मंगलवार, 13 अगस्त 2013

ये बनायेंगे भारत को विश्वगुरू...

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मैं सोच ही रहा था कि इस ब्लॉग की शुरुआत कहाँ से करूँ क्यूंकि भारत है ही इतना महान देश कि आप जहाँ से शुरू करते हैं उसके पीछे कुछ और मिल जाता है तो लगता है यंही से शुरू करना चाहिए, अब आजकल फेसबुक पर आदरणीय मोदी जी के समर्थक कैसे-कैसे पोस्ट कर रहे हैं। उसकी एक बानगी यंही देख लीजिये…
ये इंसान ही है न...?
"मोदी जी के प्रधानमंत्री बनने से विश्व में बहुत सारे दुष्परिणाम होंगे... 



1.अमेरिका की अर्थव्यवस्था डूब जायेगी और अमेरिका बर्बाद हो जाएगा क्योंकि भारत तब न तो अमेरिका से हथियार खरीदेगा और न ही उसकी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का सामान भारत में बिक सकेगा इसका सबसे बड़ा कारण यह होगा कि मोदी जी स्वदेसी को आगे लायेंगे। 

2 .चीन ,जो विश्व की वर्तमान में सबसे उभरती ताकत और अर्थव्यवस्था है, वह भी बर्बादी के मुहाने पर आ खड़ा होगा। उसका 40 % व्यापार ( जो कि भारत में चोरी -छिपे डंप होता है ) खत्म हो जाएगा इससे चीन को बहुत बड़ा धक्का लगेगा , जिसका कारण होगा मोदी जी का भारतीय व्यापारिक तंत्र को आगे लाना यानी स्वदेसी को आगे लाना होगा।



3 .अरब देश, जो कि मरुस्थल में है वहां पर और भी सुखा पड़ने की सम्भावना है, क्योंकि भारत अपना आयात न्यूनतम स्तर पर इन देशो से कर देगा, क्योंकि मोदी जी भारत में सौर उर्जा और प्रकृतिक गैसों के प्रयोग को प्रमुखता देने वाले है। जो कि पर्यावरण हितैषी ऊर्जा होगी इसीलिए अरब देशी में भी कुलबुलाहट शुरू हो गयी है। 



4. पकिस्तान ,जो कि आतंक के बलबूते पर जीता है और आतंकवाद का सबसे बड़ा उत्पादक देश है ! उसकी दुकानदारी बंद हो जाएगी क्योंकि मोदी जी के प्रधानमंत्री बन जाने के बाद उसकी एक ज़रा सी गलती भी उसको बर्बाद कर देगी और यह भी हो सकता है कि भारत का मानचित्र दुबारा 1947 से पहले वाली स्थिति में आ जाए। 



5.कांग्रेस के बारे में भविष्यवाणी ही है कि वह 137 साल की उम्र में मर जायेगी। कांग्रेस का जन्म 1885 में एक गोरे अंग्रेज के हाथों हुआ था , 137 साल बाद अर्थात 2022 में ही समाप्त हो जाएगी और हो भी जानी चाहिए।


यह इस बात की ओर भी इंगित करता है कि जब किसी देश के आंतरिक मामले अन्य देशों पर प्रभाव डालते हैं, तो वह देश निश्चय ही सारे विश्व को अपने प्रभाव में ले आता है ! शायद मोदी जी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से भारत के विश्वगुरु बनने की शुरुआत हो जाए और 2022 में राष्ट्रघाती कोंग्रेस के सम्पूर्ण नष्ट होने के बाद भारत विश्वगुरु का स्थान प्राप्त कर ले तब भारत का एक रुपैया पचास अमेरिकी डालर के बराबर होगा।
इसीलिए अमेरिका नरेन्द्र मोदी जी को वीजा नहीं देता।
वह नहीं चाहता कि मोदी जी प्रधानमंत्री बने ,चीन तो बिल्कुल नहीं चाहता ,पाकिस्तान भी नहीं चाहता , कांग्रेस भी नहीं चाहती। इसीलिए सब विघटनकारी शक्तियां एकजुट हो रही है।
यह एक महापुरुष के आगमन का संकेत है।"



सोचने वाली बात- यह सिर्फ भारत में ही मुमकिन है कि यहाँ कोई कुछ भी सोच सकता है। नरेन्द्र मोदी, और एक महापुरुष, अब बताइए कि इससे भी ज्यादा कुछ हास्यापद हो सकता है और भगवान से दुआ कीजिये कि भारत 1947 से पहले वाली स्थिति में बिल्कुल भी न आये क्यूंकि उसे फिर से एक करना अब बड़ा मुश्किल हो जायेगा और ऐसी स्थिति में देश को लाने वाला इंसान भी विघटनकारी नहीं होगा। अब इसको पढ़ने के बाद तो लगता है कि जैसे ये व्यक्ति इंसान न होकर कुछ और ही है क्यूंकि इतना कुछ तो पूरी महाभारत में भगवान कृष्ण भी न कर पाए थे।

शुक्रवार, 2 अगस्त 2013

मैं क्या लिखूँ?


 अक्सर ख्याल आता है कि कुछ लिखूँ, फिर मन में सोचता हूँ कि क्या लिखूँ? अगर हर कोई लिखने में ही जुट गया तो पढ़ेगा कौन ? वैसे सोचिये क्या समां होगा वो जब हर कोई सिर्फ और सिर्फ लिखेगा। आप अपनी कोई भी बात किसी तक सिर्फ लिख कर ही पहुंचाएंगे। वैसे भी तकनीक ने ये आसान कर ही दिया है, अब हमारी ज्यादातर बाते टेक्स्ट मैसेज से ही हो जाती हैं और बाक़ी बातें हम ईमेल और चैट से कर लेते हैं।



 अभी कुछ दिनों पहले देश का तार, बेतार हो गया तो मेरे अन्दर एक डर बैठ गया कि कंही अब अगला नंबर अंतर्देशीय पत्र (इनलैंड लैटर) का न हो गरीब आदमी जैसे भी हो दो-ढाई रुपये का जुगाड़ करके अपने परिजनों का हाल-चाल जान लेता है। खैर कुछ समय पहले ये घोषणा हुई थी कि सरकार हर किसी को मोबाइल देगी खासकर के गरीब को। मैं तो सोच रहा हूँ कि चलो अच्छा है इस मामले में तो हम चीन से आगे होंगे लेकिन ये कब तक होगा वो इस देश में सिर्फ राम ही बता सकते हैं।

 मैंने अपनी अब तक की उम्र में तार का चलन नहीं देखा, हाँ लेकिन उसके दिल दहला देने वाले कई किस्से अपने दादी से सुने जरुर हैं कि कैसे तार आते ही घर में हडकंप मच जाता था, सब कोई अपना काम छोड़ के उसे सुनने रुक जाता, लोग सीढियां चढ़ते-चढ़ते कब उतरने लगते उन्हें पता भी नहीं चलता और कोई अच्छी खबर होती तो जान में जान आती, वरना बोरिया-बिस्तर बंधना शुरू हो जाता। पर एक चिंता हमेशा बनी रहती कि क्या नया खर्चा बढ़ेगा उस महीने और उसका जुगाड़ कहाँ से होगा उन पैसों का।

 वैसे अच्छा ही हुआ कि इस सफ़ेद हाथी का हुक्का-पानी बंद कर दिया गया, अन्यथा पुरातनपंथियों का बस चले तो उसे भी चलाते रहें। हमारे यहाँ तो आदत है कि काम हो न हो अगर कुछ है तो ढोते रहो। कबाड़ जमा करने का शौक जो है, अब आप सरकारी दफ्तरों को जाकर ही देख लीजिये जितने पैसों में उनका डिजिटलाईजेशन हो सकता है उतना पैसा उनके कबाड़ को बेच के निकल आये लेकिन नहीं हम अब भी उसी कबाड़ को ढोए जा रहे हैं। इसी कबाड़ के चक्कर में आम आदमी को सरकारी दफ्तर के चक्कर चकरघिन्नी की तरह काटते रहना पढ़ता है।

 लेकिन अगर अंतर्देशीय पत्र की बात की जाए तो उसका मिजाज थोड़ा अलग है। पुराने समय में बेटियां अपने मायके इस चिट्ठी से ही अपने ससुराल की बातें और अपनी आपबीती बयां करती थीं, माँ-बाप भी उसे पढ़ते-पढ़ते पूरे आंसुओं से भीग जाते थे। लोगों के रूटीन में शामिल था कि चिट्ठी लिखें तो कुछ दोस्तों से हमेशा चिट्ठी लिखकर ही हाल-चाल पूछने में आनंद था। कई सारे महान लोगों ने इन चिट्ठियों में अपना पूरा-पूरा इतिहास लिखा तो साहित्यकारों ने साहित्यिक रचनाएँ कर डालीं। कईयों के पत्र आज करोड़ों में संग्राहक खरीदते भी हैं।लाम पर गए सिपाहियों का अपने घर वालों से संपर्क करने का एकमात्र जरिया होता था। खैर वो तो आज भी बहुत हद तक इसी पर आश्रित हैं बेचारे, तकनीक के विकास ने उनको अब भी कोई खास लाभ नहीं पहुँचाया । 

 बहरहाल मैंने बात शुरू की थी कि मैं क्या लिखूं और उसी बात में इतना सब कह गया। लिखने का जो आनंद पन्ने पर है वो किसी और जगह नहीं। अब यही वजह ढूंढ़ रहा हूँ की पन्ने से इतर कैसे और क्या लिखा जाये, जो आपको कुछ सूझे तो बताना।

सोमवार, 29 जुलाई 2013

हर किसी को अपने हिस्से का विरोध करना होगा

साभार : ए क्रिएटिव यूनिवर्स
नोट- मेरी पिछली पोस्ट "सबला बनने को प्रेरित करना है" का यह संशोधित संस्करण है जो तहलका हिंदी में प्रकाशित हुई है 31 जुलाई 2013 के अंक में आप सभी के साथ साझा कर रहा हूँ।

 कुछ बातें ऐसी होती हैं जिनको साझा किए बिना मन नहीं मानता. 
वह दिन मेरे लिए बिल्कुल आम दिन था. कुछ भी अलग नहीं. मैं हमेशा की तरह बस में बैठकर अपनी क्लास करने जा रहा था. बताता चलूं कि मैं दिल्ली विश्वविद्यालय के दक्षिण परिसर का छात्र था. वही जाने-पहचाने रास्ते थे और एक-सी सवारियां.

 बस के यात्री रोज की तरह बस में चढ़ और उतर रहे थे. थोड़ी देर बाद बंगला साहिब बस स्टॉप आया और दो युवतियां बस में चढ़ीं. दोनों देखने में किसी कॉलेज की छात्रा लग रही थीं. मैं चूंकि महिला सीट पर बैठा था इसलिए मानसिक रूप से इस बात के लिए तैयार था कि किसी भी मोड़ पर मुझे सीट खाली करनी पड़ सकती है. वे मेरे पास आकर खड़ी हुई ही थीं कि मैंने झट सीट खाली कर दी. उनमें से एक लड़की बैठ गई और मैं दूसरी के बगल में खड़ा हो गया. बस अपने गंतव्य की ओर बढ़ चली.

 कुछ देर बाद बस सरदार पटेल मार्ग से गुजर रही थी, तभी मालचा मार्ग के पास एक स्टैंड से अधेड़-सी महिला बस में सवार हुई. ठसाठस भरी बस में वे सीट तलाश ही रही थीं कि उस बैठी हुई लड़की ने खुद ही अपनी सीट उनको दे दी. मुझे अजीब लगा कि उस महिला ने एक बार धन्यवाद तक नहीं कहा. खैर, मैंने मन में सोचा कि होते हैं ऐसे भी लोग मुझे क्या मतलब? यह भी कि दिल्ली में तो यह आम है. मैंने अक्सर देखा है कि यहां आप किसी की मदद करेंगे, उसे थोड़ी सुविधा देंगे और वह उसे अधिकार समझकर आपके साथ अवहेलना का व्यवहार करना आरंभ कर देगा. अभी सफर थोड़ा ही कटा था कि उस महिला ने बगल में बैठी महिला के साथ बातचीत शुरू कर दी.

 मैं बहुत करीब खड़ा था और इसलिए मुझे सारी बातचीत एकदम साफ सुनाई दे रही थी. बातचीत के केंद्र में इन दोनों युवतियों का पश्चिमी पहनावा था. हालांकि बगल में बैठी उस दूसरी महिला के हाव-भाव से लग रहा था कि उसे इन बातों में कोई रुचि नहीं है फिर भी यह महिला लगातार बोले जा रही थी. अब मेरा धैर्य समाप्त होने लगा था और मुझे कुछ-कुछ गुस्सा आने लगा था. उन लड़कियों के पहनावे में कोई बुराई नहीं थी. उनका पहनावा एकदम आम था-जींस और टीशर्ट।

 दिल्ली में ही क्या देश के किसी भी शहर में हर दूसरी लड़की आपको यही पहने मिलेगी और इसमें बुराई भी क्या है? मेरे जी में आया कि उस महिला को जमकर फटकार लगा दूं लेकिन मैं रुक गया. मुझे लगा कि मेरे पहल करने का क्या मतलब है जब वे दोनों युवतियां सब कुछ सुनकर भी चुपचाप खड़ी हैं. लेकिन मुझसे रहा नहीं गया और आखिरकार मैंने अपने बगल में खड़ी युवती से कह ही दिया, ‘एक बात बताइए इन कपड़ों से जब आपको या आपके घरवालों को कोई परेशानी नहीं तो आप इतनी देर से इनकी बकवास क्यों झेले जा रही हैं? जवाब देकर इन्हें शांत क्यों नहीं कर देतीं.’ मेरी बात का फौरन असर हुआ और उस लड़की ने अपना विरोध दर्ज कराया. कहीं से समर्थन नहीं मिलता देखकर आखिरकार उस महिला को अपनी बात बंद करनी पड़ी.

 वह महिला तो थोड़ी देर बाद बस से उतर गई लेकिन उस दिन यह बात मेरी समझ में बहुत अच्छी तरह आ गई कि आखिर क्यों हमारे देश में औरत को औरत का दुश्मन माना जाता है. इसलिए कि सदियों से प्रताड़ना और दबाव सहन कर रही महिलाओं का मानस अब भी प्रतिरोध के लिए तैयार नहीं है. कहने की जरूरत नहीं है कि इसका सीधा संबंध हमारे अंतर्मन से है. लेकिन इसके साथ-साथ मुझे यह भी समझ में आया कि जरूरी होने पर और सही जगह पर प्रतिरोध करना कितना जरूरी है और इससे कितनी गलत आदतों को रोकने में मदद मिलती है. वे  लड़कियां मेरी कोई नहीं थीं. हो सकता है कि उनकी ओर से बोलने पर मुझे काफी कुछ सुनने को भी मिल जाता. यह भी हो सकता है वे लड़कियां भी मुझे ही कुछ बोल देतीं लेकिन उस लड़की को बोलने के लिए प्रेरित करके मुझे आत्मिक संतोष मिला. सच भी है आखिर कब तक लड़कियों को अबला बताकर कुछ पुरुष उनकी ढाल बनकर खड़े रहेंगे? उन्हें अपना बचाव खुद करना होगा. फिर चाहे उनके सामने दुश्मन कोई पुरुष हो या उनकी ही जाति का कोई भटका हुआ सदस्य!

तहलका में प्रकाशित स्टोरी का लिंक- http://www.tehelkahindi.com/index.php?news=1896