वो हिचकिचाहट, 
अब भी बाकी है!


दोष छिपाने के प्रयास हैं उत्तम,
अन्याय मिला बड़ी देर से सर्वोत्तम,
न्याय की मार-मार रहा उच्चत्तम,
ह्रदय में इसकी कड़वी कड़वाहट, 
अब भी बाकी है!


सिसक-सिसक साँस लेती सिसकियाँ,
गड़े दर्द ने बाहर निकाल ली उँगलियाँ,
जिंदगी जीना भूल गई अनगिनत जिंदगियां,
आँखों में लगते धुंए की वो चिनमिनाहट,
अब भी बाकी है!


(सन्दर्भ भोपाल गैस त्रासदी)