गुरुवार, 7 जुलाई 2016

अच्छा हुआ कपिल कलर्स छोड़ आए

वडाली बंधु कपिल के शो में
 च्छा ही हुआ कि कपिल शर्मा ने कलर्स चैनल छोड़ दिया। इसी वजह से कम से कम वो टाइप्ड होते-होते बच गए। कलर्स पर जब उनका शो आ रहा था तो उसमें विविधता (वैरिएशन) की बहुत कमी थी। उनकी हाज़िर जवाबी भी भद्दे मजाक में तब्दील हो रही थी, लेकिन वो जब से सोनी पर अपने शो का नया रूप लेकर आये हैं ये एकदम बदला-बदला सा है।

 उनके नए शो में कलाकारों की प्रस्तुति, उसके अतिथियों में, उसकी भाषा में और विषयवस्तु अभी में बहुत बदलाव आया है जो उन्हें फिर से नकलची होने से बचाता है और ये बताता है कि असल की ताकत बहुत बड़ी है। 

 खैर यहाँ बात उनके हाल में आए वडाली बंधु वाले एपिसोड की करते हैं। आम तौर मेरे जैसे संगीत प्रेमियों का वडाली बंधुओं से परिचय उनके गीतों से ही है। उनका 'तू माने या न माने दिलदारा' गाना मुझे कॉलेज के समय से पसंद है और नयी पीढ़ी के लखविंदर वडाली का 'चरखा' अभी कुछ समय पहले ही मन में बसा है। उनका गायक के अलावा एक आम इंसान के रूप में परिचय कपिल के सोनी पर आने के बाद ही हो पाया। उन्हें किस्सागोई करते, डांस करते देखना कितना नया है? मात्र चाय न पिलाने के कितने किस्से, सब स्मृति में समाने लायक।

 सोनी पर आने के बाद कपिल का शो बॉलीवुड के परकोटे से बाहर आया है। उनके शो में अब बॉलीवुड फिल्मों के पब्लिक रिलेशन और प्रचार मंच से आगे बढ़ने की कसक दिख रही है। मराठी फिल्म 'सैराट' के कलाकारों को हिंदी के दर्शकों से रूबरू कराना अपने आप में बताता है कि कपिल की सोच में बदलाव आया है। मैं यह बात इसलिए भी लिख रहा हूँ क्योंकि कपिल इस शो के सह-निर्माता भी हैं।

 सानिया मिर्जा और ड्वेन ब्रावो की बॉलीवुड सितारों के साथ जोड़ी बनाकर किया गया उनका प्रयोग स्पष्ट करता है कि वो असल करने में विश्वास करते हैं,नक़ल में नहीं। अब यूँ तो हम नवजोत सिंह सिद्धू को कई बरसों से हँसते देख रहे हैं लेकिन उनका परिवार कैसा है इसके बारे में हमें कपिल के शो ने ही बताया।

 देखा जाए तो कपिल का शो अब ज्यादा मानवीय स्वरूप लिए हुए है। इससे पहले टीवी पर आए फारुख शेख के 'जीना इसी का नाम है' और ऋचा अनिरुद्ध के 'ज़िंदगी लाइव' जैसे टॉक शो ही मुझे याद हैं जिनके मूल में मानवीय संवेदनाएं हैं। 'जीना इसी का नाम है' में फिल्म, राजनीति, कारोबार, प्रशासन और खेल जगत से जुड़ी कई हस्तियां शामिल रही तो वहीं 'ज़िंदगी लाइव' में ये संवेदनाएं आम लोगों के जीवन संघर्ष से जुड़ गईं।  

 हालाँकि मेरा प्रयास यहाँ किसी भी प्रकार से इन सभी शो की तुलना करना नहीं है क्योंकि कपिल का शो अच्छा है लेकिन अभी भी इन दोनों शो के स्तर का नहीं है। चूँकि कपिल के शो में हास्य प्रधान है तो उसमें संवेदनाएं भी हल्के-फुल्के अंदाज वाली हैं, अब आप चाहें तो गोविंदा या राहत फ़तेह अली खान के शो को ही देख लें। 

 टीवी के लिए शेखर सुमन, सिमी ग्रेवाल, करण जौहर, रजत शर्मा और अनुपम खेर ने भी टॉक शो बनाए, लेकिन इनमें से अधिकतर या तो चकाचौंध भरे या उपदेशात्मक रहे। सितारों के जीवन की मानवीय संवेदनाएं इन शो में उतने अच्छे से उजागर ही नहीं हुई। इस जमात में आमिर खान का 'सत्यमेव जयते' और अमिताभ बच्चन का 'आज की रात है जिंदगी' भी शामिल किये जा सकते हैं लेकिन ये मूलतः टॉक शो नहीं थे।

 वडाली बंधुओं वाला एपिसोड न सिर्फ कपिल को टाइप्ड होने से बचाता है बल्कि हमारा परिचय उस किस्सागोई से भी कराता है जो स्मार्टफोन की तकनीक और समाज से खत्म होते हास्य बोध से हमारे जूझने के बीच खत्म हो रही है। ये हमें वापस व्यक्तिवाद से सामाजिक बनने को प्रेरित करता है और हमारे जीवन के हर पहलू में घुस चुकी राजनीति से हमे थोड़ी देर के लिए दूर ले जाता है।

 ज़रा सोचिये कि सिर्फ चाय न पिलाने जैसी बात पर कितनी बातें और कितने ठहाके इस शो में लगे। ये 'तारक मेहता का उल्टा चश्मा' के अंत में दावा किये जाने वाले ठहाकों से तो बेहतर ही है। छोटे शहरों में जब लाइट चली जाती थी तो लोग छत की मुंडेर पर बैठकर ऐसी ही किस्सागोई किया करते थे। खैर सरकार अब गांवों में भी 24 घंटे बिजली देने में लगी है तो पता नहीं भविष्य में भी ये वहां बचेगी या नहीं क्योंकि सार्वजानिक यात्रा का सामाजिक संवाद तो वैसे ही कान में ठुंसे हेडफोन खा गए। कितना विचित्र है कि हर सुविधा भी हमारे लिए नामाकूल ही है।

 कपिल के शो की अंतिम बात जो मुझे पसंद है वो यह कि उसकी भाषा बिल्कुल सहज और जमीन से जुड़ी है। उसमें वही देसीपन है जो हमारे आपके बीच संवाद में होता है। वो बेड़ियों में वैसे नहीं बंधी है, जैसे कि "भाभी जी घर पर हैं' की भाषा में जकड़न है। कपिल में एक और जो बदलाव इस शो में दिख रहा है वो यह कि अब उनके ऊपर उनकी 'श्रेष्ठता' का अहम हावी नहीं है तभी तो वो सुनील ग्रोवर को पूरा मौका देते हैं और सुनील ग्रोवर जो कर रहे हैं उसकी चर्चा फिर कभी...
सुनील और कपिल

बुधवार, 22 जून 2016

आम की गुठली

 बचपन में मुझे गर्मी का बेसब्री से इंतज़ार रहता था। इसकी वजह भी साफ थी। गर्मियों की छुट्टी मिला करती थी तो नानी के घर जाया करते थे। मेरा जन्मदिन भी इसी मौसम में पड़ता है तो वो आमतौर पर नानी के घर पर ही मना करता।  उस दिन नानाजी मेरे लिए छोले जरूर बनाते क्योंकि मुझे उनके हाथ के बने छोले बड़े पसंद थे। लेकिन घर के बाकी लोगों को उनके हाथ का आमरस।
स्रोत-मेरी रसोई से...


 नानी के घर पर गर्मियों में रोजाना दूध की रबड़ी वाला आमरस बनता था जो मुझे तब पसंद नहीं था लेकिन माँ थोड़ा बहुत डांट-डपट के खिला ही देती। लेकिन जन्मदिन के दिन मैं राजा, बाकी सब प्रजा। उस दिन मेरे लिए रबड़ी अलग होती और आम अलग से काट के मुझे दिया जाता।

 मुझे आम बहुत पसंद है। गर्मियों में पहली बार मुझे आम हमेशा नानाजी के घर पहुंचने के बाद ही मिलता था, क्योंकि घर पर मुझे तब तक आम खाने को नहीं मिलते जब तक बारिश नहीं हो जाती। इसके लिए माँ-पापा दोनों से सख्त हिदायत मिली हुई थी लेकिन नानी के घर आपको बारिश हो या न हो टोकने वाला कौन था? वैसे घर पर आम खाने की मनाही इसलिए थी क्योंकि मुझे शरीर पर दाने या फुंसियां निकल आती थी। अब ये बात और है कि मुझे आज तक आम और शरीर के दानों के बीच का कनेक्शन पता नहीं चला। मैंने जानने की कोशिश भी नहीं की क्योंकि इससे यादें मिट जाने का डर लगा रहता है। 

 मैं आम का बहुत बड़ा लालची हूँ। तभी पिछले साल जब ऑफिस की एक साथी ने मुझे दोस्तों के साथ बाँटने के लिए अपने घर के आम दिए तो मैंने घर पहुँच के सबसे बढ़िया दो आम सबसे पहले अकेले ही खा लिए बाद में दोस्तों को बताया कि उनके लिए आम आएं हैं।
साभार - गूगल इमेजेस

 बचपन में भी घर पर मुझे जब तक आम खाने की मनाही होती थी तब तक मैंगो शेक मिला करता था। मैंगो शेक के लिए आम काटने के बाद हमेशा आम की गुठली बच जाती थी। मुझे आम पसंद था लेकिन आम की गुठली कतई नहीं। मैं गुठली हमेशा मैं छोटे भाई को सरका देता था और खुद छिलकों में लगे हुए आम से संतोष कर लेता।

 कई बार मुझे जब मैंगो शेक के लिए आम छीलने को कहा जाता तो मैं जानबूझकर छिलका मोटा छीलता क्योंकि बाद में वो छिलके तो मुझे मिलने थे। इसी बहाने बारिश से पहले घर में आम खाने को भी मिल जाते। खैर इस बात के लिए कई बार माँ की झिड़की भी लग जाती कि ठीक से छीलना है तो छीलो नहीं तो रसोई से नौ दो ग्यारह हो जाओ। फिर बचती आम की गुठली और वो भी मैं भाई को दे देता।

 इस साल करीब पांच-छह साल बाद ऐसा हुआ कि मैं और छोटा भाई गर्मियों के मौसम में एक साथ हैं। इसलिए आज जब मैं आमरस बना रहा था तो छिलका मैंने मोटा छीला और भाई ने मुझे पकड़ लिया। फिर वही बचपन वाली धमकी कि माँ से शिकायत करें। लेकिन अब वो डर नहीं कि माँ डांटेगी क्योंकि फ़ोन पर उसने डांटना बंद कर दिया है। फिर आज उसके बाद भाई को आम की गुठली खाने के लिए बचपन वाले जाल में फंसाना और मेरा छिलकों में लगे आम को अंजाम देना।

 लेकिन अब भाई सयाना हो गया तो आम की गुठली के जाल में फंसता नहीं और आजकल आम में भी इतना गूदा या रस कहाँ कि उसे छिलकों या आम की गुठली से चुराया जाये।

सोमवार, 20 जून 2016

राजाराम के साथ चाय पर चर्चा

स्रोत - गूगल इमेजेस

 अरे नहीं-नहीं, मैं स्वर्ग में भगवान राम से भेंट करके नहीं लौटा हूँ। वैसे भी मैं उधर जा ही नहीं सकता क्योंकि उसका लाइसेंस तो "भक्तों" के पास है। मैं तो हाल में ग्वालियर की यात्रा पर गया था तो वहां रास्ते में मेरी चप्पल टूट गयी। मैं उसे सुधरवाने जिस "चप्पलों के डॉक्टर" के पास गया था, बस उनका नाम राजाराम है।

 अब वहां बाजार में वो अकेले थे और काम का ढेर भरा, बस फिर क्या था हमने पकड़े चाय के तीन गिलास और उनमें से एक थमा दिया राजाराम जी को और वंही टेक लगा के बैठ गए, तो बस यह ब्यौरा है उनके साथ हुई चाय पर चर्चा का...

"अरे साब इस चाय की क्या जरुरत थी, आप क्यों ले आये, पहले बोला होता तो हम ही मंगा देते।"
"अरे नहीं चाचा, मेरा मन था पीने का तो ले आये, आप बस चाय पियो और अच्छे से सिलाई करना।"
"आप निश्चिन्त रहें, एकदम मजबूत काम करके देंगे, 25 साल से यही काम तो कर रहे हैं।"
"अरे फिर तो आपका तजुर्बा मेरी उम्र से ज्यादा है, तो चाचा आप यंही ग्वालियर के हैं या बाहर से आकर बसे।"
"नहीं साहब, मैं तो यंही का हूँ, बस बाहर कुछ दिन काम करने गया था लेकिन मन नहीं लगा सो वापस यंही आ गया।"

 अब तक राजाराम जी अपनी चाय खत्म करने के करीब पहुंचे थे कि तभी दो और ग्राहक अपनी चप्पल उन्हें दे गए। उन्हें बहुत अर्जेंट चाहिए थी तो चाचा ने तसल्ली भरी निगाहों से मेरी तरफ देखा, मैं तो आया ही समय काटने था तो मैंने भी सहमति दी कि चाचा निपटा लीजिए। चाचा ने चप्पल में कील ठोकी और ग्राहकों से पैसे लेकर उन्हें चलता किया। तब तक मैं भी फ़ोन पर किसी से बात निपटा रहा था फिर जब मैं निपट चुका तो देखा चाचा के हाथ में सफ़ेद धागा था जिसे वो मोम से रगड़ रहे थे।

"अरे निपट गए।"
"हाँ दो कील ही ठोकना था, अब आपका काम ही निपटाएंगे।"
"चलो ठीक है। अच्छा एक बात बताओ कि मैं यहाँ से किला (ग्वालियर का) जाना चाहता हूँ तो कैसे जाऊं।"
"किले के लिए तो सबसे नजदीक उरवाई गए पड़ेगा, यंही से टम्पू मिल जायेगा तो उस से चले जाना।"
"और चाचा यहाँ चौहान साब कैसा काम कर रहे।"
"साब काम तो सबई करते हैं लेकिन अपने को फायदा हो तब कछु समझें।"
"मतलब"
"अरे साब देखो अपन को काम से का लेना देना, अपन को तो रोटी सस्ती चाहिए बस।"
"लेकिन चाचा अब तो सब बढ़िया है, ऐसा ही सुना है।"
"सब सुना ही है ना, हो रहा हो तो बताओ। अब आप तो दिल्ली से आये हैं आप ही बताओ कि वहां वो केजरीवाल कौनो काम कर रहा।"
"अरे चाचा उसे काम करने कहाँ दे रहे लोग।"
"साब ये तो कोरी कोरी बात है। असल बात बताओ।"
"असल में तो मैं बता ही नहीं सकता क्योंकि मेरा वास्ता उससे या उसके काम से पड़ा नहीं।"
"ऐसा ही यहाँ है साब चौहान साब के काम से हमारा वास्ता पड़ा ही नहीं।"

 इसके बाद मेरे पास कोई जवाब नहीं था और न ही बहस बढ़ाने की कोई वजह क्योंकि चाचा ने मुझे एक ही पंक्ति में चुप करा दिया था। फिर मैंने सोचा कि क्यों न मोदी जी (नरेंद्र) का जिक्र छेड़ा जाये, शायद चाचा उनके बारे में कुछ कहें।

"अच्छा चाचा एक बात बताओ ये मोदी जी कछु करेंगे या नहीं।"
"देखो भाईसाब उनने काम तो बहुत सारे करने की कही थी, लेकिन अभी तो मन की बात ही सुनी है।"
"ये तो मजाक वाली बात हो गयी, असल में आपको क्या लगता है, मोदी जी करेंगे कुछ।"
"अरे साब हम भी अख़बार सुनते हैं, टीवी देखते हैं। आपई बताओ गरीब की सुनै है कौनो।"
"वो तो ठीक है चाचा लेकिन मोदी जी तो बहुत काम करते हैं।"
"देखो साब हम बैठते पटरी पर, और दिन के चार आने कम लेते कि बस रोटी कहकर डरे रहें। अब कौनो सरकार आये, मोदी आये या केजरीवाल आये हमाये लाने सब वैसा का वैसा ही है।"

 इसके बाद चाचा से दो चार बातें और हुई। तब तक मेरी चप्पल भी सिल गयी। उनके साथ इस चाय पर चर्चा का कोई निष्कर्ष तो नहीं निकला लेकिन फिर मेरे दिमाग में एक बात जरूर रह गयी।

 चुनाव, नेता, पार्टी और उनके वादों को लेकर ये गरीब जनता जब इतनी निश्चिन्त है तो वो वोट किस आधार पर देती है और क्यों देती है ? जब वो जानते हैं कि सरकार और पार्टियां कुछ नहीं करेंगी तो वो सरकार में उठापटक क्यों कर देते हैं ? क्यों वो हमेशा इस आस में रहते हैं कि उन्हें कुछ मिलेगा ? क्या यही हमारा संविधान उन्हें अब तक दे पाया है...एक अनोखी सी तसल्ली जिसमें बेचैनी तो है लेकिन छटपटाहट नहीं और उसे दूर करने का जुझारूपन भी नहीं। मैं अभी इन प्रश्नों के जवाब तलाश रहा हूँ, अगर आपको किसी भी एक प्रश्न का जवाब मिले तो बताना...