बुधवार, 26 अप्रैल 2017

बेग़म जान : बेहतरीन हुनर की बरबादी

 हुत दिनों से कुछ लिखा ही नहीं या यूँ कहें कि लिखने का मन ही नहीं। लेकिन जब आज सोचा कि कुछ लिखा जाए तो ख्याल आया कि इसकी शुरुआत किसी फिल्म से क्यों न की जाये?


 सोच तो रहा था कि "बेग़म जान" पहले ही देख लूंगा लेकिन जब आज देखा तो लगा कि सही किया जो इसे पहले नहीं देखा। हमारे यहाँ किसी के हुनर को बर्बाद कैसे किया जाता है, इसकी बानगी है ये फिल्म। कई बड़े नाम इस फिल्म में हैं जैसे नसीरुद्दीन शाह, आशीष विद्यार्थी , रजित कपूर, राजेश शर्मा, इला अरुण और विद्या बालन, जिन्होंने तरह-तरह के किरदार में अपने अभिनय का लोहा मनवाया है। लेकिन 'बेग़म जान' की लचर कहानी इनकी इस काबिलियत का ठीक से इस्तेमाल ही नहीं कर पाती। 

 फिल्म कहानी इतनी है कि हिंदुस्तान और पाकिस्तान का बंटवारा हो गया है। दोनों देशों के बीच सीमा रेखा खींची जानी है जो "बेग़म जान" के घर के बीच में से निकलती है। बेग़म जान के किरदार में विद्या बालन हैं और वो एक तवायफ़खाना की मालकिन है जिसके बीच से ये सीमा गुजरनी है। 

 फिल्म की इतनी पटकथा समझ में आती है और जायज़ भी लगती है। इतनी सी  कहानी को लेकर अगर चंद्रप्रकाश द्विवेदी जैसा कोई निर्देशक होता तो "पिंजर" जैसी शानदार फिल्म बना सकता था।

 लेकिन निर्देशक सृजित मुखर्जी बस यंही से अपनी कहानी से भटक जाते हैं जिसमें न तो वेश्याओं की संवेदनाएं हैं, न विभाजन की त्रासदी का असर और न ही अपने कोठे को बचाने के लिए जान दे देने के पीछे का तर्क, बस सब मरते जा रहे हैं , लेकिन क्यों, इसका जवाब कहीं भी फिल्म में नहीं हैं। 

 अगर फिल्म में विद्या बालन के दो चार संवाद के अलावा कुछ देखने लायक है तो बस आशीष विद्यार्थी और रजित कपूर के आधे-आधे चेहरों के साथ शूट किये गए कुछ दृश्य जिसके भाव भी अच्छे हैं और सिनेमाटोग्राफी भी बढ़िया है। यहाँ तक कि नसीर भी कोई असर नहीं छोड़ते। इससे बेहतर नवाब या राजा का किरदार उन्होंने "डेढ़ इश्क़िया" में किया है। इससे पहले हमने "इश्किया" में नसीर यार विद्या को साथ देखा है और वो दोनों किरदार आपके फलक पर आज भी ज़िंदा हैं लेकिन यहाँ दोनों ही फीके हैं।

 बाकी किसी किरदार में कोई जान नहीं है और न ही वो कोई प्रभाव छोड़ने वाला है। सिर्फ विद्या किसी तरह अपने कन्धों पर फिल्म को ढोती हुई नजर आ रही हैं। चंकी पांडे ने यूँ तो फिल्म में खलनायक की भूमिका निभाई है लेकिन  सिरहन नहीं पैदा करता बल्कि उन पर उनकी हाउसफुल सीरीज का छिछोरापन ही हावी दिखता है।

हालाँकि लाड़ली के किरदार में ग्रेसी का कपड़े उतारने वाला दृश्य पूरी तरह से अचंभित करने वाला है जहाँ उसकी आँखें अभिनय कर रही हैं। 

 इनमें से किसी की भी अभिनय क्षमता पर कोई सवाल नहीं हैं लेकिन अच्छे हुनर की बर्बादी ऐसे ही की जाती है। बहुत साल पहले "चाइना गेट" नाम से एक फिल्म आयी थी, तब मैं बहुत छोटा था तो उतनी समझ नहीं थी लेकिन जब हाल में उसे मैंने दुबारा देखा तो समझ में आया कि वो फिल्म कम बल्कि एक वृद्धाआश्रम ज्यादा थी।

 उस फिल्म में भी नसीर के अलावा अमरीश पुरी, जगदीप, ओमपुरी, डैनी जैसे अपने दौर के मंझे कलाकार थे। लेकिन उस फिल्म में नया कुछ भी नहीं था, क्योंकि हम इन कलाकारों को उसी रूप में देखने के आदि थे। इसी तरह "बेग़म जान" इन बड़े अभिनेताओं की नुमाइश है जो कुछ कर नहीं रहे हैं लेकिन बस कर रहे हैं। हम ये क्यों नहीं समझते कि अच्छी फिल्म अच्छी कहानी पे बनती है न की यूँ अभिनेताओं के जमावड़े से। 

 "बेग़म जान" की कमी सिर्फ उसकी लचर कहानी नहीं है, बल्कि फिल्म ट्रीटमेंट के हिसाब से भी ख़राब है। फिल्म में पहनावे और भाषा पे कोई ध्यान नहीं है। यदि वो होता तो शायद फिल्म को झेल पाना थोड़ा और आसान होता। विद्या अकेले के अलाव निर्देशक को सबको जिम्मेदारी देनी चाहिए थी और खुद भी थोड़ा ईमानदारी से काम करते तो फिल्म अच्छी होती। 

 अब देखना न देखना आपकी मर्जी है। मुझे तो ये ऐसी ही लगी। वैसे अगर आपने "पिंजर" न देखी हो तो एक बार देख जरूर लेना। 

बुधवार, 26 अक्टूबर 2016

कितना कुछ है गोलगप्पों के पास...

 मेरे हिसाब से गोलगप्पों को भारतीय खानपान में सबसे ऊपर रखना चाहिए क्योंकि स्वाद की पूरी की पूरी संस्कृति का समागम है इनमें। आप जहाँ भी जाएं गोलगप्पों का स्वाद उसी देस के रूप रंग में ढल जाता है। तभी तो "क़्वीन" फिल्म में भी जब कंगना रनौत को भारतीय खाने से रूबरू कराने की चुनौती मिलती है तो वो पूरे जी-जान से गोलगप्पे ही बनाती हैं।

 गोलगप्पे इन्हें दिल्ली की भाषा में कहा जाता है, लेकिन भारत में इसे अलग-अलग जगहों पर गुपचुप, पानी के बताशे, पानी की टिकिया और फुचकु जैसे न जाने कितने नामों से जाना जाता है। कुछ लोग इसे खाते हैं तो कुछ इसे पीते हैं।

 वैसे ये होती आटे और सूजी से बनी पूरियां ही, बस इनका मिज़ाज़ थोड़ा कड़क होता है। पूरियां तो नरम पड़ जाती हैं लेकिन ये खट्टा या मीठा पानी भरने के बाद भी करकरी ही बनी रहती हैं। 

हज़रतगंज के अजय भाई
 मेरा ये निजी मत है कि किसी उत्तर भारतीय शहर के स्वाद का अंदाज़ वहां के गोलगप्पों से ही समझ आ जाता है। अभी हाल ही में मैं जब खजुराहो गया तो मैंने सबसे पहले गोलगप्पे ही खाये। वहां इनमें आम स्वाद भी नहीं था तो शहर में क्या ख़ाक अच्छा मिलने वाला था खाने को? हुआ भी यही वहां कुछ भी ऐसा नहीं मिला खाने को जो उस शहर की रंगत का एहसास कराए।

 यूँ तो मैंने कई शहरों के गोलगप्पे खाये हैं लेकिन लखनऊ के हज़रतगंज के गोलगप्पों का जो नवाबी अंदाज़ है वो अपने आप में स्मृति में रह जाने वाला है। सितंबर में मैं जब लखनऊ गया तो मोती महल का स्पेशल समोसा खाने के बाद भी मेरा मन गोलगप्पे में ही अटका था क्योंकि इनका स्वाद पहले भी एक-दो बार ले चुका था। थोड़ा बाजार की तरफ बढ़ा तो साहू सिनेमा के सामने अजय भाई मिल गए, और मेरी गोलगप्पे खाने की तम्मना पूरी हो गयी।

मोती महल का स्पेशल समोसा


 लखनऊ के गोलगप्पों की खास बात उनमें भरा जाने वाला चटपटा पानी है। आम तौर पर दूसरे शहरों में गोलगप्पों के साथ खट्टा और मीठा पानी ही मिलता है लेकिन लखनऊ में आपको इसकी पांच से छह किस्में मिल जाएंगी। इसमें भी खास है इसे खिलाए जाने का क्रम। आप अपनी सुविधा के हिसाब से तीखे से शुरू कर मधुर या मधुर से तीखे स्वाद की तरफ रूबरू हो सकते हैं।

 अब ये ज़ायका इतना इंतिख़ाबीपन तो लिए होगा ही, नवाबों के शौक से जो पला है ये शहर। फिर अवध का क्षेत्र है तो "जी की रही भावना जैसे, प्रभु मूरत देखी वो वैसी"।

 लखनऊ के गोलगप्पों में जब पानी भरा जाता है तो क्रम के हिसाब से मीठा पानी बीच में ही कंही होता है। और ये अजय भाई का नहीं बल्कि सभी खोमचे वालों का तरीका है। इसकी वजह अजय भाई ने बताई नहीं लेकिन मैंने ही अंदाज़ा लगाया। मेरे हिसाब से बीच में मीठा पानी होने की वजह, हर तरह पानी के स्वाद का असल एहसास करना हो सकती है। अब अगर आप तीखे पानी से खाना शुरू करें तो आपकी जीभ की इन्द्रियां बहुत सक्रिय हो जाएँगी ऐसे में आगे जो पानी हैं उनका स्वाद कैसे आएगा ? इसलिए बीच में  मीठे पानी का गोलगप्पा खाने से जीभ को शांति मिलेगी और आगे के दूसरी तरह के पानी का ज़ायका अच्छे से उभरकर आएगा। ऐसे ही अगर दूसरी तरफ से शुरू करते हैं तो भी जीभ को वापस नए टेस्ट के मोड में लाने के लिए ही मीठे पानी का उपयोग होगा।
"गोलगप्पे से मेरे बचपन की भी एक याद जुड़ी है। मेरा ननिहाल मथुरा में है। तब छुट्टियों में नानी के घर जाने का बड़ा कौतूहल होता था। नानी के घर के पास शाम को एक गोलगप्पे वाला आता था। हम सब बच्चे उसे घेर के खड़े हो जाते थे। उसके पानी में एक अलग तरह का तीखापन होता था जो सीधा गले में लगता था। उसके पानी में टाटरी होती थी तो वो गज़ब का खट्टा होता था। पुदीना और हरी मिर्च की चटनी में काली मिर्च का हल्का सा स्वाद उस पानी को इतना अलग बना देता था कि मुझे आज भी याद है। उसके गोलगप्पों के पानी में इस काली मिर्च के प्रयोग से ही मथुरा के खाने का  आप अंदाज़ा लगा सकते हैं। आज भी मथुरा के असल खाने में आपको काली मिर्च का बहुत संतुलित प्रयोग देखने को मिलेगा। 
अच्छा उस गोलगप्पे वाले की एक और खास चीज मुझे याद है। वो उसमें मटर के साथ एक तली कचरी डाला करता था। कचरी का स्वाद हल्का सा  कड़वा होता है जो खट्टे पानी के साथ मिलकर अनोखा प्रभाव छोड़ता है। खैर तब हम छोटे थे तो बहुत ज़िद के बाद कचरी वाला एक गोलगप्पा खाने को मिलता था।"
  अब मथुरा जाता हूँ तो वो गोलगप्पे वाला नहीं मिलता। लेकिन मैं हूँ चाट का शौक़ीन तो वहां की घीया मंडी और मंडी रामदास की चाट का जवाब ही नहीं है।

 मथुरा के नजदीक ही आगरा में अगर आपको गोलगप्पे और चाट का स्वाद लेना है तो बेलन गंज का बाज़ार घूम आइये। दिल खुश हो जायेगा वहां की चाट और गोलगप्पे खाकर।

 मेरे गृहनगर झाँसी में भी गोलगप्पे का एक अलग मिज़ाज़ है। वहां पर उनमें भरे जाने वाले उबले आलू अच्छे से लाल मिर्च के मसाले में लपेटे जाते हैं जिन पर कच्चा प्याज़ लगाकर फिर गोलगप्पे में खट्टा पानी भरकर खाया जाता है।

 इस कहानी का अंत करते हुए एक बात और बताता हूँ। दिल्ली को छोड़कर आप इन जगहों में से कंही भी गोलगप्पे खाइये आपको पानी में मीठी चटनी खुद से नहीं मिलेगी, उसके लिए आपको गोलगप्पे वाले से कहना पड़ेगा। वंही दिल्ली में आपको "गोलगप्पे वाले भैया" से मीठा नहीं लगाने के लिए कहना होगा।

मोती महल हज़रतगंज

मंगलवार, 13 सितंबर 2016

दो रूपये का प्लेटफाॅर्म टिकट

 स दिन मैंने उसके लिए सिर्फ एक दो रूपये का प्लेटफाॅर्म टिकट ही तो खरीदा था बस, आठ साल करीब बीत चुके हैं इस घटना को। वो टिकट भी मैंने उसके लिए सिर्फ इसलिए लिया क्योंकि उसके पास खुले रूपये नहीं थे और उसे एक रिश्तेदार को गाड़ी में बिठाने जाना था। इसके अलावा हमारी कोई जान-पहचान नहीं थी तब।

 वो अपनी बुआ को छोड़ने आया था। उनकी और मेरी सीट आस-पास ही थी तो इस वजह से मेरी और जतिन की गाड़ी में ही थोड़ी बातचीत हुई। फिर जब ट्रेन चलने लगी तो वो मुझसे यह कहकर चला गया कि बुआजी को ग्वालियर उतारकर मैं उसे फोन कर दूं। मैंने ऐसा ही किया और उसके बाद बात आयी-गयी हो गई।

 उसके बाद मेरी और जतिन की एक-दो बार और बातचीत हुई। फिर एक बार वो राजौरी गार्डन में मेरी किराये की कोठी पर मिलने भी आया और उसके बाद हम अपने काम-धाम में व्यस्त हो गए। बस फेसबुक पर हमारी कभी-कभी राम-राम हो जाती थी, इससे ज्यादा मिलना-जुलना हो नहीं पाया।

 वैसे भी जतिन पुणे, कतर और भी ना जाने कहां-कहां काम के सिलसिले में गया तो मुलाकात तो वैसे भी संभव नहीं हो पायी। एक बार जतिन जब कतर से लौटकर आया तो ग्वालियर जाने से पहले उसने नयी दिल्ली स्टेशन पर मिलने के लिए बोला और मैं बस समय निकालकर पहुंच गया। उसके बाद हमारी करीब तीन साल बाद मुलाकात एक सफर में हुई जब मैं झांसी अपने घर और वो ग्वालियर अपने घर जा रहा था।

 आज मैं जब यह वृतांत लिख रहा हूं तो यह ख्याल मन में आ रहा है कि पिछले आठ सालों में हमारे बीच कुछ भी अनोखा नहीं घटा और एक सामान्य जान-पहचान का रिश्ता ही रहा। लेकिन फिर भी एक अलग तरह की घनिष्ठता है इस संबंध में, कम से कम मेरी ओर से तो है और जब मैं इसके पीछे की वजह टटोलता हूं तो मुझे लगता है कि इस दौरान शायद हमने आपस में एक-दूसरे से किसी भी तरह की कोई अपेक्षा नहीं रखी।

 आजकल के समय में संबंधों में अपेक्षाओं का बड़ा जंजाल देखने को मिलता है। दोस्ती से इतर वाले संबंधों में तो यह बड़े पैमाने पर दिखता है।

 जतिन और मेरे बीच सिर्फ सम्मान का भाव है, एक-दूसरे के व्यवहार के प्रति सम्मान। अपेक्षाएं कुछ भी नहीं, कम से कम मेरी ओर से तो बिल्कुल भी नहीं और शायद इसलिए यह मित्रता कायम है।
हमारे बीच आपस में कोई डबल स्टैंडर्ड नहीं है। एक-दूसरे को उसी रूप में स्वीकारते हैं क्योंकि वैसे भी हम मनुष्य हैं, मशीन नहीं कि एक जैसे सब हो जाएं। मेरे लिए वह वैसा ही दोस्त रहा जैसे कि मेरे कुछ और दोस्त हैं और शायद उसकी ओर से भी यही बात रही।

 शायद हम दोनों को यह भी समझ है कि किसी संबंध में प्रगाढ़ता के लिए जरूरी नहीं कि रोज बातचीत की जाए या अक्सर मुलाकात की जाए, हां लेकिन संबंधों में विश्वास बनाए रखा जाए।

 आज यह बात इसलिए लिख रहा हूं क्योंकि कुछ दिन पहले किसी से संबंधों के बारे में चर्चा हो रही थी तो मैंने उसे यह उदाहरण दिया कि संबंध को निभाना होता है वह भी निष्काम भाव से और उसे अपेक्षाओं से जितना दूर रखो उतना बेहतर वह होगा। बस अपना आत्मसम्मान बनाए रखो और दूसरे को बराबरी का सम्मान देते रहो। संबंध कभी खराब नहीं होंगे।

 अब जतिन से मेरी आखिरी मुलाकात और बातचीत उसके विवाह पर हुई थी। छह माह से ज्यादा हो चुके हैं और उसके परिवार से उस दौरान मैं पहली बार मिला था। पहली बार में उन्होंने जो सम्मान और आदर दिया बस इस दोस्ती में वह काफी है।

 अब यह दो रूपये का प्लेटफाॅर्म टिकट सरकार ने भले दस रूपये का कर दिया हो लेकिन उसकी वजह से जतिन की अच्छी दोस्ती फिलहाल मेरे पास है और दुआ है कि आगे भी बनी रहेगी। बाकी देखते हैं कि अब अगली मुलाकात कब होती है।