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मंगलवार, 20 अक्टूबर 2015

क्या ऐसा ही भारत हमने बुना था ?

गूगल से साभार
क्या ऐसा ही भारत हमने बुना था ?

जहाँ डिजिटल संवाद हर रोज़ बढ़े,
समाज आपस में ही न बतियाए,

जहाँ बड़े-बड़े सवालों को,
कुछ दिन चुप रखकर टाल दिया जाए,

जहाँ दूरियां पाटने के सेतु बनाने हों,
वहाँ रोजाना एक नई खाई खोद दी जाए,

जहाँ एक ज़िंदा इंसान की कीमत,
एक जानवर से कम हो जाए,

जहाँ दंगा कराने वालों को,
देश का हीरो मान लिया जाए,

जहाँ अपनी बात सिर्फ रखने पर,
बात करने लायक ही न रहने दिया जाए,
क्यों बिठाया हमने नालायक को,
रख दिया उसके सिर पर ताज,

क्या अधिकार था उसे कि झोंक दे,
पूरे समाज को दशकों की आग में,
और चले हर तरफ नंगा नाच,

फिर जब वो चल बसा,
क्यों उस पौधे को बढ़ने दिया,
क्यों ना किया हींग-फिटकरी का इलाज़,

इलाज़ की तो बात छोड़िये,
हमने ज़हर को ही मरहम क्यों समझा,
क्यों गिरि के एक शेर को हमने,
अपने गाँव का रास्ता दिखा दिया,

हम भी बड़े निर्लज्ज हैं,
जो ठंडी लाशों पर,
रोटियां उन्हें सेकने देते हैं,

करते हम ही हैं सबकुछ,
बस दोष दूसरों को देते हैं,

खुद से एक बार पूछें,
क्या सच में ऐसा ही भारत बुना था ?