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रविवार, 14 फ़रवरी 2016

जनाब बस दिमाग खोलकर चलें...!




 वैसे आमतौर पर मैं राजनीति से परहेज ही करता हूँ क्योंकि आजकल राजनीति के बारे में लिखने का मतलब बुद्धिजीवियों का नेताओं के बयानों पर टीका टिप्पणी करने और समर्थकों का उनके लिए छाती पीटने भर से रह गया है। रही-सही कसर सोशल मीडिया पूरी कर देता है क्योंकि अब संवाद एक तरफ़ा हो चला है।

 हम जब मीडिया की पढाई कर रहे थे तब एक थ्योरी थी "बुलेट थ्योरी" जिसका मोटा सा मतलब यह था कि खबरें बन्दूक से निकली गोली की तरह होती हैं जिसका कोई फीडबैक नहीं आता और आज के सन्दर्भ में यह बात नेताओं की टिप्पणियों पर लागू होती है। बस वो ट्वीट कर देते हैं और उसके बाद सब अपने हिसाब से लड़ते रहो। 

 खैर यह बात तो प्रसंगवश लिख दी लेकिन बात तो मैं जेएनयू के मुद्दे पर करना चाह रहा था।

 मैं अभी तक इस बात को समझ नहीं पा रहा हूँ कि यदि जेएनयू में पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगे भी तो उसके वीडियो फुटेज ( Is there any conspiracy? ) मीडिया तक कैसे पहुंचे ? इसका मतलब यह हुआ कि कोई वास्तव में विवाद भड़काना चाहता था। 

 दूसरी बात यह कि सरकार को इस मामले क्या वाकई में दखल देना चाहिए था ? यदि जेएनयू प्रशासन खुद इस बात पर एक्शन लेता तो क्या वह ज्यादा तार्किक नहीं होता ?

 तीसरी बात कि इस मामले में अज्ञात लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गयी तो गिरफ्तारी जेएनयू छात्र संगठन के अध्यक्ष ( Kanhaiya's Clearance. ) की कैसे और किस आधार पर हुई ? क्या उसने इस कृत्य समर्थन किया था?

चौथी बात कि कुछ लोगों द्वारा अंजाम दी गयी इस घटना के लिए पूरा जेएनयू कैसे जिम्मेदार हो गया ?

 यह वो कुछ बातें हैं जिन पर सोशल मीडिया दोनों पक्षों के लोग बहस कर रहे हैं। सब अपने समर्थन में वीडियो को दिखा रहे हैं। तो अनुरोध बस इतना है कि किसी निर्णय पर पहुँचने से पहले दिमाग को विभिन्न पहलुओं से सोचने के लिए थोड़ा खोल लें।

 मुझे और जो बात इस सब प्रकरण के पीछे नजर आई वो यह कि आने वाले साल में पश्चिम बंगाल और केरल के चुनाव होने हैं। दोनों ही राज्यों में लेफ्ट पार्टियों का अच्छा दबदबा है और जेएनयू का लेफ्ट से अच्छा ताल्लुक है। ऐसे में जेएनयू से जुड़ा कोई भी विवाद दोनों राज्यों में कार्यकर्ताओं और समर्थकों को इकठ्ठा करने में काम आएगा। लेकिन शायद सरकार यह भूल रही है कि इन दोनों राज्यों में ही लेफ्ट पार्टियों का आधार काफी मजबूत है तो इससे वो आपके कार्यकर्ताओं से ज्यादा लामबंद हो जायेंगे। कंही यह विवाद पटखनी जैसा न हो जाये जैसा "गोपालक" विवाद बिहार में उल्टा पड़ा था।

 एक और बात जो यह है कि कांग्रेस ने लेफ्ट पार्टियों से गठबंधन कर लिया है ऐसी ख़बरें चर्चाओं में हैं। तो कंही भाजपा को यह डर तो नहीं सताने लगा है कि कांग्रेस महज दो साल में ही फिर से मजबूत होने लगी है। जैसे बिहार में उसकी स्थिति सुधरी है अगर वह और जगह भी बेहतर हुई तो कांग्रेस मुक्त भारत का सपना कैसे पूरा होगा। 

 एक और बात जो मुझे इस प्रकरण में समझ में आ रही है वो यह है कि जेएनयू के विवाद से अफज़ल गुरु के विवाद को जोड़ देना कंही कश्मीर के संकट से उबरने के लिए अपने समर्थकों के बहाने जन समर्थन जुटाने का प्रयास तो नहीं है क्योंकि मुफ़्ती मोहम्मद सईद के निधन के इतने दिन बाद भी वहां सरकार नहीं बनी है।

 इसके अलावा भाजपा के लिए सबसे अहम चुनाव उत्तर प्रदेश के हैं और उसमें एक साल करीब का वक़्त रह गया है। वहां बसपा फिर से उभर रही है और हाल के पंचायत चुनावों में उसके समर्थन वाले प्रत्याशी जीते हैं। ऐसे में जेएनयू के माध्यम से दलित-पिछड़े वोटों ध्रुवों में बांटने का काम तो नहीं किया जा रहा ताकि मायावती के उभर को रोका जा सके, उन्हें सीबीआई से उतना डरा भी तो नहीं सकते जितना कि मुलायम सिंह यादव को और फिर सपा को तो भाजपा की राजनीति से हमेशा फायदा ही मिलता है। 

 तो बहुत से सवाल हैं और बहुत सी संभावनाएं बस आप अपना दिमाग खोलकर रखें जनाब। बाकि ये भारत है, विविधताओं से भरा, इसे किसी एक विचारधारा में किसी का भी बांधपाना नामुमकिन ही है चाहें तो पूरा इतिहास खंगाल के देख लो।

मंगलवार, 21 जनवरी 2014

मेरे सपनों का 'आप'राध

मैं अपराधी नहीं हूँ लेकिन आजकल लोग मुझे 'आप'राधी जरुर कहने लगे हैं। अब कुछ दिन पहले ही की बात है मैं सपने में अरविन्द  से मिला और कुछ प्रश्न किये जैसे कि क्या आप वाकई इतने ईमानदार हैं कि वजन तोलने की मशीन पर भी बिना कपड़ो के खड़े होते हैं ताकि वजन में कोई गड़बड़ी न हो या इतने धरनेबाज कि आपकी पत्नी आपके लिए खाना भी नहीं बनाती क्योंकि उन्हें डर होता है कि कंही खाना ख़राब बना तो आप घर में ही धरना देने बैठ जायेंगे (ये बातें मैं नहीं पूछ रहा ये तो दिल्ली और देश की जनता पूछ रही है मैसेज,मेल और सोशल मीडिया पर ) तो मुझ पर तुरंत आरोप लगा दिया गया कि आपको चायवालों ने भेजा है और आप 'आप' पर प्रश्न करके बहुत गम्भीर 'आप'राध कर रहे हैं।

 तभी अरविन्द मेरे खिलाफ धरना देने मेरे बेड के बगल में ही बैठ गए और और हाय हाय करके मेरा इस्तीफ़ा मांगने लगे। अब मैं तो कुछ काम धंधा करता नहीं यूँही बस कुछ सपने देखता हूँ उसी आम आदमी की तरह जिसकी बात अरविन्द करते हैं तो अब मैं क्या इस आम आदमी के पद से भी इस्तीफ़ा दे दूं।

साभार-www.mysay.in

 अरविन्द अनशन कर ही रहे थे कि मेरे सपने में सुबह-सुबह एक चायवाला चला आया और कहने लगा कि लो इसे भूल जाओ और ये हमारी विकासपरक चाय नारंगी कप में पियो (हालाँकि उसके सारे बर्तन और कपडे भगवा थे लेकिन नारंगी ही मुझे लगे क्यूंकि सुबह-सुबह नींद में आँखे सर्दियों में कहाँ पूरी खुलती हैं )। अब मैं न चाय पियूं न कॉफी तो मुझे क्यूँ उसकी परवाह रही तो सुबह-सुबह मैंने उसकी भी बाईट लेना चाही जैसे मीडिया हर मिनट की अरविन्द की अप्डेट देता है। मैंने  उससे भी पूछ लिया कि ये बताइये कि आपने ऐसे कौन से कर्म किये कि आप चाय वाले से प्रधानमंत्री तक बनने वाले हैं वरना इस देश में तो चायवाला नुक्कड़ से आगे जा ही नहीं पाता। फिर एक और बात कि चाय के धंधे में ऐसी भी क्या कमाई कम थी जो यहाँ चले आये क्यूंकि यहाँ तो ईमानदार कमा ही नहीं पाते। अब चाय वाला मोदी था और मैं समझ नहीं पा रहा था कि गुजरात में मोदी दलित कैसे हो गए या फिर यह भी सरकारी गलती है ठीक वैसी ही जैसी राखी बिडलान के बिड़ला होने में हुई तो उनका वीपी सिंह बढ़ गया और पीछे नारंगी टोपी में खड़ा उनका डॉक्टर मेरे पीछे पिल पड़ा कि आप, 'आप' की तरह प्रश्न पूछकर बहुत बड़ा 'आप'राध कर रहे हैं।
साभार-श्रेयस नवारे

 अब मैं ठगा सा रह गया कि ये भी 'आप'राध है, तो अपराध क्या है ? ये बातें चल ही रही थी कि अंगूठा चूसते हुए,चश्मा लगाये एक लड़का अपनी माँ के पीछे से मेरे सपने में झाँक रहा था। मैंने आवाज देकर उसे आगे बुलाया लेकिन उसने पहले माँ को आगे भेज दिया मैंने कहा अब तो मैं मारा गया क्योंकि माताजी की तो सबको सुननी पड़ती है वो किसी की नहीं सुनती। मैंने  उस बच्चे को पास बुलाया और प्यार से पूछा कि क्या चाहिए इतनी सुबह-सुबह तो वो बड़े मिमियाते हुए बोला कि इन दोनों ने हमारी टोपी चुरा ली और अपने-अपने हिसाब से इस्तेमाल कर रहे हैं। इनमे से एक ने तो मेरी कविता का शीर्षक भी चुरा लिया अब मैं कहां कॉपीराइट की शिकायत करूँ।

 तो मैंने भी कहा बेटा तुम्हारी माँ तो हर फैसला करती है तो उसी से शिकायत कर दो। फिर वैसे भी उस कविता का तुम क्या करते क्योंकि जब तक वो तुम्हारे पास थी तुम उसे ये भरोसा ही नहीं दिला पाये कि तुम इस कविता को कंही प्रकाशित भी करा सकते हो। लोगों को लगा कि चोरी की होगी इसीलिए डर रहा है तो अब अंततः किसी ने चुरा ही ली, और वैसे भी ये मेरा सपना है तुम्हारी माँ वाला तो है नहीं कि सरकार बदलते ही मेट्रो से एयरपोर्ट तक सब गायब हो जाये। बस फिर उसने दहाड़ मारकर रोना शुरू किया और उसकी माँ मुझ पर बरसने लगी कि ये भी कोई तरीका है बच्चों से बात करने का और अगर आप ऐसा कर रहे हैं तो आप बाल 'आप'राधी हैं। 

 अब मेरे सबर ने भी सबर कर लिया कि मैं जो भी बात बोलूं मैं ही 'आप'राधी हो जाता हूँ बस फिर क्या था मैंने अपने बिस्तर के बगल से उतारकर चप्पल पहनी और चला सुबह-सुबह पाखाने की ओर इन सबको पीछे चिल्लाता छोड़कर। अब सुबह-सुबह मैं भी काम के काम न कर इनकी कामचोरी के किस्से सुन रहा था, तो पाखाने में इनका शोर बंद करने के लिए जैसे ही मैंने दरवाजा बंद किया मेरी नींद टूट गयी। फिर क्या था बस मुझे समझ में आ गया कि सारा 'आप'राध मेरे सपनों का ही था।