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शनिवार, 27 जुलाई 2013

सबला बनने को प्रेरित करना है।

साभार: टच टैलेंट डॉट कॉम
 बात ही ऐसी है कि उसे बयां करना जरूरी है। मैं रोजना की तरह बस से दिल्ली विश्विद्यालय के दक्षिण परिसर जा रहा था अपनी क्लास करने के  जा रहा था। सवारियां चढ़ रही थीं, उतर रही थीं और बस चलती जा रही थी। थोड़ी देर में बंगला साहिब के स्टैंड से दो लड़कियां बस में चढ़ी। देखने में तो कॉलेज की छात्रा ही लग रही थीं। उनमें से एक मेरे बगल में आकर खड़ी हो गयी, महिला सीट थी, मैं समझ गया, वो मुझसे कुछ कहती मैंने खुद ही खड़े होकर कहा कि सीट आप ले लीजिये। वो सीट पर बैठ गयी और उसके साथ वाली दोस्त वंही खड़ी हो गयी और मैं भी उनके बगल में ही खड़ा रहा और बस फिर अपने गंतव्य के लिए चलने लगी।

 बस कुछ देर में सरदार पटेल मार्ग से गुजर रही थी, तभी मालचा मार्ग के पास एक स्टैंड से अधेड़ सी महिला बस में सवार हुई। वो भी महिला सीट की तलाश में थी और तभी उस बैठी लड़की ने खुद ही कहा की आंटीजी आप बैठ जाइये। उस महिला ने धन्यवाद तक नहीं दिया, जो मुझे थोड़ा अजीब लगा, जब कभी मेरे साथ ऐसा होता तो अंग्रेजी में ‘‘यू शुड से थैंक्स टू मी’’ बोलकर मैं अपने परोपकार के अहम् को संतुष्टि दिला ही लेता था।

 बस में सीट पर बैठने के कुछ देर बाद पता नहीं उस महिला को क्या हुआ उसने अपनी पास वाली महिला से बातें करते हुए उन दोनों लड़कियों के कपड़ों को लेकर तरह-तरह की टिप्पणियां शुरू कर दी। हालाँकि बगल में बैठी महिला के हाव-भाव से लग रहा था कि उसे इन सब में कोई रूचि नहीं है, फिर भी वो महिला जारी रही। मुझे उस महिला पर गुस्सा आ रहा था। अब उन लड़कियों ने सिर्फ साधारण-सी जींस और टीशर्ट ही पहनी हुई थी, जो उस गर्मी में सही भी थी। मन में आया कि उस महिला को जमकर फटकार लगा दूँ, लेकिन मेरे दिमाग में उस समय कुछ और ही चल रहा था और मैंने फिर वही किया।
मैंने अपने बगल में खड़ी उस लड़की से कहा ‘‘एक बात बताओ जब इस तरह के कपड़ों से तुम्हें कोई परेशानी नहीं और न ही तुम्हारे माता-पिता को तो तुम इनकी ये बकवास सुन क्यूँ रही हो ? जवाब देकर इन्हें शांत क्यूँ नहीं करा देती।’’ मेरे कहने का असर हुआ और वो लड़की समझ गयी कि मैं क्या कहना चाहता हूँ। उसके बाद जो हुआ उसे मैं बयां नहीं करूँगा। हाँ, लेकिन वो महिला अगले ही स्टैंड पर उतर गयी।

 उस दिन मुझे समझ आया कि क्यूँ आखिर इस देश में औरत को ही औरत का शत्रु समझा जाता है क्यूंकि हमने उसके अंतःमन को प्रदूषित कर रखा है और एक बात जो समझ आई वो यह कि हमेशा जरूरी नहीं कि हम महिलाओं के लिए बाप,भाई या पति की ढाल बनकर खड़े हों यह तो हमें तब करना चाहिए जब इसकी आवश्यकता हो अन्यथा कोशिश यह हो कि हम उसे तलवार बनने को प्रेरित करें ताकि कम से कम अपने लिए तो वो लड़ सके। कब तक सहारा देकर उसे अबला बनाये रहेंगे ? उसे सही दिशा में प्रेरित कर हमें सबला बनाना है।

नोट- इस लेख का संपादित अंश तहलका में प्रकाशित हो चुका है। अगले लेख में वह संपादित अंश पढ़ें। लिंक यहाँ साझा कर रहा हूँ - हर किसी को अपने हिस्से का विरोध करना होगा