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शुक्रवार, 22 दिसंबर 2017

एडिटिंग की मिसाल है, एन इन्सिग्निफिकेंट मैन

फिल्म का एक दृश्य
 दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की "आम आदमी पार्टी" ने अपने पांच साल पूरे होने का जश्न हाल ही में मनाया है। पार्टी के भीतर और पार्टी से अलग हुए नेताओं की टिप्पणियां भी हुईं और विपक्षियों के आरोप-प्रत्यारोप भी। पार्टी से नाराजों के भी बोल भी रहे और पार्टी के रास्ता भटक जाने की बातें भी। इसी समय में हमारे बीच एक फिल्म आई  "एन इन्सिग्निफिकेंट मैन", मैं इसे डॉक्युमेंट्री इसलिए नहीं कहना चाहता क्योंकि ये फिल्म उससे बहुत आगे जाती है।

 इस फिल्म के राजनीतिक पहलू पर बहुत बातें हुई हैं। इससे जुड़े लोगों के बारे में भी बहुत बातें हुईं हैं। लेकिन मेरा मानना है कि इस फिल्म ने एक बहुत बड़े स्टीरियोटाइप को तोड़ा है। यह मैं इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि मैंने इसे महसूस किया है। फिल्म रिलीज हुई 17 नवंबर को और मैं इसे 19 को ही देख आया।

 आमतौर पर भारत में दर्शक इस तरह की फिल्मों के लिए थिएटर में पैसा नहीं खर्च करता। लेकिन इस फिल्म में कुछ अलग है, मैंने दिल्ली के अनुपम साकेत में जब यह फिल्म देखी तो हॉल खचाखच भरा पाया। इसमें भी खास बात देखने वालों में युवाओं की संख्या ज्यादा होना लगी।

 अब लोग कह सकते हैं कि केजरीवाल की ब्रांड वैल्यू इससे जुड़ी है इसलिए भीड़ चली आयी। लेकिन मेरे हिसाब से सचिन की "बिलियन ड्रीम्स" को भी ऐसा रिस्पांस नहीं मिला था, और सचिन तो पीढ़ियों पर राज करने वाला ब्रांड रहे हैं। तो फिर क्या खास है इस फिल्म में जो इसे लोगों के लिए इतना रुचिकर बनाता है।

 मेरे हिसाब से इस फिल्म की एडिटिंग इसकी जान है और यही इसे इतना खास बनाती है। मैंने शुरू में ही कहा कि इसे डॉक्युमेंट्री कहना इससे जुड़े लोगों की काबिलियत को काम आंकना होगा। मुझे नहीं लगता कि इसके निर्देशकों के पास किसी तरह के फुटेज की कमी रही होगी, लेकिन उन फुटेजों का कैसे और कहाँ इस्तेमाल करना है। कैसे फिल्म की कहानी को आगे बढ़ाना है, ये काम किया है इसकी एडिटिंग ने।

 फिल्म में एक दृश्य जो मुझे प्रभावित कर गया वो था केजरीवाल का सत्याग्रह फिल्म देखकर थिएटर से बाहर निकलना और एक टीवी रिपोर्टर को इंटरव्यू देना। उस दौरान कैमरा का एक फोकस केजरीवाल के अपनी शर्ट के कोने से साथ खेलने को दिखाता है। यह अपने आप में किसी फिल्म के नायक के चरित्र को स्थापित करने वाला दृश्य है।

 यह किसी फीचर फिल्म की तरह ही अपने नायक को गढ़ने का दृश्य है। फिर धीरे-धीरे फिल्म में योगेंद्र यादव का असर दिखना शुरू होता है, जो बताता है कि फिल्म में नायक है लेकिन एक प्रति नायक भी है। प्रति नायक शब्द का इस्तेमाल हूँ क्योंकि योगेंद्र खलनायक नहीं हैं।

 चूँकि नायक अरविन्द हैं तो फिल्म में खलनायक होना तो जरुरी है ही, और इसके लिए चुना गया उस समय दिल्ली की मुख्यमंत्री रहीं शीला दीक्षित को। उनके ऐसे फुटेज इस्तेमाल किये गए जो आपको बरबस हंसने पर मजबूर कर देंगे। फिर वह चाहें चुनाव प्रचार के दौरान दलेर मेहंदी के गाने पर उनका मेज थपथपाना हो या चुनाव नामांकन के दौरान अरविन्द के ऊपर जोक सुनाना। यह उनके चरित्र को फिल्म में पूरी तरह खलनायक तो नहीं लेकिन उसके लगभग बराबर ही रखता है।

 फिल्म बोझिल न लगे इसलिए इसमें एक मसाला फिल्म के लगभग सभी मसाले दिखते हैं। जब आप पार्टी की नेता संतोष कोली की मौत हो जाती है तो उसके अगले दिन की एक सभा का फुटेज फिल्म में इस्तेमाल  किया गया है। उस दृश्य में अरविन्द के चेहरे पर वह सारे भाव नज़र आते हैं जो इस घड़ी में हक़ीक़त में होने चाहिए और ये दृश्य फिल्म के नायक को दर्शक के करीब लाता है।

 ऐसा ही एक और दृश्य है जहाँ एक मोहल्ला सभा में एक महिला अरविन्द को पावर देने की बात करती है। इस फुटेज को फिल्म में रखने का निर्णय बताता है कि निर्देशक अपने चरित्र को कैसे गढ़ना चाहता है। फिल्म में एक दृश्य कुमार विश्वास और अरविन्द के बीच हास-परिहास का भी है। यह हमारे नेताओं के बीच आम इंसान की तरह होने वाले हंसी मजाक के साथ-साथ उनकी एक मिथक छवि को तोड़ने का भी काम करता है।

 भारतीय समाज अपने नेता को इंसान मानने के लिए तैयार ही नहीं है। वह या तो कोई दैवीय पुरुष, शक्ति या परमावतार होता है, वह इंसान नहीं होता। इसलिए जब हम उनके लिए कहानी या फिल्म लिखते हैं तो वह "लार्जर देन लाइफ" होती है। एक समय में अरविन्द ने इस छवि को तोडा था और यह फिल्म उसी को आगे बढाती है। यह हमे हमारे नेताओं को अपने बीच का समझने में मदद करती है।

 और अंत में एक बात फिल्म बनाने वालों के लिए, हिंदी में "मुख्यमंत्री" सही शब्द है, "मुख्यामंत्री" नहीं जैसा कि फिल्म के अंत में लिखा दिखाया गया है।

फिल्म के निर्देशक विनय और खुशबू

बुधवार, 26 अप्रैल 2017

बेग़म जान : बेहतरीन हुनर की बरबादी

 हुत दिनों से कुछ लिखा ही नहीं या यूँ कहें कि लिखने का मन ही नहीं। लेकिन जब आज सोचा कि कुछ लिखा जाए तो ख्याल आया कि इसकी शुरुआत किसी फिल्म से क्यों न की जाये?


 सोच तो रहा था कि "बेग़म जान" पहले ही देख लूंगा लेकिन जब आज देखा तो लगा कि सही किया जो इसे पहले नहीं देखा। हमारे यहाँ किसी के हुनर को बर्बाद कैसे किया जाता है, इसकी बानगी है ये फिल्म। कई बड़े नाम इस फिल्म में हैं जैसे नसीरुद्दीन शाह, आशीष विद्यार्थी , रजित कपूर, राजेश शर्मा, इला अरुण और विद्या बालन, जिन्होंने तरह-तरह के किरदार में अपने अभिनय का लोहा मनवाया है। लेकिन 'बेग़म जान' की लचर कहानी इनकी इस काबिलियत का ठीक से इस्तेमाल ही नहीं कर पाती। 

 फिल्म कहानी इतनी है कि हिंदुस्तान और पाकिस्तान का बंटवारा हो गया है। दोनों देशों के बीच सीमा रेखा खींची जानी है जो "बेग़म जान" के घर के बीच में से निकलती है। बेग़म जान के किरदार में विद्या बालन हैं और वो एक तवायफ़खाना की मालकिन है जिसके बीच से ये सीमा गुजरनी है। 

 फिल्म की इतनी पटकथा समझ में आती है और जायज़ भी लगती है। इतनी सी  कहानी को लेकर अगर चंद्रप्रकाश द्विवेदी जैसा कोई निर्देशक होता तो "पिंजर" जैसी शानदार फिल्म बना सकता था।

 लेकिन निर्देशक सृजित मुखर्जी बस यंही से अपनी कहानी से भटक जाते हैं जिसमें न तो वेश्याओं की संवेदनाएं हैं, न विभाजन की त्रासदी का असर और न ही अपने कोठे को बचाने के लिए जान दे देने के पीछे का तर्क, बस सब मरते जा रहे हैं , लेकिन क्यों, इसका जवाब कहीं भी फिल्म में नहीं हैं। 

 अगर फिल्म में विद्या बालन के दो चार संवाद के अलावा कुछ देखने लायक है तो बस आशीष विद्यार्थी और रजित कपूर के आधे-आधे चेहरों के साथ शूट किये गए कुछ दृश्य जिसके भाव भी अच्छे हैं और सिनेमाटोग्राफी भी बढ़िया है। यहाँ तक कि नसीर भी कोई असर नहीं छोड़ते। इससे बेहतर नवाब या राजा का किरदार उन्होंने "डेढ़ इश्क़िया" में किया है। इससे पहले हमने "इश्किया" में नसीर यार विद्या को साथ देखा है और वो दोनों किरदार आपके फलक पर आज भी ज़िंदा हैं लेकिन यहाँ दोनों ही फीके हैं।

 बाकी किसी किरदार में कोई जान नहीं है और न ही वो कोई प्रभाव छोड़ने वाला है। सिर्फ विद्या किसी तरह अपने कन्धों पर फिल्म को ढोती हुई नजर आ रही हैं। चंकी पांडे ने यूँ तो फिल्म में खलनायक की भूमिका निभाई है लेकिन  सिरहन नहीं पैदा करता बल्कि उन पर उनकी हाउसफुल सीरीज का छिछोरापन ही हावी दिखता है।

हालाँकि लाड़ली के किरदार में ग्रेसी का कपड़े उतारने वाला दृश्य पूरी तरह से अचंभित करने वाला है जहाँ उसकी आँखें अभिनय कर रही हैं। 

 इनमें से किसी की भी अभिनय क्षमता पर कोई सवाल नहीं हैं लेकिन अच्छे हुनर की बर्बादी ऐसे ही की जाती है। बहुत साल पहले "चाइना गेट" नाम से एक फिल्म आयी थी, तब मैं बहुत छोटा था तो उतनी समझ नहीं थी लेकिन जब हाल में उसे मैंने दुबारा देखा तो समझ में आया कि वो फिल्म कम बल्कि एक वृद्धाआश्रम ज्यादा थी।

 उस फिल्म में भी नसीर के अलावा अमरीश पुरी, जगदीप, ओमपुरी, डैनी जैसे अपने दौर के मंझे कलाकार थे। लेकिन उस फिल्म में नया कुछ भी नहीं था, क्योंकि हम इन कलाकारों को उसी रूप में देखने के आदि थे। इसी तरह "बेग़म जान" इन बड़े अभिनेताओं की नुमाइश है जो कुछ कर नहीं रहे हैं लेकिन बस कर रहे हैं। हम ये क्यों नहीं समझते कि अच्छी फिल्म अच्छी कहानी पे बनती है न की यूँ अभिनेताओं के जमावड़े से। 

 "बेग़म जान" की कमी सिर्फ उसकी लचर कहानी नहीं है, बल्कि फिल्म ट्रीटमेंट के हिसाब से भी ख़राब है। फिल्म में पहनावे और भाषा पे कोई ध्यान नहीं है। यदि वो होता तो शायद फिल्म को झेल पाना थोड़ा और आसान होता। विद्या अकेले के अलाव निर्देशक को सबको जिम्मेदारी देनी चाहिए थी और खुद भी थोड़ा ईमानदारी से काम करते तो फिल्म अच्छी होती। 

 अब देखना न देखना आपकी मर्जी है। मुझे तो ये ऐसी ही लगी। वैसे अगर आपने "पिंजर" न देखी हो तो एक बार देख जरूर लेना। 

सोमवार, 11 जनवरी 2016

बनारसीपन की पहचान है 'मोहल्ला अस्सी'

  हो सकता है कि इसे लिखने में मैंने काफी देर कर दी हो लेकिन मैं चाहता था कि  पहले किताब को पढ़ लिया जाए उसके बाद ही इस फिल्म को देखा जाए। ‘मोहल्ला अस्सी’, जी हाँ मैं इसी फिल्म की बात कर रहा हूँ।

 डाॅ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी ने इसी नाम से फिल्म बनाई है, जो बनारस की पृष्ठभूमि पर आधारित काशीनाथ सिंह के उपन्यास ‘काशी का अस्सी’ पर आधारित है। अगर इस फिल्म का आप पूरा रस लेना चाहते हैं तो पहली सलाह है कि ‘काशी का अस्सी’ जरूर पढ़ लें। हां अगर नहीं भी पढ़ेंगे तो भी इस फिल्म को समझने में कोई परेशानी नहीं होगी और फिल्म का देसीपन आपको लुभाएगा, लेकिन अगर उपन्यास पढ़ लिया तो रस का आनंद आएगा।


पहले परिचय थोड़ा ‘काशी का अस्सी’ से, इसके लेखक वही काशीनाथ सिंह हैं। हम यहां बात उनके उपन्यास या यूं कहें कि समान पात्रों को लेकर पिरोई गई पांच कहानियों की कर रहे हैं। जो लोग बनारस में रहे हैं या जिन्होंने उसे नजदीक से देखा है, तो वह इस किताब से अच्छी तरह परिचित होंगे और इसकी बातें भी उनके लिए बिल्कुल सामान्य होंगी। लेकिन जो लोग बनारस नहीं गए या जिन्हें वहां का सउर नहीं, उनके लिए इस किताब का मतलब है कि वह इसे पढ़कर भारत की अपनी देशज परंपराओं से कुछ हद तक वाकिफ हो सकते हैं, खासकर अंतिम अध्याय में कहानी सुनाती मंडलियां कई गूढ़ बातों को गानों की रवां में ही कह जाती हैं।

 सजीव से पात्र और सजीव सा उनका आकर्षण यही इस किताब की खासियत है और यह बात मैं अभिभूत होकर नहीं कह रहा हूं, लेकिन जो लोग छोटे शहरों से संपर्क रखते हैं उन्हें यह बात अच्छी तरह मालूम होगी कि हर शहर की अपनी एक संस्कृति और भाषा होती है और इस किताब में बनारस के सिर्फ एक मोहल्ले की कहानी है लेकिन वह आचरण में पूरे बनारस की तस्वीर पेश करती है। बाकी आप इस किताब को पढ़कर खुद ही पता लगाएं सारा कुछ मैं ही लिखूंगा क्या ?

 अब बात करते हैं ‘मोहल्ला अस्सी’ की, कहते हैं कि फिल्म की कहानी का कथानक कुछ भी और किसी भी दौर का हो, लेकिन वह जिस देशकाल में बनी है वही उसके लिए सबसे महत्वपूर्ण है। डाॅ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी को हम गंभीर विषय उठाने के लिए जानते हैं फिर वह चाहे धारावाहिक के रूप में ‘चाणक्य’ हो या फिल्म के रूप में ‘पिंजर’ और ‘जेड प्लस’, सभी के विषय प्रभावी और समाज को लगभग आईना दिखाने वाले।

 ‘मोहल्ला अस्सी’ आधिकारिक रूप से पर्दे पर प्रकट नहीं हुई इसे आपको गैर कानूनी तरीके से इंटरनेट की सेवा का प्रयोग करते हुए ही देखना होगा। अब मौजूं सवाल यह है कि यह रिलीज क्यों नहीं हुई तो इसकी एक वजह यह है कि इसमें गालियों के इस्तेमाल में कोई पशोपेश नहीं रखा गया है, रखा भी नहीं जा सकता था क्योंकि ‘काशी का अस्सी’ भी वैसा ही है। अब जिस देश में सेंसर बोर्ड फिल्मों में कुछ शब्दों पर पाबंदी लगा दे वहां ‘भोसड़ी के’ शब्दयुग्म की भरमार के साथ कोई फिल्म कैसे रिलीज हो सकती है।

 खैर बात हो रही थी फिल्म के देशकाल की, यूं तो फिल्म की कहानी 90 के दशक के बदलाव के दौर की कहानी है जिसने हमें बहुत कुछ दिया लेकिन समाज से बहुत कुछ छीना भी और यह फिल्म उसी उधेड़बुन को ‘पप्पू की दुकान’, ‘धर्मनाथ पांड़े’ और बनारस के घाट किनारे वाले ‘मोहल्ला अस्सी’ से पेश करती है। इसमें बात है मंडल आयोग की, बाबरी मस्जिद विध्वंस की और एक आयातित संस्कृति से खुद को बचाने की जद्दोजहद की।

अब चूंकि इस समय सरकार देश में भाजपा की है और फिल्म कहीं ना कहीं उनको कठघरे में खड़ा करने का काम करती है तो इसका रिलीज होना लाजिमी नहीं लेकिन उसके बबवजूद ऐसे समय में इस फिल्म का बनना इसकी स्वीकार्यता को बढ़ा देता है।

 खैर बातें बहुत हुईं, अब फिल्म पर आते हैं। किताब में कई किरदार हैं और उनकी कई कहानियां लेकिन फिल्म में आप इतना घालमेल नहीं कर सकते तो फिल्म मुख्य पात्र धर्मनाथ पांड़े के किरदार के इर्द-गिर्द घूमती है।

 हालांकि मुझे इस किरदार में सनी देओल मिसफिट ही लगे क्योंकि जिन दृश्यों में चरित्र का काईंयापन दिखाना था वहां उनका चेहरा भावशून्य नजर आता है। इतना ही नहीं इस किरदार में थोड़ा तोंदू सा व्यक्ति ज्यादा सटीक लगता ना कि कोई बलिष्ठ व्यक्ति जैसे कि सनी देओल हैं। हो सकता है कि उन्हें फिल्म की थोड़ी सी स्टार वैल्यू बढ़ाने के लिए रखा गया हो क्योंकि उनके अलावा पूरी फिल्म में कोई सितारा हैसियत वाला कलाकार नहीं है।

 देखा जाए तो बनारस के पंडा के किरदार में सौरभ शुक्ला ज्यादा जंचते हैं।  बेहतर ही होता यदि वे धर्मनाथ पांड़े के किरदार में होते, क्योंकि फिल्म का विषय ऐसा है कि उसे सनी देओल जितने स्टारडम की जरूरत नहीं थी।

 अगर मैं इसी संदर्भ में बात करूं तो बनारस की पृष्ठभूमि पर बनी फिल्म ‘धर्म’ में पंकज कपूर अपने कंधों पर पूरी फिल्म को खड़ा रखते हैं, वहां स्टार की जरूरत नहीं थी, खैर सनी इतने भी फीके नहीं लगे हैं, वह फिल्म को बांधे रखते हैं।

 फिल्म में धर्मनाथ पांड़े की पत्नी सावित्री के किरदार में हैं साक्षी तंवर। उन्होंने अपने किरदार के साथ पूरा न्याय किया है और वह फिल्म में उपन्यास की सावित्री को जीवंत रूप देने में वह पूरी तरह समर्थ रही हैं। लेकिन रवि किशन अब सच में बोरियत महसूस कराने लगे हैं क्योंकि ‘वेलकम टू सज्जनपुर’ से लेकर अब तक उनके अभिनय में लेशमात्र भी अंतर नहीं आया है और हर फिल्म में उनका अभिनय समान ही रहता है।

 बाकी अन्य चरित्र कलाकार ही इस फिल्म की जान हैं फिर वह चाहें वकील साहब हों या प्रोफेसर साहब या बारबर बाबा सभी चरित्रों को पुस्तक से जैसा का तैसा लिया गया है। कई पात्रों के संवाद भी सीधे पुस्तक से लिए गए हैं जो किताब और फिल्म दोनों की मौलिकता को बनाए रखते हैं।

 'मोहल्ला अस्सी' में उस उधेड़बुन को पूरी तरह महसूस किया जा सकता है जो अभी हमारे समाज में व्याप्त है और पिछले 25 सालों से हम इसी उलझन से निकलने की कोशिश कर रहे हैं तो देखते हैं कि कब निजात मिलती है इन सब से। और इस फिल्म के अंत से यह सीखने की जरुरत नहीं कि आपको कहाँ जाना है अंततः , क्योंकि मेरे हिसाब से फिल्मों से ये बात नहीं सीखी जाती। तो बस आनंद लीजिये फिल्म का, हाँ फिल्म के संगीत में बिलकुल भी जान नहीं है।

शुक्रवार, 31 जुलाई 2015

छोटे शहरों को ज़िंदा करता मसान

 मुझे इस बार कोई और शीर्षक नहीं सूझा, वजह साफ़ है कि इस फिल्म की आत्मा में वो छोटा शहर है जो मुख्यधारा से कटता जा रहा है और यूंही किसी घाट पर अपनी जिंदगी में नयी किरण ढूंढ रहा है, ठीक वैसे ही जैसे फिल्म के किरदार दीपक और देवी अपनी पुरानी यादों को गंगा जी में बहाकर एक नाव में शायद किसी नए कल की तलाश में चल पड़ते हैं।

 अब मैं इस फिल्म की तारीफ ज्यादा करूँगा तो इस इल्ज़ाम को भी झेलना होगा कि भई अवार्ड जीती हुई फिल्म है तो तारीफ तो करेंगे ही जनाब ! तो फिल्म के बारे में समीक्षात्मक बातें बाद में करते हैं पहले इस पर थोड़ी चर्चा कर लेते हैं कि फिल्म प्रभावित क्यों करती है ?

'दम लगा के हईशा' का एक दृश्य
 लंबे समय से मीडिया और फिल्मों से देश के छोटे शहर गायब थे,  सब कुछ महानगरों तक सीमित हो रहा था फिर वो चाहे समाचार हों, टीवी के धारावाहिक या फ़िल्में। लेकिन अगर आप पिछले दिनों आई कुछ फिल्मों को देखें मसलन 'तनु वेड्स मनु' के दोनों संस्करण और 'दम लगा के हईशा', इनमें खांटी देसीपन की खुशबू है। ये उस भारत से भी परिचय कराती हैं, जो छोटे शहरों में बसता है और उनकी भी एक आत्मा है।

 'मसान' इसी कड़ी को और आगे ले जाती है। ये उन छोटे शहरों को ज़िंदा करती है, जहाँ सेक्स अभी भी एक जिज्ञासा है और प्यार की पींगे अपने शहर से दूर जाकर बढ़ाई जाती हैं, वो भी किसी दोस्त की बाइक उधार लेकर या यह उन शहरों की भी कहानी है जहाँ फेसबुक और स्मार्टफोन जैसे सूचना क्रांति के वाहक अपनी पहुँच बना रहे हैं और लोग उनका इस्तेमाल सीख रहे हैं या जहाँ की भ्रष्टाचार से परेशान जनता समाचारों की सुर्खियां नहीं है ।

 वैसे हमारे महानगरों में भी आपको कई छोटे शहर मिल जायेंगे, कभी दिल्ली में ही लक्ष्मी नगर, सीमापुरी, शाहदरा, नवादा, रघुबीर नगर और जामा मस्जिद के पास के इलाके घूम आइये, खुदबखुद दर्शन हो जायेंगे छोटे-छोटे कई शहरों के।

 'मसान' की कहानी की चर्चा यहाँ नहीं करना बेहतर जान पड़ता है मुझे क्योंकि मैं नहीं चाहता कि अगर अभी जो लोग फिल्म देखने जाने वाले हैं वो मेरी धारणा को लेकर जाएँ मन में, लेकिन सन्दर्भ के लिए बस इतना बता देता हूँ कि कहानी में एक नायिका है देवी पाठक और एक नायक है दीपक कुमार लेकिन इन दोनों का आपस में कोई संबंध नहीं।

 दोनों किरदारों की अपनी अलग-अलग कहानियां है, दोनों के जीवन में  संयोग और वियोग रस का श्रृंगार हैं। दोनों के जीवन में खलनायक है उनका 'डर" जो उन्हें समाज से , जाति से , जाति के आधार पर बंटे काम के भेदभाव से , ऊंच-नीच से  और पुलिस से है।  केवल एक चीज उन्हें जोड़ती है और वो हैं बनारस की गंगा पर बने घाट और उन पर बने मसान, जहाँ उनका प्रेम धू-धू करके खाक में मिल जाता है और जब इसी मसान-तट पर वो अपने डर से पार पातें हैं तो उम्मीद की किरण उन्हें साथ ले जाती है।

 फिल्म की जिस बात ने मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित किया वो है इसके अधूरेपन का संपूर्ण होना। ये जहाँ से शुरू होती है उसका कोई बैकग्राउंड नहीं और जहाँ खत्म होती है उसके आगे ये अनंत है। अंग्रेजी में इसका नाम 'फ्लाई अवे सोलो' है जो बताता है कि मसान से आगे का रास्ता इंसान अकेले ही धुंए में उड़कर करता है।

 निर्देशक नीरज घेवन की यह पहली फिल्म है और कान्स समारोह में अवार्ड जीतने के बाद भारत में रिलीज हुई है। फिल्म का स्क्रीनप्ले बेहतर है लेकिन कैमरा का काम और बेहतर किया जा सकता था। फिल्म के तीन गाने इंडियन ओसियन के रंग में रंगे हैं और तीन अलग-अलग मूड्स को दिखाते हैं, हालांकि यह अच्छा ही किया कि 'भोर' गाने को फिल्म के अंत में रखा क्यूंकि मध्य में यह फिल्म को भारी बना देता।

 फिल्म में देवी का किरदार ऋचा चड्ढा ने निभाया है और उनके पिता के किरदार में हैं संजय मिश्रा। इन दोनों कलाकारों से बेहतर अभिनय की उम्मीद की जाती है और दोनों ने अपने किरदार के साथ न्याय किया है। हालांकि ऋचा पूरी तरह से बनारस के रंग में नहीं रंग पाती हैं।

 दीपक का किरदार निभाने वाले नवोदित अभिनेता विकी कौशल निश्चित रूप से प्रभावित करते हैं। ज़रा सोचकर देखिये कि एक अभिनेता के लिए कितना मुश्किल होता होगा कि वह बनारस के हरिश्चंद्र घाट पर वह मुर्दों को जला रहा है, एक ऐसा काम जो उसने शायद ही कभी किया हो, लेकिन उसके अभिनय में कोई झिझक या शिकन न दिखे, ऐसा ही विकी का अभिनय है।

 फिल्म में बनारस एवं  गंगा के घाटों पर चली आ रही दहन की परम्परा भी एक किरदार है।  काशी विश्वनाथ और गंगा आरती को दिखाए बिना भी फिल्म की हर रग में बनारस मौजूद है। तो बस देख आइये एक बार 'मसान', क्योंकि अगर अच्छा देखने में यकीन रखते हैं तो ये आपको निराश नहीं करेगी।

बुधवार, 8 अप्रैल 2015

क्या चाहते हैं ब्योमकेश से ?

हाल में आई डिटेक्टिव ब्योमकेश बख्शी  को लेकर कई  बड़े फिल्म समीक्षकों ने कोई खास अच्छी समीक्षा नहीं दी। सभी ने फिल्म को बहुत से पहलुओं पर नकार दिया, लेकिन मैंने फिल्म देखी है।

 फिल्म शुरुआत से ही रोचकता पैदा करती चलती है।  एक हत्या और उसके हत्यारे की तलाश यही फिल्म का सार है,  जो आम जासूसी फिल्मों का मुख्य पहलू होता है। फिर उस हत्यारे की तलाश के दौरान होती अन्य हत्याएं, सबूतों का बनना बिगड़ना फिल्म को आगे बढ़ाते हैं, और इसमें भी यही चलता है।

 शरदिंदु बंधोपाध्याय के चरित्र ब्योमकेश बख्शी (सुशांत सिंह राजपूत) को फिल्म में निर्देशक दिबाकर बनर्जी ने शुरुआत से बुना है। वह कॉलेज से निकला है, प्यार में असफल हुआ है और नौकरी की तलाश में है। उसी के कॉलेज का साथी अजीत बंधोपाध्याय (आनंद तिवारी) उसे अपने गायब पिता की तलाश करने को बोलता है और वो जुट जाता है काम में। फिल्म में ब्योमकेश अपना पहला केस सुलझा रहा है, तो गलती होना लाजिमी है और दिबाकर ने उससे वो गलती भी करवाई है।

 फिल्म शुरू होने के कुछ समय बाद ही बख्शी को अजित के पिता की लाश मिल जाती है। लेकिन असली सवाल है कि आखिर उनकी हत्या क्यों हुई ? बस इसी गुत्थी को सुलझाने में कहानी आगे बढ़ती जाती है।
 फिल्म में 1940 के दौर का बंगाल है।  द्वितीय विश्वयुद्ध शुरू हो चुका है और जापानी सेना कलकत्ता पर आक्रमण करने के लिए आगे बढ़ रही है और इसके लिए उसे कुछ कालाबाजारियों का सहयोग चाहिए। बाकी एक जासूसी फिल्म की कहानी इससे ज्यादा बताना घातक होगा।

 फिल्म में उस समय के कलकत्ता को दिबाकर ने शानदार तरीके से पेश किया है। बैकग्राउंड स्कोर फिल्म की जान है और फिल्म की गति एक समान है। हालांकि यह थोड़ी धीमी है लेकिन फिल्म को समझने के लिए सही है।  आजकल भोजपुरी का इस्तेमाल हिंदी फिल्मों का एक अंग बनता जा रहा है, और इसमें इसे बखूबी इस्तेमाल किया गया है। फिल्म का लाइट इफ़ेक्ट प्रभाव पैदा करता है।

 सुशांत ने अच्छा अभिनय किया है, लेकिन वो और अच्छा कर सकते थे। फिल्म में अंगूरी देवी का किरदार निभाने वाली स्वस्तिका मुखर्जी ने अभिनय की छाप छोड़ी है। फिल्म में सहयोगी कलाकारों ने अच्छा अभिनय किया है। फिल्म में खलनायक का किरदार निभाने वाले नीरज काबी बहुत प्रभावित करते हैं।
 दिबाकर इसे एक ब्रांड के तौर पर स्थापित करने में सफल रहे हैं।  इसकी अगली कड़ी बनने की पूरी सम्भावना है।

 एक जासूसी फिल्म से अपेक्षा होती है कि वो आपको सीट से हिलने का मौका भी न दे और डिटेक्टिव ब्योमकेश बक्शी इस काम में पूरी तरह सफल है। फिर अब और क्या चाहते हैं आप ब्योमकेश से ?