रविवार, 1 अक्टूबर 2017

अच्छे दिन...

पहले वो हिंदू-मुसलमान करेंगे,
फिर तुम्हें आपस में लड़ाएंगे,
इसकी आदत डलवाएंगे,
संवेदनशीलता को रौंदेगे,
एक-दूसरे की जान का,
प्यासा बनाएंगे,
फिर किसी दिन तुमसे,
किसी का क़त्ल करवाएंगे,
फिर एक दिन तुम्हें ही,
निर 'आधार' बता कर,
तुम्हें देश का दुश्मन बताएँगे,
गरीब को अमीर का हक़
मारने वाला बताएँगे,
फिर एक दिन सेना आएगी,
जो तुम्हें रौंद जाएगी,
इसे वो देशहित जताएंगे,
सच कहता हूँ "मित्रों'
तब तुम्हें ये "अच्छे दिन"
बहुत याद आएंगे...

गुरुवार, 7 सितंबर 2017

कहने को बस यही है...

 ल शिक्षक दिवस था तो यह बात मैं कल भी लिख सकता था। लेकिन एक डर था कि कल की भीड़ में ये बात कहीं खो जाती। वैसे आजकल डर कई तरह के हो गए हैं, फिर वह चाहे अपनी बात कहने का डर हो, या सोशल मीडिया पर ट्रोल किये जाने का या सरकार से सवाल पूछने का। खैर इन सभी के बारे में फिर कभी बात की जा सकती है क्योंकि ये बात मैं आज करना ही नहीं चाहता... 

 बचपन में अक्सर हम अपने शिक्षकों से ही या आस-पास के लोगों से या बड़ों से ये सुना करते थे कि एक शिक्षक के जीवन का सबसे अच्छा पल क्या होता है...? जवाब होता था कि जब किसी शिक्षक का पढ़ाया कोई विद्यार्थी बहुत सालों बाद उससे मिलता है और अपने जीवन में बहुत सफल होने के बावजूद शिक्षक के पैर छू लेता है तो शिक्षक का सीना गर्व से फूल जाता है। 

 हमारी फ़िल्में भी शिक्षक जीवन के इस पहलू को दिखाती रही हैं। हाल के वर्षों में आयी "दो दूनी चार" और "चॉक एंड डस्टर" नाम की दो फ़िल्में मुझे याद हैं जिनमें यही बात दिखाई गयी है। लेकिन मेरा मानना है कि यह इस बात का केवल एक पहलू है।

 यदि कोई छात्र सफल होकर अपने शिक्षक का सम्मान करता है तो यह उस शिक्षक की निश्चित सफलता है। लेकिन उसके उन्हीं छात्रों में से कोई समाज का विनाशक हो जाता है तो क्या उसके पैर छूने से भी उस शिक्षक का सीना गर्व से फूल जाता होगा...?

 मेरा मानना है कि ये उस शिक्षक की असफलता तो है लेकिन उससे भी बड़ी ये उस छात्र की असफलता है कि वह अपने शिक्षक के लिए सम्मान का कारण नहीं है। यहीं पर एक छात्र की सफलता का प्रश्न भी खड़ा हो जाता है। 

 हमारे समाज की विडंबना भी यही है कि हम एक पक्ष से सारी जिम्मेदारियां निभाने को कहते हैं लेकिन हमारी दूसरे पक्ष के प्रति क्या जिम्मेदारी है, इस सवाल पर चूं तक नहीं करते। महिला-पुरुष संबंधों के दायरे में आप इस बात को देखेंगे तो ज्यादा बेहतर तरीके से समझ पाएंगे। तो यहाँ प्रश्न एक शिक्षक के प्रति विद्यार्थी की सफलता का है। इस छोटे से वाकये से समझाना चाहता हूँ... 
 "पिछले साल मैं अपने कॉलेज के पुरातन छात्र सम्मलेन में गया था। करीब 7-8 साल बाद कॉलेज जाना हुआ। तो अपने पुराने दोस्तों, शिक्षकों से मिलकर खुश था। सब यादों को ताज़ा कर रहे थे कि कौन क्या किया करता था ? कौन पढ़ाई में अव्वल था तो कौन किसी और काम में ?
इसी दौरान मेरे हिंदी के शिक्षक भास्कर रोशन वहां आये और वर्तमान वर्ष के छात्रों से मेरा परिचय कराने लगे।
भास्कर सर ने मुझे सिर्फ कॉलेज के फर्स्ट ईयर में हिंदी पढ़ाई थी। वो भी मेरा सिर्फ क्वालीफाइंग पेपर था। लेकिन उन्होंने जब मेरा परिचय कराया तो मेरे पास प्रतिक्रिया देने के लिए शब्द नहीं थे क्योंकि मुझे अंदाज़ा नहीं था कि उन्होंने मुझे इस तरह से याद रखा होगा। 
उनके शब्द थे, " ये मेरे उन छात्रों में से एक है जिसे मैंने शायद अपने जीवन में आज तक सबसे ज्यादा अंक दिए हैं। जबकि ये मुझसे सिर्फ क्वालीफाइंग पेपर ही पढ़ा करता था।"
 उस समय मुझे लगा कि ये शायद एक छात्र के तौर पर मेरी आंशिक ही सही लेकिन एक सफलता तो है।

 मुझे अहसास हुआ कि वाकई इस बात में कितनी गहराई है कि आप अपने शिक्षक को कैसे याद रखते हैं उससे बड़ी बात है कि वो आपको एक सफल छात्र के रूप में यद् रखता है जो समज को गढ़ रहा है या एक ऐसे छात्र के रूप में याद करता है जो समाज का विनाशक बन चुका है। 

 मेरा मानना है कि शिक्षक अपनी हिस्से का काम उसी दिन पूरा कर देता है जब वह अपने छात्र को डर से लड़ने की शक्ति दे देता है। उसके बाद जिम्मेदारी छात्र की होती है कि वह उस शक्ति का इस्तेमाल अपने शिक्षक का सीना गर्व से फुलाने में इस्तेमाल करना चाहता है या उसके मस्तक को शर्मसार कर झुकाने में...
भास्करोदय...
 वैसे भास्कर सर की दो बातें मुझे हमेशा याद रहती हैं-

"लिखते समय शब्दों का इस्तेमाल बहुत कंजूसी से करना चाहिए।"
"गुस्से को दबाना चाहिए ,ना कि सवालों को। "

शुक्रवार, 28 अप्रैल 2017

सफर, जीवन के एक दशक बीतने का

अब मैं ऐसा नहीं दिखता... 

 ज जब मैं यह लिख रहा हूँ तो दिल्ली आये हुए 10 साल का वक़्त बीत चुका है। इस दौरान किशोर से जवां होने का सफ़र इसी दिल्ली में पूरा किया है। हालाँकि अभी भी मैं बच्चा बना रहना पसंद करता हूँ और इसलिए कभी-कभी बच्चों की तरह हरकतें करता हूँ लेकिन मैं उसे गलत नहीं मानता। मुझे लगता है कि मेरा यही बचपना मुझे इस हीन-भावना से भरी दुनिया में थोड़ा अलहदा बनाता है क्योंकि अपनी भावुकता को मैंने मरने नहीं दिया है, हाँ लेकिन उसे छिपाना मैंने सीख लिया है।

 जब इस 10 साल के सफर को पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है कुछ भी तो नहीं बदला लेकिन बहुत कुछ बदला है। बहुत से अनुभव अच्छे-बुरे दोनों तरह के रहे, रिश्तेदारों, दोस्तों, बॉस, सहकर्मी  के रूप में कई तरह की पूँजी जमा की लेकिन आज ख़ुशी के मौके पर बात सिर्फ अच्छी यादों की क्योंकि बुरी यादों की दास्ताँ लम्बी होती है।

 इस 10 साल में सबसे बड़ा बदलाव मेरे छोटे भाई का मुझसे कई साल बड़ा हो जाना है क्योंकि उसने घर की जिम्मेदारियां संभाल ली हैं। घर पर बड़ी से बड़ी घटना के बारे में मुझे तब पता चलता है जब वो निबट जाती हैं। उसके भीतर त्याग की जो भावना मैंने बचपन से देखी वो अब एक अलग पायदान को पार कर चुकी है और शायद मैं अब तक उसका अल्पांश ही अपना पाया हूँ, हाँ लेकिन यह यात्रा अभी जारी है।

 हम दोनों के बीच भाई-भाई वाला स्वार्थ तो पहले भी नहीं था और अब वह ज़रा भी नहीं बचा क्योंकि बचपन में ही हम इतना झगड़ा सुलझा चुके हैं कि अब आपस में लड़ने के लिए भी वक़्त नहीं है हमारे पास। हुआ बस यह है कि वो मेरा बड़ा भाई बन गया है और मैं उसका छोटा।

 दिल्ली आने के बाद कई रिश्तेदारों, दोस्तों की मदद मिली जिसमें पार्थ जैसा दोस्त भी मिला। कॉलेज में एक वही था जिसने इस बात पर गर्व करना सिखाया कि भाषा का सवाल महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि आपकी काबिलियत मायने रखती है।

 हमारे बीच दोस्तों की तरह कई झगडे हुए, सुलह हुई लेकिन बस स्वार्थ कभी नहीं आया। हालाँकि एक झगड़ा है जो मेरे मन में अटका रह जाता है लेकिन हम दोनों को ही ये मालूम है कि वो हमारी बढ़ने की उम्र थी। किशोर से जवां होने की उम्र। हम दोनों अब ज्यादा मिल नहीं पाते, ज्यादा बात भी नहीं करते। लेकिन उसकी एक बात है जो मुझे याद रहती है ,वो तब जैसा था आज भी वैसा ही है। अपने जीवन में आज तक मैंने उससे ज्यादा जमीन से जुड़ा व्यक्ति नहीं देखा। शायद मैं भी कभी फिसल गया हूँ लेकिन वो नहीं फिसला।

 अभी मुझे उसके सफल होने है इंतज़ार है और अब मैं उसे लेकर थोड़ा प्रोटेक्टिव भी रहता हूँ लेकिन मुझे सच मैं नहीं पता कि उसकी सफलता की खबर मिलने पर मैं रोऊँगा या खुश होऊंगा क्योंकि बहुत ज्यादा खुश होना भी रुला ही देता है।

 रिश्तेदारों में रिंकू मामा जैसा गाइड और राजू मामा जैसा लोकल गार्जियन यहीं दिल्ली में मिला। नीरू मामी, रितु मामी और प्रीति मौसी से मैं दोस्त की तरह कुछ भी बात कर सकता हूँ। शुभम और उत्सव की वजह से दस साल में छोटे भाई की याद कम आई। जिगीषा मेरे सामने पैदा हुई और स्कूल में पहुँच गयी और वैशाली-मयंक स्कूल से कॉलेज में इन्हीं 10 साल में आये।

 ग्रेजुएशन के बाद जब आगे बढ़े तो प्रमोद जैसा दोस्त मिला। एक ऐसा दोस्त जो सुपरमैन की तरह गुमनाम रहता है लेकिन आप एक बार मदद के लिए बुलाओ तो चला आएगा। एक और अजीब सा दोस्त मिला राहुल जो बिलकुल ही अलहदा मेरे जैसा, जो मेरी ही तरह बचपना करता और कभी-कभी बड़े भाई की तरह रास्ता भी दिखाता।

 इन 10 सालों में जो एक और बात बदली वो मुझमें और मेरे शहर की सोच में आया एक सकारात्मक बदलाव है। इस वजह से स्कूल के समय कुछ दोस्त बिछड़ गए, कुछ दूर हो गए और कुछ साथ रह गए।

 कहते हैं कि जिन लोगों के स्कूल के दोस्त जीवनभर उनके साथ होते हैं वो बहुत भाग्यशाली होते हैं तो मैं वैसा ही सौभाग्यवान हूँ जिसके पास दिल्ली में 10 के दौरान स्कूल के अच्छे दोस्त रहे और वो और ज्यादा घनिष्ठ हो गए।

 कहानी शुरू होती है अनुज और विवेक से और फिर तीनों सौरभ के साथ होते हुए कृष्ण मोहन, सजल एवं अमितेष पर ख़त्म होती है। इनके साथ होने की वजह यह नहीं है कि इनकी सोच मेरे जैसी है या इनकी और मेरे शहर की सोच में जो बदलाव आया है ये भी उसी तरह बदल गए हैं। बल्कि इनके साथ होने की वजह बस इतनी है कि यह मेरे सोच के बदलाव को अपना पाए हैं।

 इसी 10 साल के दौरान नौकरी भी शुरू हुई और नए लोगों से मिलने का हुनर भी सीखा।

 हिंदुस्तान में काम करने के दौरान सबसे पहले सीनियर के तौर पर पूनम ने मुझे काम में ईमानदारी और वक़्त की अहमियत समझाई और गोविंद सिंह सर ने अवसरों को नहीं गंवाने की सलाह के साथ जीना सिखाया। बाद में जब नव भारत टाइम्स पहुंचा तो शिल्पा जैसी एक अच्छी सहकर्मी और दोस्त मिली। अनु हम दोनों की शायद अब तक की सबसे बेहतरीन बॉस रही है। हाँ हम दोनों जब साथ काम करते थे तो उसकी बुराई करते थे लेकिन हम हीरों को तराशने वाली जौहरी वही थी।

 इसके बाद नौकरी बदल गयी और अर्पणा मिली जो सच में बड़ी बहन ही है। वो मुझे मारती है तो दुलारती भी है। उसकी बुराई कोई करता है तो मेरे अंदर का हुमायूं जाग जाता है। हालांकि अपनी लड़ाई लड़ने में वो झाँसी की रानी से कम नहीं है, इसलिए मुझे किसी तरह के लाव-लश्कर की अब तक जरूरत नहीं पड़ी है। हम दोनों को जो बात कॉमन बनाती है वो ये कि हम दोनों जानते हैं कि हम परफेक्ट नहीं है क्योंकि वो कोई नहीं हो सकता और हम दुनिया के सामने परफेक्ट होने का ढोंग भी नहीं करते।

 इस नई नौकरी के दौरान मनीष, प्रणव जैसे दोस्त भी मिले जिनके साथ अलग-अलग तरह का कॉम्बिनेशन है। अंकित, नोमान, भास्कर और कृतिका भी अच्छे दोस्तों में हैं।

 परवाह करने वाले वैभव और अनवर भाई भी हैं। इनमें भी वैभव भाई के साथ बिल्कुल बड़े भाई जैसा रिश्ता है तभी तो मैं कई बार बहुत उलूल-जलूल हरकतें करता हूँ लेकिन वो कभी बुरा नहीं मानते। बिल्कुल बड़े भाई की तरह समझाते हैं। मैं भी क्या करूँ घर पे ठहरा मैं बड़ा, तो हमेशा आठ-आठ कजिन्स पे हुकुम चलाने की आदत सी बन गई है ऐसे में अभी छोटों वाली नम्रता सीख रहा हूँ क्योंकि ज़िंदगी सीखते रहने का ही तो नाम है।

 एक और सीनियर हैं जो बिलकुल माँ की तरह ख्याल रखती हैं। साथ ही जलीस सर भी इसी दफ्तर में मिले जिनके साथ का अनुभव पहले भी साझा कर चुका हूँ।

 तो अब जब मैं 10 साल की इस यात्रा पर नज़र डालता हूँ तो पाता हूँ कि ये सारी पूँजी मैंने यहीं तो जमा की है जिसमें रिश्ते हैं, दोस्ती है और इतने सारे अच्छे अनुभव हैं। हालाँकि मुझे पता है कि यह स्थायी नहीं हो सकता है लेकिन फिर भी जब तक मेरी संपत्ति यही है और जब नहीं रहेगी तो भी कोई मलाल नहीं होगा क्योंकि इसमें कोई स्वार्थ नहीं है और जहाँ स्वार्थ नहीं होता वहां अपेक्षा भी नहीं होती किसी तरह के बंधन की...

 तो यह रहा सफर तब से अब तक का, जीवन के एक दशक बीतने का।

अब ऐसा दिखता हूँ...