शुक्रवार, 28 अप्रैल 2017

सफर, जीवन के एक दशक बीतने का

अब मैं ऐसा नहीं दिखता... 

 ज जब मैं यह लिख रहा हूँ तो दिल्ली आये हुए 10 साल का वक़्त बीत चुका है। इस दौरान किशोर से जवां होने का सफ़र इसी दिल्ली में पूरा किया है। हालाँकि अभी भी मैं बच्चा बना रहना पसंद करता हूँ और इसलिए कभी-कभी बच्चों की तरह हरकतें करता हूँ लेकिन मैं उसे गलत नहीं मानता। मुझे लगता है कि मेरा यही बचपना मुझे इस हीन-भावना से भरी दुनिया में थोड़ा अलहदा बनाता है क्योंकि अपनी भावुकता को मैंने मरने नहीं दिया है, हाँ लेकिन उसे छिपाना मैंने सीख लिया है।

 जब इस 10 साल के सफर को पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है कुछ भी तो नहीं बदला लेकिन बहुत कुछ बदला है। बहुत से अनुभव अच्छे-बुरे दोनों तरह के रहे, रिश्तेदारों, दोस्तों, बॉस, सहकर्मी  के रूप में कई तरह की पूँजी जमा की लेकिन आज ख़ुशी के मौके पर बात सिर्फ अच्छी यादों की क्योंकि बुरी यादों की दास्ताँ लम्बी होती है।

 इस 10 साल में सबसे बड़ा बदलाव मेरे छोटे भाई का मुझसे कई साल बड़ा हो जाना है क्योंकि उसने घर की जिम्मेदारियां संभाल ली हैं। घर पर बड़ी से बड़ी घटना के बारे में मुझे तब पता चलता है जब वो निबट जाती हैं। उसके भीतर त्याग की जो भावना मैंने बचपन से देखी वो अब एक अलग पायदान को पार कर चुकी है और शायद मैं अब तक उसका अल्पांश ही अपना पाया हूँ, हाँ लेकिन यह यात्रा अभी जारी है।

 हम दोनों के बीच भाई-भाई वाला स्वार्थ तो पहले भी नहीं था और अब वह ज़रा भी नहीं बचा क्योंकि बचपन में ही हम इतना झगड़ा सुलझा चुके हैं कि अब आपस में लड़ने के लिए भी वक़्त नहीं है हमारे पास। हुआ बस यह है कि वो मेरा बड़ा भाई बन गया है और मैं उसका छोटा।

 दिल्ली आने के बाद कई रिश्तेदारों, दोस्तों की मदद मिली जिसमें पार्थ जैसा दोस्त भी मिला। कॉलेज में एक वही था जिसने इस बात पर गर्व करना सिखाया कि भाषा का सवाल महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि आपकी काबिलियत मायने रखती है।

 हमारे बीच दोस्तों की तरह कई झगडे हुए, सुलह हुई लेकिन बस स्वार्थ कभी नहीं आया। हालाँकि एक झगड़ा है जो मेरे मन में अटका रह जाता है लेकिन हम दोनों को ही ये मालूम है कि वो हमारी बढ़ने की उम्र थी। किशोर से जवां होने की उम्र। हम दोनों अब ज्यादा मिल नहीं पाते, ज्यादा बात भी नहीं करते। लेकिन उसकी एक बात है जो मुझे याद रहती है ,वो तब जैसा था आज भी वैसा ही है। अपने जीवन में आज तक मैंने उससे ज्यादा जमीन से जुड़ा व्यक्ति नहीं देखा। शायद मैं भी कभी फिसल गया हूँ लेकिन वो नहीं फिसला।

 अभी मुझे उसके सफल होने है इंतज़ार है और अब मैं उसे लेकर थोड़ा प्रोटेक्टिव भी रहता हूँ लेकिन मुझे सच मैं नहीं पता कि उसकी सफलता की खबर मिलने पर मैं रोऊँगा या खुश होऊंगा क्योंकि बहुत ज्यादा खुश होना भी रुला ही देता है।

 रिश्तेदारों में रिंकू मामा जैसा गाइड और राजू मामा जैसा लोकल गार्जियन यहीं दिल्ली में मिला। नीरू मामी, रितु मामी और प्रीति मौसी से मैं दोस्त की तरह कुछ भी बात कर सकता हूँ। शुभम और उत्सव की वजह से दस साल में छोटे भाई की याद कम आई। जिगीषा मेरे सामने पैदा हुई और स्कूल में पहुँच गयी और वैशाली-मयंक स्कूल से कॉलेज में इन्हीं 10 साल में आये।

 ग्रेजुएशन के बाद जब आगे बढ़े तो प्रमोद जैसा दोस्त मिला। एक ऐसा दोस्त जो सुपरमैन की तरह गुमनाम रहता है लेकिन आप एक बार मदद के लिए बुलाओ तो चला आएगा। एक और अजीब सा दोस्त मिला राहुल जो बिलकुल ही अलहदा मेरे जैसा, जो मेरी ही तरह बचपना करता और कभी-कभी बड़े भाई की तरह रास्ता भी दिखाता।

 इन 10 सालों में जो एक और बात बदली वो मुझमें और मेरे शहर की सोच में आया एक सकारात्मक बदलाव है। इस वजह से स्कूल के समय कुछ दोस्त बिछड़ गए, कुछ दूर हो गए और कुछ साथ रह गए।

 कहते हैं कि जिन लोगों के स्कूल के दोस्त जीवनभर उनके साथ होते हैं वो बहुत भाग्यशाली होते हैं तो मैं वैसा ही सौभाग्यवान हूँ जिसके पास दिल्ली में 10 के दौरान स्कूल के अच्छे दोस्त रहे और वो और ज्यादा घनिष्ठ हो गए।

 कहानी शुरू होती है अनुज और विवेक से और फिर तीनों सौरभ के साथ होते हुए कृष्ण मोहन, सजल एवं अमितेष पर ख़त्म होती है। इनके साथ होने की वजह यह नहीं है कि इनकी सोच मेरे जैसी है या इनकी और मेरे शहर की सोच में जो बदलाव आया है ये भी उसी तरह बदल गए हैं। बल्कि इनके साथ होने की वजह बस इतनी है कि यह मेरे सोच के बदलाव को अपना पाए हैं।

 इसी 10 साल के दौरान नौकरी भी शुरू हुई और नए लोगों से मिलने का हुनर भी सीखा।

 हिंदुस्तान में काम करने के दौरान सबसे पहले सीनियर के तौर पर पूनम ने मुझे काम में ईमानदारी और वक़्त की अहमियत समझाई और गोविंद सिंह सर ने अवसरों को नहीं गंवाने की सलाह के साथ जीना सिखाया। बाद में जब नव भारत टाइम्स पहुंचा तो शिल्पा जैसी एक अच्छी सहकर्मी और दोस्त मिली। अनु हम दोनों की शायद अब तक की सबसे बेहतरीन बॉस रही है। हाँ हम दोनों जब साथ काम करते थे तो उसकी बुराई करते थे लेकिन हम हीरों को तराशने वाली जौहरी वही थी।

 इसके बाद नौकरी बदल गयी और अर्पणा मिली जो सच में बड़ी बहन ही है। वो मुझे मारती है तो दुलारती भी है। उसकी बुराई कोई करता है तो मेरे अंदर का हुमायूं जाग जाता है। हालांकि अपनी लड़ाई लड़ने में वो झाँसी की रानी से कम नहीं है, इसलिए मुझे किसी तरह के लाव-लश्कर की अब तक जरूरत नहीं पड़ी है। हम दोनों को जो बात कॉमन बनाती है वो ये कि हम दोनों जानते हैं कि हम परफेक्ट नहीं है क्योंकि वो कोई नहीं हो सकता और हम दुनिया के सामने परफेक्ट होने का ढोंग भी नहीं करते।

 इस नई नौकरी के दौरान मनीष, प्रणव जैसे दोस्त भी मिले जिनके साथ अलग-अलग तरह का कॉम्बिनेशन है। अंकित, नोमान, भास्कर और कृतिका भी अच्छे दोस्तों में हैं।

 परवाह करने वाले वैभव और अनवर भाई भी हैं। इनमें भी वैभव भाई के साथ बिल्कुल बड़े भाई जैसा रिश्ता है तभी तो मैं कई बार बहुत उलूल-जलूल हरकतें करता हूँ लेकिन वो कभी बुरा नहीं मानते। बिल्कुल बड़े भाई की तरह समझाते हैं। मैं भी क्या करूँ घर पे ठहरा मैं बड़ा, तो हमेशा आठ-आठ कजिन्स पे हुकुम चलाने की आदत सी बन गई है ऐसे में अभी छोटों वाली नम्रता सीख रहा हूँ क्योंकि ज़िंदगी सीखते रहने का ही तो नाम है।

 एक और सीनियर हैं जो बिलकुल माँ की तरह ख्याल रखती हैं। साथ ही जलीस सर भी इसी दफ्तर में मिले जिनके साथ का अनुभव पहले भी साझा कर चुका हूँ।

 तो अब जब मैं 10 साल की इस यात्रा पर नज़र डालता हूँ तो पाता हूँ कि ये सारी पूँजी मैंने यहीं तो जमा की है जिसमें रिश्ते हैं, दोस्ती है और इतने सारे अच्छे अनुभव हैं। हालाँकि मुझे पता है कि यह स्थायी नहीं हो सकता है लेकिन फिर भी जब तक मेरी संपत्ति यही है और जब नहीं रहेगी तो भी कोई मलाल नहीं होगा क्योंकि इसमें कोई स्वार्थ नहीं है और जहाँ स्वार्थ नहीं होता वहां अपेक्षा भी नहीं होती किसी तरह के बंधन की...

 तो यह रहा सफर तब से अब तक का, जीवन के एक दशक बीतने का।

अब ऐसा दिखता हूँ...

बुधवार, 26 अप्रैल 2017

बेग़म जान : बेहतरीन हुनर की बरबादी

 हुत दिनों से कुछ लिखा ही नहीं या यूँ कहें कि लिखने का मन ही नहीं। लेकिन जब आज सोचा कि कुछ लिखा जाए तो ख्याल आया कि इसकी शुरुआत किसी फिल्म से क्यों न की जाये?


 सोच तो रहा था कि "बेग़म जान" पहले ही देख लूंगा लेकिन जब आज देखा तो लगा कि सही किया जो इसे पहले नहीं देखा। हमारे यहाँ किसी के हुनर को बर्बाद कैसे किया जाता है, इसकी बानगी है ये फिल्म। कई बड़े नाम इस फिल्म में हैं जैसे नसीरुद्दीन शाह, आशीष विद्यार्थी , रजित कपूर, राजेश शर्मा, इला अरुण और विद्या बालन, जिन्होंने तरह-तरह के किरदार में अपने अभिनय का लोहा मनवाया है। लेकिन 'बेग़म जान' की लचर कहानी इनकी इस काबिलियत का ठीक से इस्तेमाल ही नहीं कर पाती। 

 फिल्म कहानी इतनी है कि हिंदुस्तान और पाकिस्तान का बंटवारा हो गया है। दोनों देशों के बीच सीमा रेखा खींची जानी है जो "बेग़म जान" के घर के बीच में से निकलती है। बेग़म जान के किरदार में विद्या बालन हैं और वो एक तवायफ़खाना की मालकिन है जिसके बीच से ये सीमा गुजरनी है। 

 फिल्म की इतनी पटकथा समझ में आती है और जायज़ भी लगती है। इतनी सी  कहानी को लेकर अगर चंद्रप्रकाश द्विवेदी जैसा कोई निर्देशक होता तो "पिंजर" जैसी शानदार फिल्म बना सकता था।

 लेकिन निर्देशक सृजित मुखर्जी बस यंही से अपनी कहानी से भटक जाते हैं जिसमें न तो वेश्याओं की संवेदनाएं हैं, न विभाजन की त्रासदी का असर और न ही अपने कोठे को बचाने के लिए जान दे देने के पीछे का तर्क, बस सब मरते जा रहे हैं , लेकिन क्यों, इसका जवाब कहीं भी फिल्म में नहीं हैं। 

 अगर फिल्म में विद्या बालन के दो चार संवाद के अलावा कुछ देखने लायक है तो बस आशीष विद्यार्थी और रजित कपूर के आधे-आधे चेहरों के साथ शूट किये गए कुछ दृश्य जिसके भाव भी अच्छे हैं और सिनेमाटोग्राफी भी बढ़िया है। यहाँ तक कि नसीर भी कोई असर नहीं छोड़ते। इससे बेहतर नवाब या राजा का किरदार उन्होंने "डेढ़ इश्क़िया" में किया है। इससे पहले हमने "इश्किया" में नसीर यार विद्या को साथ देखा है और वो दोनों किरदार आपके फलक पर आज भी ज़िंदा हैं लेकिन यहाँ दोनों ही फीके हैं।

 बाकी किसी किरदार में कोई जान नहीं है और न ही वो कोई प्रभाव छोड़ने वाला है। सिर्फ विद्या किसी तरह अपने कन्धों पर फिल्म को ढोती हुई नजर आ रही हैं। चंकी पांडे ने यूँ तो फिल्म में खलनायक की भूमिका निभाई है लेकिन  सिरहन नहीं पैदा करता बल्कि उन पर उनकी हाउसफुल सीरीज का छिछोरापन ही हावी दिखता है।

हालाँकि लाड़ली के किरदार में ग्रेसी का कपड़े उतारने वाला दृश्य पूरी तरह से अचंभित करने वाला है जहाँ उसकी आँखें अभिनय कर रही हैं। 

 इनमें से किसी की भी अभिनय क्षमता पर कोई सवाल नहीं हैं लेकिन अच्छे हुनर की बर्बादी ऐसे ही की जाती है। बहुत साल पहले "चाइना गेट" नाम से एक फिल्म आयी थी, तब मैं बहुत छोटा था तो उतनी समझ नहीं थी लेकिन जब हाल में उसे मैंने दुबारा देखा तो समझ में आया कि वो फिल्म कम बल्कि एक वृद्धाआश्रम ज्यादा थी।

 उस फिल्म में भी नसीर के अलावा अमरीश पुरी, जगदीप, ओमपुरी, डैनी जैसे अपने दौर के मंझे कलाकार थे। लेकिन उस फिल्म में नया कुछ भी नहीं था, क्योंकि हम इन कलाकारों को उसी रूप में देखने के आदि थे। इसी तरह "बेग़म जान" इन बड़े अभिनेताओं की नुमाइश है जो कुछ कर नहीं रहे हैं लेकिन बस कर रहे हैं। हम ये क्यों नहीं समझते कि अच्छी फिल्म अच्छी कहानी पे बनती है न की यूँ अभिनेताओं के जमावड़े से। 

 "बेग़म जान" की कमी सिर्फ उसकी लचर कहानी नहीं है, बल्कि फिल्म ट्रीटमेंट के हिसाब से भी ख़राब है। फिल्म में पहनावे और भाषा पे कोई ध्यान नहीं है। यदि वो होता तो शायद फिल्म को झेल पाना थोड़ा और आसान होता। विद्या अकेले के अलाव निर्देशक को सबको जिम्मेदारी देनी चाहिए थी और खुद भी थोड़ा ईमानदारी से काम करते तो फिल्म अच्छी होती। 

 अब देखना न देखना आपकी मर्जी है। मुझे तो ये ऐसी ही लगी। वैसे अगर आपने "पिंजर" न देखी हो तो एक बार देख जरूर लेना। 

बुधवार, 26 अक्टूबर 2016

कितना कुछ है गोलगप्पों के पास...

 मेरे हिसाब से गोलगप्पों को भारतीय खानपान में सबसे ऊपर रखना चाहिए क्योंकि स्वाद की पूरी की पूरी संस्कृति का समागम है इनमें। आप जहाँ भी जाएं गोलगप्पों का स्वाद उसी देस के रूप रंग में ढल जाता है। तभी तो "क़्वीन" फिल्म में भी जब कंगना रनौत को भारतीय खाने से रूबरू कराने की चुनौती मिलती है तो वो पूरे जी-जान से गोलगप्पे ही बनाती हैं।

 गोलगप्पे इन्हें दिल्ली की भाषा में कहा जाता है, लेकिन भारत में इसे अलग-अलग जगहों पर गुपचुप, पानी के बताशे, पानी की टिकिया और फुचकु जैसे न जाने कितने नामों से जाना जाता है। कुछ लोग इसे खाते हैं तो कुछ इसे पीते हैं।

 वैसे ये होती आटे और सूजी से बनी पूरियां ही, बस इनका मिज़ाज़ थोड़ा कड़क होता है। पूरियां तो नरम पड़ जाती हैं लेकिन ये खट्टा या मीठा पानी भरने के बाद भी करकरी ही बनी रहती हैं। 

हज़रतगंज के अजय भाई
 मेरा ये निजी मत है कि किसी उत्तर भारतीय शहर के स्वाद का अंदाज़ वहां के गोलगप्पों से ही समझ आ जाता है। अभी हाल ही में मैं जब खजुराहो गया तो मैंने सबसे पहले गोलगप्पे ही खाये। वहां इनमें आम स्वाद भी नहीं था तो शहर में क्या ख़ाक अच्छा मिलने वाला था खाने को? हुआ भी यही वहां कुछ भी ऐसा नहीं मिला खाने को जो उस शहर की रंगत का एहसास कराए।

 यूँ तो मैंने कई शहरों के गोलगप्पे खाये हैं लेकिन लखनऊ के हज़रतगंज के गोलगप्पों का जो नवाबी अंदाज़ है वो अपने आप में स्मृति में रह जाने वाला है। सितंबर में मैं जब लखनऊ गया तो मोती महल का स्पेशल समोसा खाने के बाद भी मेरा मन गोलगप्पे में ही अटका था क्योंकि इनका स्वाद पहले भी एक-दो बार ले चुका था। थोड़ा बाजार की तरफ बढ़ा तो साहू सिनेमा के सामने अजय भाई मिल गए, और मेरी गोलगप्पे खाने की तम्मना पूरी हो गयी।

मोती महल का स्पेशल समोसा


 लखनऊ के गोलगप्पों की खास बात उनमें भरा जाने वाला चटपटा पानी है। आम तौर पर दूसरे शहरों में गोलगप्पों के साथ खट्टा और मीठा पानी ही मिलता है लेकिन लखनऊ में आपको इसकी पांच से छह किस्में मिल जाएंगी। इसमें भी खास है इसे खिलाए जाने का क्रम। आप अपनी सुविधा के हिसाब से तीखे से शुरू कर मधुर या मधुर से तीखे स्वाद की तरफ रूबरू हो सकते हैं।

 अब ये ज़ायका इतना इंतिख़ाबीपन तो लिए होगा ही, नवाबों के शौक से जो पला है ये शहर। फिर अवध का क्षेत्र है तो "जी की रही भावना जैसे, प्रभु मूरत देखी वो वैसी"।

 लखनऊ के गोलगप्पों में जब पानी भरा जाता है तो क्रम के हिसाब से मीठा पानी बीच में ही कंही होता है। और ये अजय भाई का नहीं बल्कि सभी खोमचे वालों का तरीका है। इसकी वजह अजय भाई ने बताई नहीं लेकिन मैंने ही अंदाज़ा लगाया। मेरे हिसाब से बीच में मीठा पानी होने की वजह, हर तरह पानी के स्वाद का असल एहसास करना हो सकती है। अब अगर आप तीखे पानी से खाना शुरू करें तो आपकी जीभ की इन्द्रियां बहुत सक्रिय हो जाएँगी ऐसे में आगे जो पानी हैं उनका स्वाद कैसे आएगा ? इसलिए बीच में  मीठे पानी का गोलगप्पा खाने से जीभ को शांति मिलेगी और आगे के दूसरी तरह के पानी का ज़ायका अच्छे से उभरकर आएगा। ऐसे ही अगर दूसरी तरफ से शुरू करते हैं तो भी जीभ को वापस नए टेस्ट के मोड में लाने के लिए ही मीठे पानी का उपयोग होगा।
"गोलगप्पे से मेरे बचपन की भी एक याद जुड़ी है। मेरा ननिहाल मथुरा में है। तब छुट्टियों में नानी के घर जाने का बड़ा कौतूहल होता था। नानी के घर के पास शाम को एक गोलगप्पे वाला आता था। हम सब बच्चे उसे घेर के खड़े हो जाते थे। उसके पानी में एक अलग तरह का तीखापन होता था जो सीधा गले में लगता था। उसके पानी में टाटरी होती थी तो वो गज़ब का खट्टा होता था। पुदीना और हरी मिर्च की चटनी में काली मिर्च का हल्का सा स्वाद उस पानी को इतना अलग बना देता था कि मुझे आज भी याद है। उसके गोलगप्पों के पानी में इस काली मिर्च के प्रयोग से ही मथुरा के खाने का  आप अंदाज़ा लगा सकते हैं। आज भी मथुरा के असल खाने में आपको काली मिर्च का बहुत संतुलित प्रयोग देखने को मिलेगा। 
अच्छा उस गोलगप्पे वाले की एक और खास चीज मुझे याद है। वो उसमें मटर के साथ एक तली कचरी डाला करता था। कचरी का स्वाद हल्का सा  कड़वा होता है जो खट्टे पानी के साथ मिलकर अनोखा प्रभाव छोड़ता है। खैर तब हम छोटे थे तो बहुत ज़िद के बाद कचरी वाला एक गोलगप्पा खाने को मिलता था।"
  अब मथुरा जाता हूँ तो वो गोलगप्पे वाला नहीं मिलता। लेकिन मैं हूँ चाट का शौक़ीन तो वहां की घीया मंडी और मंडी रामदास की चाट का जवाब ही नहीं है।

 मथुरा के नजदीक ही आगरा में अगर आपको गोलगप्पे और चाट का स्वाद लेना है तो बेलन गंज का बाज़ार घूम आइये। दिल खुश हो जायेगा वहां की चाट और गोलगप्पे खाकर।

 मेरे गृहनगर झाँसी में भी गोलगप्पे का एक अलग मिज़ाज़ है। वहां पर उनमें भरे जाने वाले उबले आलू अच्छे से लाल मिर्च के मसाले में लपेटे जाते हैं जिन पर कच्चा प्याज़ लगाकर फिर गोलगप्पे में खट्टा पानी भरकर खाया जाता है।

 इस कहानी का अंत करते हुए एक बात और बताता हूँ। दिल्ली को छोड़कर आप इन जगहों में से कंही भी गोलगप्पे खाइये आपको पानी में मीठी चटनी खुद से नहीं मिलेगी, उसके लिए आपको गोलगप्पे वाले से कहना पड़ेगा। वंही दिल्ली में आपको "गोलगप्पे वाले भैया" से मीठा नहीं लगाने के लिए कहना होगा।

मोती महल हज़रतगंज