बुधवार, 8 जनवरी 2014

बदल रहे हैं हम

वैसे तो एक जनवरी भी साल के बाकी के आम दिनो की तरह ही एक आम दिन होता है, लेकिन फिर भी बदलते साल का कुछ रोमांच इसे दिलचस्प बना देता है। वैसे हम खुद लगातार बदलने की प्रक्रिया से गुजरते रहते हैं, कोशिश होती है कि बदलाव अपने में लायेंगे लेकिन साल बदल जाते हैं हम नहीं बदल पाते और वही पुराने ढर्रे पर चलते रहते हैं।
शपथ लेते हुए राखी बिड़ला (बिडलान)
खैर हम बदल रहे हैं ये नजर आने लगा है अगर बात राजनीति से शुरू की जाये तो दिल्ली में अरविंद के मुख्यमंत्री बनने से ज्यादा चौंकाने वाली बात ये रही कि युवा वर्ग की राजनीति में भागीदारी बढ़ रही है, अब युवा राजनीति को गटर नहीं समझ रहा। दूसरी तरफ जो युवा मोदीमय है उसे भी एक अन्य विकल्प नजर आ रहा है। इस बीच जो सबसे ज्यादा अचंभित करने वाली बात है वो है राखी बिडलान का मंत्री बनना। मात्र 26 साल की उम्र में किसी सरकार में मंत्री बनना वो भी बिना किसी राजनीतिक विरासत के इस देश कि राजनीति के बदलने की ओर संकेत करता है। भले ही अभी इन सभी के काम पर व्यापक चर्चा होनी बाकि है और इनके राजनीतिक तरीके पर भी, लेकिन जरा एक दशक या उससे थोड़ा और पहले भी नजर दौड़ाएं तो देश में ऐसा कोई उदहारण नहीं दिखता कि 26 की उम्र में कोई मंत्री बना हो।
एक बड़ा बदलाव अबकी से मुझे पाने प्रधानमंत्री में भी नजर आया कि वो अब राजनीतिक प्रश्नो से बचते नहीं हैं बल्कि उनका जवाब देते हैं जिसकी बानगी इस बार की उनकी प्रेस कॉन्फ्रेंस में आप देख सकते थे। अब ये तो भगवान का कसूर है कि वो कितने भी दमदार हो जाएँ लेकिन नजर ही बेचारे आते हैं। अब इसके लिए कोई भगवान में बदलाव लाये तो मुनासिब है।
हाँ भगवान ने जरुर अब लोगों के घरों तक पहुँचने का अपना टाइम बदल लिया है। पहले टीवी पर वो सुबह-सुबह दर्शन देने आते थे वो भी अक्सर शनिवार और रविवार के दिन लेकिन अब वो भी वीकेंड मानते हैं और शनि-रवि को टीवी से गायब रहते हैं भाई आखिर उनकी भी तो इच्छाएं हैं क्या बदलते दौर में उनका मन नहीं होता होगा कि वो भी न्यू इयर ईव पर पार्टी मनाने जाएँ। समय भी उनका बदल चुका अब तो वो रात को आते हैं प्राइम टाइम पर आत 8 बजे से।
वैसे अब उबके दर्शन करने वाले लोगों में भी बदलाव आया है अब वे  टीवी के सामने रोली-चावल लेकर नहीं बैठते, न ही उन्हें इन सीरियलों के सास-बहू टाइप सीरियलों में बदलते जाने से चिड़ होती है और उन्हें अब जल्द ही इससे भी गुरेज नहीं होगा कि उनके भगवान संस्कृत क्यों नहीं बोलते, उनके लिए तो अच्छा है कि भगवान भी हाईटेक होते जा रहे हैं तभी तो विजुअल इफेक्ट्स के साथ आजकल भगवान साउथ के सुपरस्टार से कम नहीं लगते। इतना ही नहीं दर्शकों को अब धारावाहिकों में भगवान को लेकर दिखाए जा रहे तथ्यों की भी परवाह नहीं, तभी तो मूल शास्त्रों से तमाम असंगतियां होने के बाबजूद भी लोग इसे स्वीकार कर रहे हैं। वरना जोधा अकबर के नाम पर मचा बवाल तो  आप जानते ही हैं वंही अब सीरियल आ रहा है इसी नाम से तो कोई बवाल नहीं। तो लोग थोड़े ही सही धार्मिक रूप से उदार तो हुए हैं।
वैसे एक बदलाव अब मैं अपने घर में भी देखने लगा हूँ मेरी दादी कि उम्र यही कोई 82 के आस-पास होगी जब एक साल पहले उन्हें हमने मोबाइल दिलाया था तो वो उससे बेहद अनजान थी और वैसे भी 80 की उम्र में कौन इस सरदर्दी को पालना चाहता है लेकिन उनकी जिजीविषा और तकनीक के बढ़ते प्रभाव ने उन्हें मोबाइल पर सिर्फ कॉल उठाने तक सीमित नहीं रखा बल्कि खुद से कॉल लगाने में भी दुरुस्त बना दिया है।

शनिवार, 7 दिसंबर 2013

मेरा मोदी बिहार नहीं जीत पाया

 आजकल जब हर तरफ मोदी की लहर चली हुई है तो स्मार्टफोन की दुनिया उससे क्यों अछूती रहती। यूँ तो मोदी रन नाम का गेम काफी दिनों से एंड्राइड फोन्स के लिए गूगल प्ले स्टोर पर मौजूद है लेकिन मेरा परिचय इससे कुछ दिन पहले ही हुआ। 
बिहार में अटका मेरा मोदी

 मन न होते हुए भी थोडा खेला तो मेरे मोदी को गुजरात पार करना कुछ खास मुश्किल नहीं पड़ा। लेकिन खेलते-खेलते मैं बिहार जाकर अटक गया हूँ, कई बार कोशिश की है लेकिन समझ नहीं आ रहा कि अपने मोदी को बिहार से बाहर कैसे निकालूं। अब दुविधा यह है कि अगर उन्हें बिहार में जीत न दिला पाया तो उन्हें लेकर उत्तर प्रदेश में कैसे घुसुंगा, फिर यह कहावत यूँही थोड़े कहे जाती है कि प्रधानमंत्री बनना है तो यूपी होकर ही जाना पड़ेगा। मुश्किल ये है कि अगर मेरा मोदी बिहार न जीत सका तो यूपी कैसे जीतेगा?

 अगर बात हकीकत के खेल की भी की जाये तो मोदी के लिए नीतीश बिहार में एक अच्छी दीवार बनकर खड़े हैं ऐसे में वो यूपी तक पहुँच पाएँगे या नहीं इस पर संशय बना हुआ ही है। कल पांच राज्यों के चुनाव का नतीजा आ रहा है और एग्जिट पोल मोदी फैक्टर के पक्ष में खड़ा है लेकिन हकीकत में क्या होता है यह कल के बाद ही पता चलेगा।

 परन्तु बिहार और यूपी में तो अभी विधानसभा चुनाव भी नहीं होने हैं, तो मोदी फैक्टर वहाँ क्या रंग लाएगा देखना होगा और वहाँ स्थापित सरकारें अपने वोटर को इतने आसानी से हिलने थोड़े ही देंगी। वैसे भी मोदी के गुरु माने जाने वाले आडवाणी को बिहार ने ही उनका स्थान उन्हें दिखाया था। इस हकीकत की दुनिया को देखकर मुझे अपने मोबाइल वाले मोदी की परेशानी धीरे-धीरे समझ आ रही है। 

 अब बेचारा मेरा मोदी करे भी क्या उसे बिहार से पार लगाने वाला मैं (वोटर) भी उसे पार नहीं करा पा रहा हूँ तो वो कैसे जायेगा यूपी। देखते हैं अगले कुछ दिनों में क्या होता है क्या मेरा मोदी बिहार जीतकर यूपी में घुस पाता है या बिहार में ही लम्बे समय तक संघर्ष करता रहता है!

सोमवार, 25 नवंबर 2013

इरादे कितने लोहा हैं ?

 भाई अभी तक तो हम सरदार पटेल को ही लौह पुरुष समझा करते थे लेकिन फिजा का रुख बदल रहा है।  वैसे भी यूपी में राहुल का जादू फेल होने और नरेंद्र मोदी के सीढ़ी चढ़ने के कारण मुलायम चाचा को आजकल नींद नहीं आ रही। बेटे के हाथ में सत्ता सौँप के सोच रहे थे कि कुछ दिन आराम करेंगे और अब प्रधानमंत्री बनकर ही दम लेंगे। पर क्या करें कहा जाता है न कि सर मुंडाते ही ओले पड़े। तो पिछले 18 महीनों के अखिलेश के शासन में लैपटॉप के अलावा कुछ भी ठीक से नहीं चला। इतने दंगे हो गए कि पता ही नहीं चल रहा कि कहाँ वाला सुलझाया जाये और कहाँ वाले को चुनाव तक और भड़काया जाये।

 लेकिन कुछ भी कहिये अखिलेश कम से कम पार्टी की कुछ नीतियां बदलने में तो कामयाब जरुर रहे हैं और अब वो भी अपनी पार्टी को दबा-कुचला नहीं रहने देना चाहते।जिसका प्रमाण हाल ही में मुलायम के जन्मदिन के दौरान पार्टी की तरफ से प्रकाशित कराये गए विज्ञापनो में भी दिखा। इससे पहले लैपटॉप वितरण के दौरान जो समाजवादी पार्टी अंग्रेजी के नाम से चिड़ा करती थी उसने देश के सभी अंग्रेजी दैनिकों में अंग्रेजी में इस योजना के शुभारम्भ के विज्ञापन प्रकाशित करवाये थे। और अपने लाल-हरे रंग को कॉरपोरट का कलर बनाने का प्रयास किया था।

 आप माने या न माने लेकिन अखिलेश ने समाजवादी पार्टी के विमर्श का आंशिक कॉरपोरेटीकरण तो किया ही है। तभी तो बिलकुल प्रोफेशनल तरीके की प्रेस रिलेशन कम्पनी से पार्टी के प्रचार-प्रसार का करवाया जा रहा है। इसकी बानगी अगर देखनी हो तो इस बार दिल्ली में चल रहे ट्रेड फेयर के यूपी के मंडप के बाहर का नजारा भी इसी रंग में देखने लायक है और अंदर घुसते ही आपको कभी समाजवाद की पहचान रहे लाल-हरे रंग के मौजूदा कॉरपोरट में होते बदलाव से भी हो जायेगा।
नवभारत के लखनऊ अंक में छपा विज्ञापन 

 जरा एक नजर खुद ही इस पोस्टर पर डालिये जो हाल ही में मुलायम के जन्मदिन पर देखेने को मिला।

 खासबात यह रही कि इसका प्रकाशन भी एक दम प्रोफेशनल तरीके से किया गया.…लगभग हर अख़बार के फ्रंट पर इसका एक टीजर और अंदर के पेज पर पूरा पोस्टर छापा गया।

 गौर से अगर देखें तो इस पोस्टर का आकलन करने पर पता चलेगा कि कंही न कंही अब समाजवादी पार्टी के विमर्श में सिर्फ यूपी नहीं रहा है बल्कि पोस्टर के पार्श्व में देखें तो इनकी नजर सम्पूर्ण भारत पर है। चलिए देखते हैं कि क्या होता है इन चुनावों में ? क्या मुलायम भी पीएम इन वेटिंग हैं ? वाकई देखने वाली बात होगी कि भारत के प्रति इनके इरादे कितने लोहा हैं?