Postman लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
Postman लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शुक्रवार, 2 अगस्त 2013

मैं क्या लिखूँ?


 अक्सर ख्याल आता है कि कुछ लिखूँ, फिर मन में सोचता हूँ कि क्या लिखूँ? अगर हर कोई लिखने में ही जुट गया तो पढ़ेगा कौन ? वैसे सोचिये क्या समां होगा वो जब हर कोई सिर्फ और सिर्फ लिखेगा। आप अपनी कोई भी बात किसी तक सिर्फ लिख कर ही पहुंचाएंगे। वैसे भी तकनीक ने ये आसान कर ही दिया है, अब हमारी ज्यादातर बाते टेक्स्ट मैसेज से ही हो जाती हैं और बाक़ी बातें हम ईमेल और चैट से कर लेते हैं।



 अभी कुछ दिनों पहले देश का तार, बेतार हो गया तो मेरे अन्दर एक डर बैठ गया कि कंही अब अगला नंबर अंतर्देशीय पत्र (इनलैंड लैटर) का न हो गरीब आदमी जैसे भी हो दो-ढाई रुपये का जुगाड़ करके अपने परिजनों का हाल-चाल जान लेता है। खैर कुछ समय पहले ये घोषणा हुई थी कि सरकार हर किसी को मोबाइल देगी खासकर के गरीब को। मैं तो सोच रहा हूँ कि चलो अच्छा है इस मामले में तो हम चीन से आगे होंगे लेकिन ये कब तक होगा वो इस देश में सिर्फ राम ही बता सकते हैं।

 मैंने अपनी अब तक की उम्र में तार का चलन नहीं देखा, हाँ लेकिन उसके दिल दहला देने वाले कई किस्से अपने दादी से सुने जरुर हैं कि कैसे तार आते ही घर में हडकंप मच जाता था, सब कोई अपना काम छोड़ के उसे सुनने रुक जाता, लोग सीढियां चढ़ते-चढ़ते कब उतरने लगते उन्हें पता भी नहीं चलता और कोई अच्छी खबर होती तो जान में जान आती, वरना बोरिया-बिस्तर बंधना शुरू हो जाता। पर एक चिंता हमेशा बनी रहती कि क्या नया खर्चा बढ़ेगा उस महीने और उसका जुगाड़ कहाँ से होगा उन पैसों का।

 वैसे अच्छा ही हुआ कि इस सफ़ेद हाथी का हुक्का-पानी बंद कर दिया गया, अन्यथा पुरातनपंथियों का बस चले तो उसे भी चलाते रहें। हमारे यहाँ तो आदत है कि काम हो न हो अगर कुछ है तो ढोते रहो। कबाड़ जमा करने का शौक जो है, अब आप सरकारी दफ्तरों को जाकर ही देख लीजिये जितने पैसों में उनका डिजिटलाईजेशन हो सकता है उतना पैसा उनके कबाड़ को बेच के निकल आये लेकिन नहीं हम अब भी उसी कबाड़ को ढोए जा रहे हैं। इसी कबाड़ के चक्कर में आम आदमी को सरकारी दफ्तर के चक्कर चकरघिन्नी की तरह काटते रहना पढ़ता है।

 लेकिन अगर अंतर्देशीय पत्र की बात की जाए तो उसका मिजाज थोड़ा अलग है। पुराने समय में बेटियां अपने मायके इस चिट्ठी से ही अपने ससुराल की बातें और अपनी आपबीती बयां करती थीं, माँ-बाप भी उसे पढ़ते-पढ़ते पूरे आंसुओं से भीग जाते थे। लोगों के रूटीन में शामिल था कि चिट्ठी लिखें तो कुछ दोस्तों से हमेशा चिट्ठी लिखकर ही हाल-चाल पूछने में आनंद था। कई सारे महान लोगों ने इन चिट्ठियों में अपना पूरा-पूरा इतिहास लिखा तो साहित्यकारों ने साहित्यिक रचनाएँ कर डालीं। कईयों के पत्र आज करोड़ों में संग्राहक खरीदते भी हैं।लाम पर गए सिपाहियों का अपने घर वालों से संपर्क करने का एकमात्र जरिया होता था। खैर वो तो आज भी बहुत हद तक इसी पर आश्रित हैं बेचारे, तकनीक के विकास ने उनको अब भी कोई खास लाभ नहीं पहुँचाया । 

 बहरहाल मैंने बात शुरू की थी कि मैं क्या लिखूं और उसी बात में इतना सब कह गया। लिखने का जो आनंद पन्ने पर है वो किसी और जगह नहीं। अब यही वजह ढूंढ़ रहा हूँ की पन्ने से इतर कैसे और क्या लिखा जाये, जो आपको कुछ सूझे तो बताना।