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मंगलवार, 20 अक्टूबर 2015

क्या ऐसा ही भारत हमने बुना था ?

गूगल से साभार
क्या ऐसा ही भारत हमने बुना था ?

जहाँ डिजिटल संवाद हर रोज़ बढ़े,
समाज आपस में ही न बतियाए,

जहाँ बड़े-बड़े सवालों को,
कुछ दिन चुप रखकर टाल दिया जाए,

जहाँ दूरियां पाटने के सेतु बनाने हों,
वहाँ रोजाना एक नई खाई खोद दी जाए,

जहाँ एक ज़िंदा इंसान की कीमत,
एक जानवर से कम हो जाए,

जहाँ दंगा कराने वालों को,
देश का हीरो मान लिया जाए,

जहाँ अपनी बात सिर्फ रखने पर,
बात करने लायक ही न रहने दिया जाए,
क्यों बिठाया हमने नालायक को,
रख दिया उसके सिर पर ताज,

क्या अधिकार था उसे कि झोंक दे,
पूरे समाज को दशकों की आग में,
और चले हर तरफ नंगा नाच,

फिर जब वो चल बसा,
क्यों उस पौधे को बढ़ने दिया,
क्यों ना किया हींग-फिटकरी का इलाज़,

इलाज़ की तो बात छोड़िये,
हमने ज़हर को ही मरहम क्यों समझा,
क्यों गिरि के एक शेर को हमने,
अपने गाँव का रास्ता दिखा दिया,

हम भी बड़े निर्लज्ज हैं,
जो ठंडी लाशों पर,
रोटियां उन्हें सेकने देते हैं,

करते हम ही हैं सबकुछ,
बस दोष दूसरों को देते हैं,

खुद से एक बार पूछें,
क्या सच में ऐसा ही भारत बुना था ?

मंगलवार, 7 जुलाई 2015

क्या मानें इसे सम्मान या उपकार ?

अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस निश्चित रूप से भारत की 'सॉफ्ट डिप्लोमेसी' का शानदार उदाहरण है, लेकिन क्या इसके सिर्फ इतने ही निहितार्थ हैं ?

मुझे लगता है कि इसको थोड़ा व्यापक रूप में देखना चाहिए। यह बात सभी जानते हैं कि बाबा रामदेव ने चुनावों में भाजपा के पक्ष में खुला प्रचार किया था। सरकार ने उन्हें कई तरह से अनुग्रहीत  करने का प्रयास किया जैसे कि पहले पद्म


पुरस्कार से नवाजना चाहा, फिर बाद में उन्हें हरियाणा में कैबिनेट मंत्री का दर्जा दिए जाने की भी बात हुई लेकिन रामदेव बाबा ने इसे स्वीकार करने से इंकार कर दिया।

देखा जाये तो यह सही भी है, अब कारोबारी इंसान को तमगों का क्या करना ? उसे तो अपने कारोबार से मतलब है। योग दिवस इसे भुनाने का सबसे सही तरीका है। सरकार ने योग दिवस के माध्यम से रामदेव का ही फायदा कराया है। इस वजह से उन्हें बिना धेला खर्च किये अंतर्राष्ट्रीय प्रचार मिल गया।

योग दिवस के मनाये जाने से इसकी वैश्विक स्वीकार्यता बढ़ेगी तो उसका व्यापार भी बढ़ेगा और विश्वभर में इसके कारोबार में लगे लोगों को लाभ पहुंचेगा। बाबा रामदेव के लगभग 1100 करोड़ के पतंजलि समूह के लिए इससे बेहतर अवसर क्या हो सकता है। चूँकि वो इस कारोबार के पुराने खिलाड़ी हैं लिहाजा उसका फायदा उन्हें मिलेगा ही। एक अनुमान के मुताबिक अकेले अमेरिका में ही योग का कारोबार लगभग 27 अरब अमेरिकी डॉलर का है। अब उसमें से रामदेव बाबा कितना हिस्सा अपने नाम जुटाते हैं ये देखना होगा ?  इसके अलावा देश में भी इसका कारोबार बढ़ेगा तो रामदेव और अन्य योग बाबाओं का तो राजयोग आने वाला है।

लेकिन यह बात भी मौजूं है कि संयुक्त राष्ट्र ने इसे मान्यता कैसे दी ? ठीक है मान लेते है कि भारतीय राजदूत ने इसके लिए काफी लॉबिंग की होगी और खुद प्रधानसेवक भी इसके लिए लॉबिंग कर आये थे वहां जाकर लेकिन क्या लॉबिंग ही काफी थी ? अगर ऐसा होता तो कई सालों से संयुक्त राष्ट्र में स्थायी सदस्य बनने के लिए लॉबिंग  कर रहे भारत का ये सपना भी साकार हो जाता।

मैं इसे थोड़े व्यापक रूप में देखता हूँ। ये बात किसी से छिपी नहीं संयुक्त राष्ट्र किन देशों के प्रभाव में कार्य करता है। इन देशों को चीन के अलावा अपने व्यापारिक हितों की पूर्ति के लिए एक नया स्थान चाहिए और भारत इसके लिए सबसे मुफीद जगह है।

जिस तरह चीन विश्व राजनीति में दखल बढ़ा रहा है, साफ़ है पुरानी ताकतें उसे कुछ थामना जरूर चाहती हैं।ऐसा उसके विश्व व्यापार को प्रभावित करके किया जा सकता है और इस काम में उनका साथ देने के लिए भारत की नयी सरकार ने लाल कालीन बिछा रखा है। ऐसे में इस तरह के एक दो झुनझुने थमाने से उनका कुछ जायेगा नहीं और हम अपने मुंह मियां मिट्ठू बन लेंगे।

वैसे भी किसी धनवान को असल से ज्यादा सूद प्यारा होता है ऐसे में बस वो नए निवेश के रास्ते तलाशता रहता है ताकि सूद आता रहे।  तो ऐसे ही देसी और वैश्विक धनवानों को फायदा पहुँचाने के लिए इस तरह के आयोजन होते रहते हैं। 

मंगलवार, 21 जनवरी 2014

मेरे सपनों का 'आप'राध

मैं अपराधी नहीं हूँ लेकिन आजकल लोग मुझे 'आप'राधी जरुर कहने लगे हैं। अब कुछ दिन पहले ही की बात है मैं सपने में अरविन्द  से मिला और कुछ प्रश्न किये जैसे कि क्या आप वाकई इतने ईमानदार हैं कि वजन तोलने की मशीन पर भी बिना कपड़ो के खड़े होते हैं ताकि वजन में कोई गड़बड़ी न हो या इतने धरनेबाज कि आपकी पत्नी आपके लिए खाना भी नहीं बनाती क्योंकि उन्हें डर होता है कि कंही खाना ख़राब बना तो आप घर में ही धरना देने बैठ जायेंगे (ये बातें मैं नहीं पूछ रहा ये तो दिल्ली और देश की जनता पूछ रही है मैसेज,मेल और सोशल मीडिया पर ) तो मुझ पर तुरंत आरोप लगा दिया गया कि आपको चायवालों ने भेजा है और आप 'आप' पर प्रश्न करके बहुत गम्भीर 'आप'राध कर रहे हैं।

 तभी अरविन्द मेरे खिलाफ धरना देने मेरे बेड के बगल में ही बैठ गए और और हाय हाय करके मेरा इस्तीफ़ा मांगने लगे। अब मैं तो कुछ काम धंधा करता नहीं यूँही बस कुछ सपने देखता हूँ उसी आम आदमी की तरह जिसकी बात अरविन्द करते हैं तो अब मैं क्या इस आम आदमी के पद से भी इस्तीफ़ा दे दूं।

साभार-www.mysay.in

 अरविन्द अनशन कर ही रहे थे कि मेरे सपने में सुबह-सुबह एक चायवाला चला आया और कहने लगा कि लो इसे भूल जाओ और ये हमारी विकासपरक चाय नारंगी कप में पियो (हालाँकि उसके सारे बर्तन और कपडे भगवा थे लेकिन नारंगी ही मुझे लगे क्यूंकि सुबह-सुबह नींद में आँखे सर्दियों में कहाँ पूरी खुलती हैं )। अब मैं न चाय पियूं न कॉफी तो मुझे क्यूँ उसकी परवाह रही तो सुबह-सुबह मैंने उसकी भी बाईट लेना चाही जैसे मीडिया हर मिनट की अरविन्द की अप्डेट देता है। मैंने  उससे भी पूछ लिया कि ये बताइये कि आपने ऐसे कौन से कर्म किये कि आप चाय वाले से प्रधानमंत्री तक बनने वाले हैं वरना इस देश में तो चायवाला नुक्कड़ से आगे जा ही नहीं पाता। फिर एक और बात कि चाय के धंधे में ऐसी भी क्या कमाई कम थी जो यहाँ चले आये क्यूंकि यहाँ तो ईमानदार कमा ही नहीं पाते। अब चाय वाला मोदी था और मैं समझ नहीं पा रहा था कि गुजरात में मोदी दलित कैसे हो गए या फिर यह भी सरकारी गलती है ठीक वैसी ही जैसी राखी बिडलान के बिड़ला होने में हुई तो उनका वीपी सिंह बढ़ गया और पीछे नारंगी टोपी में खड़ा उनका डॉक्टर मेरे पीछे पिल पड़ा कि आप, 'आप' की तरह प्रश्न पूछकर बहुत बड़ा 'आप'राध कर रहे हैं।
साभार-श्रेयस नवारे

 अब मैं ठगा सा रह गया कि ये भी 'आप'राध है, तो अपराध क्या है ? ये बातें चल ही रही थी कि अंगूठा चूसते हुए,चश्मा लगाये एक लड़का अपनी माँ के पीछे से मेरे सपने में झाँक रहा था। मैंने आवाज देकर उसे आगे बुलाया लेकिन उसने पहले माँ को आगे भेज दिया मैंने कहा अब तो मैं मारा गया क्योंकि माताजी की तो सबको सुननी पड़ती है वो किसी की नहीं सुनती। मैंने  उस बच्चे को पास बुलाया और प्यार से पूछा कि क्या चाहिए इतनी सुबह-सुबह तो वो बड़े मिमियाते हुए बोला कि इन दोनों ने हमारी टोपी चुरा ली और अपने-अपने हिसाब से इस्तेमाल कर रहे हैं। इनमे से एक ने तो मेरी कविता का शीर्षक भी चुरा लिया अब मैं कहां कॉपीराइट की शिकायत करूँ।

 तो मैंने भी कहा बेटा तुम्हारी माँ तो हर फैसला करती है तो उसी से शिकायत कर दो। फिर वैसे भी उस कविता का तुम क्या करते क्योंकि जब तक वो तुम्हारे पास थी तुम उसे ये भरोसा ही नहीं दिला पाये कि तुम इस कविता को कंही प्रकाशित भी करा सकते हो। लोगों को लगा कि चोरी की होगी इसीलिए डर रहा है तो अब अंततः किसी ने चुरा ही ली, और वैसे भी ये मेरा सपना है तुम्हारी माँ वाला तो है नहीं कि सरकार बदलते ही मेट्रो से एयरपोर्ट तक सब गायब हो जाये। बस फिर उसने दहाड़ मारकर रोना शुरू किया और उसकी माँ मुझ पर बरसने लगी कि ये भी कोई तरीका है बच्चों से बात करने का और अगर आप ऐसा कर रहे हैं तो आप बाल 'आप'राधी हैं। 

 अब मेरे सबर ने भी सबर कर लिया कि मैं जो भी बात बोलूं मैं ही 'आप'राधी हो जाता हूँ बस फिर क्या था मैंने अपने बिस्तर के बगल से उतारकर चप्पल पहनी और चला सुबह-सुबह पाखाने की ओर इन सबको पीछे चिल्लाता छोड़कर। अब सुबह-सुबह मैं भी काम के काम न कर इनकी कामचोरी के किस्से सुन रहा था, तो पाखाने में इनका शोर बंद करने के लिए जैसे ही मैंने दरवाजा बंद किया मेरी नींद टूट गयी। फिर क्या था बस मुझे समझ में आ गया कि सारा 'आप'राध मेरे सपनों का ही था।

शनिवार, 7 दिसंबर 2013

मेरा मोदी बिहार नहीं जीत पाया

 आजकल जब हर तरफ मोदी की लहर चली हुई है तो स्मार्टफोन की दुनिया उससे क्यों अछूती रहती। यूँ तो मोदी रन नाम का गेम काफी दिनों से एंड्राइड फोन्स के लिए गूगल प्ले स्टोर पर मौजूद है लेकिन मेरा परिचय इससे कुछ दिन पहले ही हुआ। 
बिहार में अटका मेरा मोदी

 मन न होते हुए भी थोडा खेला तो मेरे मोदी को गुजरात पार करना कुछ खास मुश्किल नहीं पड़ा। लेकिन खेलते-खेलते मैं बिहार जाकर अटक गया हूँ, कई बार कोशिश की है लेकिन समझ नहीं आ रहा कि अपने मोदी को बिहार से बाहर कैसे निकालूं। अब दुविधा यह है कि अगर उन्हें बिहार में जीत न दिला पाया तो उन्हें लेकर उत्तर प्रदेश में कैसे घुसुंगा, फिर यह कहावत यूँही थोड़े कहे जाती है कि प्रधानमंत्री बनना है तो यूपी होकर ही जाना पड़ेगा। मुश्किल ये है कि अगर मेरा मोदी बिहार न जीत सका तो यूपी कैसे जीतेगा?

 अगर बात हकीकत के खेल की भी की जाये तो मोदी के लिए नीतीश बिहार में एक अच्छी दीवार बनकर खड़े हैं ऐसे में वो यूपी तक पहुँच पाएँगे या नहीं इस पर संशय बना हुआ ही है। कल पांच राज्यों के चुनाव का नतीजा आ रहा है और एग्जिट पोल मोदी फैक्टर के पक्ष में खड़ा है लेकिन हकीकत में क्या होता है यह कल के बाद ही पता चलेगा।

 परन्तु बिहार और यूपी में तो अभी विधानसभा चुनाव भी नहीं होने हैं, तो मोदी फैक्टर वहाँ क्या रंग लाएगा देखना होगा और वहाँ स्थापित सरकारें अपने वोटर को इतने आसानी से हिलने थोड़े ही देंगी। वैसे भी मोदी के गुरु माने जाने वाले आडवाणी को बिहार ने ही उनका स्थान उन्हें दिखाया था। इस हकीकत की दुनिया को देखकर मुझे अपने मोबाइल वाले मोदी की परेशानी धीरे-धीरे समझ आ रही है। 

 अब बेचारा मेरा मोदी करे भी क्या उसे बिहार से पार लगाने वाला मैं (वोटर) भी उसे पार नहीं करा पा रहा हूँ तो वो कैसे जायेगा यूपी। देखते हैं अगले कुछ दिनों में क्या होता है क्या मेरा मोदी बिहार जीतकर यूपी में घुस पाता है या बिहार में ही लम्बे समय तक संघर्ष करता रहता है!

शुक्रवार, 16 अगस्त 2013

एक कल्कि अवतार ये भी!

इन्सान या कल्कि अवतार
 मैं तो सबसे ज्यादा उनको लेकर उनके समर्थकों द्वारा किये जाने वाले दावों से खौफ खा जाता हूँ। अभी मोदीजी के हैदराबाद की रैली के बाद की ही बात है मेरे फेसबुक के खाते पर मैंने अपने एक मित्र की उनके सम्बन्ध में एक पोस्ट देखी तो मैं तो बेहोश होते-होते बचा, उसके कुछ अंश मैं यहाँ आपके साथ साझा करना चाहूँगा-

मोदी जी के प्रधानमंत्री बनने से विश्व में क्या-क्या बदल जायेगा- 
दरणीय  मोदी जी की एक बात का मैं कायल हूँ, जब वो कहते हैं कि आप मेरे खिलाफ हो सकते हैं या मेरे साथ लेकिन आप मुझे नजरंदाज नहीं कर सकते। बात भी ठीक है अब उनके द्वारा कभी न कभी ऐसा कुछ कह दिया ही जाता है कि उसके पक्ष-विपक्ष में से कोई एक रास्ता चुनना ही पड़ता है, उसे नजरंदाज तो नहीं किया जा सकता। पहले तो अमेरिका की अर्थव्यवस्था डूब जाएगी क्यूंकि भारत तब न तो अमेरिका से हथियार खरीदेगा और न ही उसकी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का सामान भारत में बिक सकेगा क्यूंकि मोदी जी स्वदेशी को बढ़ावा देंगे। दूसरा चीन भी बर्बादी के मुहाने पर खड़ा होगा क्यूंकि उसका 40% व्यापार खत्म जायेगा जो चीन अपने माल को भारत में डंप करके करता है इसका भी कारण आदरणीय मोदीजी द्वारा स्वदेशी भारतीय व्यापारिक तंत्र को मजबूत करना होगा यही नहीं उनके समर्थक पाकिस्तान को लेकर जो विचार रखते हैं उसके उदाहरण की आवश्यकता नहीं है लेकिन अरब देशों को लेकर भी कहा जा रहा है कि उस मरुस्थल में अभी और सूखा पड़ेगा क्यूंकि भारत अपना तेल आयात भी न्यूनतम स्तर पर ले आएगा और मोदीजी नवीकरणीय ऊर्जा को प्रमुख स्थान देंगे।

 जब हम इन दावों की पड़ताल करते हैं तो लगता है कि सब खोखला है और अगर ऐसे ही खोखले दावे करने वाले समर्थकों के दम पर अगर कोई ऐसा व्यक्ति प्रधानमत्री बन भी जाये जिससे जनता इतनी उम्मीदें बांध ले कि वो उसके बोझ तले ही दब जाये और खुलकर कोई फैसला भी न ले पाए तो उसका आने वाला भविष्य कितना अंधकारमय होगा। क्या भाजपा को इन भ्रांतियों पर रोक लगाने की आवश्यकता नहीं है क्यूंकि अगर जनता ने इतनी उम्मीद से उसे चुन भी लिया तो खरे न उतर पाने के बाद उसका क्या हाल होगा।

 अब जरा इन दावों पर गौर करे अगर मोदी जी को अमेरिका से इतनी नफरत ही होती या पश्चिमी देशों को उन्हें रुलाना ही होता तो क्यों वो हर साल वाईब्रेंट गुजरात जैसी गोष्ठी करते ताकि उनके यहाँ निवेश बढे। हम सभी बहुत अच्छे से जानते हैं कि आदरणीय मोदीजी नीतिओं में पूरी तरह पश्चिमी मॉडल को ही अपनाते हैं तो फिर उससे दुश्वारी क्यूँ होगी तो उनके समर्थकों को भी यह ध्यान रखना होगा। फिर उनको अमेरिकी वीजा दिलाने के लिए भी तो भाजपा लायलित है।


 हमें इस बात पर भी तो गौर फरमाना होगा कि यदि अरब देशों से आयात बंद हो गया तो अंबानी की जामनगर रिफाईनरी का क्या होगा। क्या मोदी उनको नुकसान में जाने के लिए कहेंगे जबकि वो तो गुजराती हैं । और माने या ना माने उनके अनुसार भारत की सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था का रूख बदलता है। 

इस बात पर थोडा गहन विचार करें तो हमे यह भी सोचना होगा कि किस तरह की सत्ता हम अब चलाना चाहते हैं जो सब कुछ तबाह और खत्म करने पर उतर आये।


 इससे तो हम भारत की सहिष्णु, शांतिप्रिय, गुटनिरपेक्ष और विश्व के साथ सहअस्तित्व वाली उदार छवि का ही सर्वनाश कर देंगे। अगर मोदी इतने की विध्वंसकारी हैं तो क्या हक है उन्हें और उनके समर्थकों को कि सरदार पटेल के नाम को इस्तेमाल करते हुए स्टेचू ऑफ यूनिटी बनायें । क्यूंकि उनके आने के बाद तो सब अलग-थलग होने का डर है। अतः मेरा विनम्र अनुरोध है आदरणीय मोदीजी से कि हम उन्हें नजरंदाज करना शुरू कर दें उससे बेहतर है कि वो इस तरह की भ्रांतियों को खुद से स्पष्ट करते हुए दूर करें क्यूंकि उनके समर्थक तो उन्हें भगवान विष्णु का कल्कि अवतार साबित करने में लगे हैं जिसका जन्म कलयुग का अंत करने को हुआ हो।