गुरुवार, 28 मई 2015

रिटर्न ऑफ पंजाबी गाने

 वैसे मुझे पंजाबी बिल्कुल भी नहीं आती और मैं पंजाबी गानों का उतना बड़ा शौक़ीन भी नहीं इसलिए इस विषय पर लिखने का कायदे से मुझे कोई अधिकार नहीं लेकिन भांगड़े की ताल पर नाचना किसे नहीं पसंद, इसलिए इस विषय पर कुछ लिखने का मन था इसलिए सोचा लिख ही देते हैं।

Daler Mehandi : Source-Internet
  आपको वो दौर याद होगा जब दूल्हे की बारात दलेर मेहंदी के 'हो जाएगी बल्ले बल्ले', 'काला कौवा काट खायेगा' और ' तुनक तुनक तुन' जैसे गानों के बिना आगे ही नहीं बढ़ती थी। हंस राज हंस, गुरदास मान, जसपिंदर नरूला और ऋचा शर्मा उस दौर में पंजाबी गानों के सरताज थे। इनकी आम जनता में लोकप्रियता इतनी थी कि भारतीय फिल्मों में भी पंजाबी गानों को रखने का चलन  बढ़ गया। हंस के 'तोते तोते' और दलेर के "ना ना ना रे' गाने की लोकप्रियता  का अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि उस दौर में बच्चों को डांस क्लास में  इन्हीं गानों पर सबसे पहले थिरकना सिखाया जाता था।

  इसी दौरान स्टीरियो नेशन, जैज़ी बी, सुखबीर, मीका, जसबीर जस्सी और रब्बी शेरगिल ने पारम्परिक पंजाबी गानों के  साथ पश्चिमी वाद्यों का तालमेल कर अपनी अलग पहचान बनाई। उस समय भारत में शादियों  में डीजे का चलन शुरू ही हुआ था और शादियों में डांस फ्लोर पर नाचना नया फैशन बन गया। उस दौर में इन नए उभरते पंजाबी गायकों के गानों पर हर उम्र और पीढ़ी के लोगों ने ठुमके लगाये।

  इन पंजाबी गानों की जो एक बात सबसे खास थी वो यह कि हर गायक का अपना एक अलग अंदाज था लेकिन फिर भी वह देसीपन लिए हुए था। गुरदास मान के गाने खालिस पंजाबी थे और दलेर के गानों में भांगड़ा का मजा था। मीका, सुखबीर और जसबीर के गाने डीजे पार्टियों की शान बन गए थे।

Honey Singh : Source-Internet
  इसके बाद आया हनी सिंह का दौर और वह बेशक इस समय के सबसे तेजी से उभरे सितारे हैं। लेकिन उनके आने के बाद पंजाबी गानों में एक ठहराव सा देखने को मिला या यूँ कहें पंजाबी गाने कंही खो से गए। उनका पहले  एलबम 'इंटरनेशनल विलेजर' पंजाब के कई नए चेहरे थे और उसमें कुछ गाने भी थे जो पंजाबीपन से भरपूर थे।

  उसके बाद दिलजीत, बिलाल, दिलबाग, मिलिंद गाबा, गिप्पी ग्रेवाल, बादशाह,  रॉल और लिटिल छोटू  जैसे कई सितारे आये जो इस दौर में पंजाबी गाने गा रहे हैं लेकिन इनमें  सभी में एक बात जो खलती है वह है कि गायकों की अपनी कोई शैली नहीं है और गानों में जो वैरायटी होती थी वो ख़त्म हो गयी है। अब हर गाने में रैप ने एक जगह बना ली है जिनमें दो चार बातों को ही अलग अलग तरह से घुमा फिराकर कहा जाता है और उनके विषय भी तीन चार चीजों के आस पास ही घूमते हैं।

Jassi Gill : Source-Internet
  लेकिन हाल ही में आया जस्सी गिल का ' रिटर्न ऑफ मेलोडी' एलबम कुछ नयी उम्मीद जगाता है। इसमें फिर से वही पंजाब का खालिस देसीपन है। इसके गाने इन दिनों चार्टबस्टर्स में छाये हुए हैं। तो क्या यह हनी सिंह के दौर के अंत होने का इशारा करता है या लोगों का उनके अंदाज से ऊब जाने का। खैर अभी इस बात पर टिप्पणी करना जल्दबाजी होगी, तब तक आनंद लीजिये फिर छायी इस देसी बहार का। यही तो है रिटर्न  ऑफ पंजाबी गाने। 

रविवार, 10 मई 2015

इम्पोर्टेड देसी सुपरहीरो, इस पर भी गौर फरमाएं

 जी हाँ सवाल तो यही है कि क्या हमने गौर भी किया या नहीं? खैर जिन लोगों ने "एवेंजर्स : ऐज ऑफ़ अल्ट्रॉन" हिंदी में देखी होगी उन्हें शायद यह बात समझ आई होगी कि मैं किस बात की ओर इशारा करना चाहता हूँ।

Avengers : Age Of Ultron (Poster)
 बात है इस फिल्म के हिंदी संस्करण में प्रयोग किये गए "हरियाणवी संवादों" की । अभी तक हमने अनुवादित फिल्मों में  ऐसा प्रयोग सिर्फ दक्षिण भारत की फिल्मों के हिंदी रूपांतरण में ही देखा होगा, जहाँ खलनायक का चरित्र या तो भोजपुरी बोलता है या हरियाणवी। (खैर यह भी अपने आप में एक नस्लभेद ही है जहाँ क्षेत्रीय बोली बोलने वाले को खलनायक की तरह ही प्रस्तुत किया जाता है। )

 लेकिन "एवेंजर्स : ऐज ऑफ़ अल्ट्रॉन" जैसी हॉलीवुड फिल्म में यह प्रयोग चौंकाने वाला है। "एवेंजर्स : ऐज ऑफ़ अल्ट्रॉन"  हॉलीवुड की कोई चलताऊ फिल्म नहीं है बल्कि बजट और स्टारकास्ट के लिहाज से यह बहुत बड़ी फिल्म है। इस फिल्म का बजट अनुमानित तौर पर 280 मिलियन डॉलर के आस पास है। और जब इतनी बड़ी रकम को दांव पर लगाकर कोई बाजार में दस्तक देता है तो वह स्थापित नियमों से खेलने की हिम्मत नहीं जुटा पाता।

अब तक हॉलीवुड की जितनी भी फिल्मे हिंदी में रूपांतरित होकर आयीं हैं, उनमें बेहद संतुलित हिंदी में अनुवाद किया जाता है और क्षेत्रीय बोलियों को फिल्मों के अनुवाद से दूर ही रखा जाता है। लेकिन इतनी बड़ी फिल्म ने इसके अनुवाद में  हरियाणवी जैसी बोली को दो प्रमुख पात्रों की आवाज दी है जिनमें से एक शायद अगली फिल्म में भी दिखाई दे। इस हिम्मत को जुटाने के लिए वे निश्चित रूप से बधाई के पात्र हैं। ( हो सकता है बिहार और पूर्वांचली क्षेत्रों में इन दोनों किरदारों ने भोजपुरी बोली हो, दिल्ली में तो यह हरियाणवी में ही बात करते हैं। )

हरियाणवी भाई और बहना
  आप कल्पना भर करके देखिये कि "एवेंजर्स : ऐज ऑफ़ अल्ट्रॉन" का यह प्रयोग सफल नहीं होता, तो उसे कितना नुकसान उठाना पड़ता, क्योंकि भारत आज के समय में हर इम्पोर्टेड आइटम के लिए एक प्रमुख बाजार है। हमारी क्रय शक्ति बढ़ रही है जिससे हमारा उपभोग भी बढ़ रहा है। इसलिए यदि यह प्रयोग असफल होता तो एवेंजर्स के निर्माताओं को भारी नुकसान  उठाना पड़ता। खैर अभी तक विश्वभर में यह फिल्म लगभग 800 मिलियन डॉलर का कारोबार कर चुकी है।

 हॉलीवुड की फिल्मों में यह बदलाव इंगित करता है कि उसके लिए हिंदी का बाजार कितना मायने रखता है। गैर मातृभाषी फिल्म होने के बावजूद फिल्म को हिंदी पट्टी के लोगों से जोड़ने का प्रयास किया गया है।
 अब हम उम्मीद कर सकते हैं कि देसी स्पाइडर मैन हमें यहाँ भारत में नहीं बनाना पड़ेगा बल्कि सीधा हॉलीवुड से ही बनकर आएगा। अब भई क्या इम्पोर्टेड फिल्में सिर्फ अंग्रेजी में ही देखी जाएंगी क्या ? बाजार का नियम तो साफ़ है पैसा दो सामान लो। 

बुधवार, 8 अप्रैल 2015

क्या चाहते हैं ब्योमकेश से ?

हाल में आई डिटेक्टिव ब्योमकेश बख्शी  को लेकर कई  बड़े फिल्म समीक्षकों ने कोई खास अच्छी समीक्षा नहीं दी। सभी ने फिल्म को बहुत से पहलुओं पर नकार दिया, लेकिन मैंने फिल्म देखी है।

 फिल्म शुरुआत से ही रोचकता पैदा करती चलती है।  एक हत्या और उसके हत्यारे की तलाश यही फिल्म का सार है,  जो आम जासूसी फिल्मों का मुख्य पहलू होता है। फिर उस हत्यारे की तलाश के दौरान होती अन्य हत्याएं, सबूतों का बनना बिगड़ना फिल्म को आगे बढ़ाते हैं, और इसमें भी यही चलता है।

 शरदिंदु बंधोपाध्याय के चरित्र ब्योमकेश बख्शी (सुशांत सिंह राजपूत) को फिल्म में निर्देशक दिबाकर बनर्जी ने शुरुआत से बुना है। वह कॉलेज से निकला है, प्यार में असफल हुआ है और नौकरी की तलाश में है। उसी के कॉलेज का साथी अजीत बंधोपाध्याय (आनंद तिवारी) उसे अपने गायब पिता की तलाश करने को बोलता है और वो जुट जाता है काम में। फिल्म में ब्योमकेश अपना पहला केस सुलझा रहा है, तो गलती होना लाजिमी है और दिबाकर ने उससे वो गलती भी करवाई है।

 फिल्म शुरू होने के कुछ समय बाद ही बख्शी को अजित के पिता की लाश मिल जाती है। लेकिन असली सवाल है कि आखिर उनकी हत्या क्यों हुई ? बस इसी गुत्थी को सुलझाने में कहानी आगे बढ़ती जाती है।
 फिल्म में 1940 के दौर का बंगाल है।  द्वितीय विश्वयुद्ध शुरू हो चुका है और जापानी सेना कलकत्ता पर आक्रमण करने के लिए आगे बढ़ रही है और इसके लिए उसे कुछ कालाबाजारियों का सहयोग चाहिए। बाकी एक जासूसी फिल्म की कहानी इससे ज्यादा बताना घातक होगा।

 फिल्म में उस समय के कलकत्ता को दिबाकर ने शानदार तरीके से पेश किया है। बैकग्राउंड स्कोर फिल्म की जान है और फिल्म की गति एक समान है। हालांकि यह थोड़ी धीमी है लेकिन फिल्म को समझने के लिए सही है।  आजकल भोजपुरी का इस्तेमाल हिंदी फिल्मों का एक अंग बनता जा रहा है, और इसमें इसे बखूबी इस्तेमाल किया गया है। फिल्म का लाइट इफ़ेक्ट प्रभाव पैदा करता है।

 सुशांत ने अच्छा अभिनय किया है, लेकिन वो और अच्छा कर सकते थे। फिल्म में अंगूरी देवी का किरदार निभाने वाली स्वस्तिका मुखर्जी ने अभिनय की छाप छोड़ी है। फिल्म में सहयोगी कलाकारों ने अच्छा अभिनय किया है। फिल्म में खलनायक का किरदार निभाने वाले नीरज काबी बहुत प्रभावित करते हैं।
 दिबाकर इसे एक ब्रांड के तौर पर स्थापित करने में सफल रहे हैं।  इसकी अगली कड़ी बनने की पूरी सम्भावना है।

 एक जासूसी फिल्म से अपेक्षा होती है कि वो आपको सीट से हिलने का मौका भी न दे और डिटेक्टिव ब्योमकेश बक्शी इस काम में पूरी तरह सफल है। फिर अब और क्या चाहते हैं आप ब्योमकेश से ?