रविवार, 7 जून 2015

मासभर का ये ब्लॉग

समय के साथ गुजरते दिन

 हाँ ब्लॉग की दुनिया में मुझे यूँ तो लगभग पांच साल हो गए हैं लेकिन इस ब्लॉग की उम्र अभी भी एक मास ही हुई है। इस दौरान मैं कई अनुभवों से गुजरा, कुछ को यहाँ दर्ज कर पाया तो कुछ सिर्फ जेहन में ही रह गए। हाँ लेकिन जीवन का हिस्सा बन चुके इस ब्लॉग पर जब भी समय मिलता है मैं चला आता हूँ।

 पहले इस ब्लॉग का नाम मैंने "बस ऐसे ही.… " रखा था,  फिर थोड़े समय बाद बदलकर इसका नाम  "अपने देस में" में भी रखा लेकिन ये नाम इस ब्लॉग के अधूरेपन को पूरा नहीं कर पा रहे थे, क्योंकि एक आम इंसान के तौर पर आप दायरे में नहीं बंधे होते बस आपकी कुछ सीमाएं होती हैं। आप किसी एक विषय पर बात करने के दायरे में नहीं बंधे होते बल्कि हर विषय पर बात करने आपकी कुछ सीमा होती है।

 जब मैंने इसका नाम "नुक्कड़ की चाय" रखा तो लगा कि यह नाम के सूनेपन को ख़त्म करता है, क्योंकि आपके नुक्कड़ पर जो चाय की दुकान होती है उसके यहाँ आपको बहुत से लोग मिलते हैं और उन लोगों के साथ कई कहानियां, खेल-फिल्म-राजनीति-सामाजिक पहलुओं के कई विषय आपसे बस यूँही मिलने चले आते हैं। आपके जीवन से जुड़ी लगभग हर तरह की बात को वहां कई सारे चरित्र चरितार्थ करते हैं। आपके अनुभव सिर्फ आपके नहीं हैं यह भी आपको वहीं पता चलता है।

 उस नुक्कड़ वाले की चाय के साथ जब आप अपने मित्रों, चचेरे-ममेरे-भाइयों, हमउम्र चाचा-मामा और ऑफिस के साथियों के साथ आप गपशप शुरू करते हैं तो किस्से बुने जाते हैं, बचपन की यादें संजोयी जाती हैं, ऑफिस की फ्रस्टेशन बाहर निकाली जाती है और भी ना जाने ऐसे कितने वाकये कह सुनाये जाते हैं जो बस यादों में रहते हैं या आपका  अनुभव भर होते हैं।

दिनों में बीतते मास-साल
 आज इस पोस्ट के साथ ब्लॉग पर मेरी कुल जमा 31 पोस्ट होंगी लेकिन समय पांच साल गुजरा है। समय के साथ उम्र बढ़ी और सोच-भावनाओं में बदलाव, राजनीतिक चिंतनों इत्यादि में परिवर्तन इन सभी पोस्ट में दिखता है। इसलिए आज जब पोस्ट के लिहाज से यह ब्लॉग एक मास पूरा कर रहा है तो बस यही चाहत है कि मेरे घर के नुक्कड़ के पास हमेशा चाय खतकती रहे ताकि जीवन से जुड़ी बातें साझा होती रहें।

गुरुवार, 28 मई 2015

रिटर्न ऑफ पंजाबी गाने

 वैसे मुझे पंजाबी बिल्कुल भी नहीं आती और मैं पंजाबी गानों का उतना बड़ा शौक़ीन भी नहीं इसलिए इस विषय पर लिखने का कायदे से मुझे कोई अधिकार नहीं लेकिन भांगड़े की ताल पर नाचना किसे नहीं पसंद, इसलिए इस विषय पर कुछ लिखने का मन था इसलिए सोचा लिख ही देते हैं।

Daler Mehandi : Source-Internet
  आपको वो दौर याद होगा जब दूल्हे की बारात दलेर मेहंदी के 'हो जाएगी बल्ले बल्ले', 'काला कौवा काट खायेगा' और ' तुनक तुनक तुन' जैसे गानों के बिना आगे ही नहीं बढ़ती थी। हंस राज हंस, गुरदास मान, जसपिंदर नरूला और ऋचा शर्मा उस दौर में पंजाबी गानों के सरताज थे। इनकी आम जनता में लोकप्रियता इतनी थी कि भारतीय फिल्मों में भी पंजाबी गानों को रखने का चलन  बढ़ गया। हंस के 'तोते तोते' और दलेर के "ना ना ना रे' गाने की लोकप्रियता  का अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि उस दौर में बच्चों को डांस क्लास में  इन्हीं गानों पर सबसे पहले थिरकना सिखाया जाता था।

  इसी दौरान स्टीरियो नेशन, जैज़ी बी, सुखबीर, मीका, जसबीर जस्सी और रब्बी शेरगिल ने पारम्परिक पंजाबी गानों के  साथ पश्चिमी वाद्यों का तालमेल कर अपनी अलग पहचान बनाई। उस समय भारत में शादियों  में डीजे का चलन शुरू ही हुआ था और शादियों में डांस फ्लोर पर नाचना नया फैशन बन गया। उस दौर में इन नए उभरते पंजाबी गायकों के गानों पर हर उम्र और पीढ़ी के लोगों ने ठुमके लगाये।

  इन पंजाबी गानों की जो एक बात सबसे खास थी वो यह कि हर गायक का अपना एक अलग अंदाज था लेकिन फिर भी वह देसीपन लिए हुए था। गुरदास मान के गाने खालिस पंजाबी थे और दलेर के गानों में भांगड़ा का मजा था। मीका, सुखबीर और जसबीर के गाने डीजे पार्टियों की शान बन गए थे।

Honey Singh : Source-Internet
  इसके बाद आया हनी सिंह का दौर और वह बेशक इस समय के सबसे तेजी से उभरे सितारे हैं। लेकिन उनके आने के बाद पंजाबी गानों में एक ठहराव सा देखने को मिला या यूँ कहें पंजाबी गाने कंही खो से गए। उनका पहले  एलबम 'इंटरनेशनल विलेजर' पंजाब के कई नए चेहरे थे और उसमें कुछ गाने भी थे जो पंजाबीपन से भरपूर थे।

  उसके बाद दिलजीत, बिलाल, दिलबाग, मिलिंद गाबा, गिप्पी ग्रेवाल, बादशाह,  रॉल और लिटिल छोटू  जैसे कई सितारे आये जो इस दौर में पंजाबी गाने गा रहे हैं लेकिन इनमें  सभी में एक बात जो खलती है वह है कि गायकों की अपनी कोई शैली नहीं है और गानों में जो वैरायटी होती थी वो ख़त्म हो गयी है। अब हर गाने में रैप ने एक जगह बना ली है जिनमें दो चार बातों को ही अलग अलग तरह से घुमा फिराकर कहा जाता है और उनके विषय भी तीन चार चीजों के आस पास ही घूमते हैं।

Jassi Gill : Source-Internet
  लेकिन हाल ही में आया जस्सी गिल का ' रिटर्न ऑफ मेलोडी' एलबम कुछ नयी उम्मीद जगाता है। इसमें फिर से वही पंजाब का खालिस देसीपन है। इसके गाने इन दिनों चार्टबस्टर्स में छाये हुए हैं। तो क्या यह हनी सिंह के दौर के अंत होने का इशारा करता है या लोगों का उनके अंदाज से ऊब जाने का। खैर अभी इस बात पर टिप्पणी करना जल्दबाजी होगी, तब तक आनंद लीजिये फिर छायी इस देसी बहार का। यही तो है रिटर्न  ऑफ पंजाबी गाने। 

रविवार, 10 मई 2015

इम्पोर्टेड देसी सुपरहीरो, इस पर भी गौर फरमाएं

 जी हाँ सवाल तो यही है कि क्या हमने गौर भी किया या नहीं? खैर जिन लोगों ने "एवेंजर्स : ऐज ऑफ़ अल्ट्रॉन" हिंदी में देखी होगी उन्हें शायद यह बात समझ आई होगी कि मैं किस बात की ओर इशारा करना चाहता हूँ।

Avengers : Age Of Ultron (Poster)
 बात है इस फिल्म के हिंदी संस्करण में प्रयोग किये गए "हरियाणवी संवादों" की । अभी तक हमने अनुवादित फिल्मों में  ऐसा प्रयोग सिर्फ दक्षिण भारत की फिल्मों के हिंदी रूपांतरण में ही देखा होगा, जहाँ खलनायक का चरित्र या तो भोजपुरी बोलता है या हरियाणवी। (खैर यह भी अपने आप में एक नस्लभेद ही है जहाँ क्षेत्रीय बोली बोलने वाले को खलनायक की तरह ही प्रस्तुत किया जाता है। )

 लेकिन "एवेंजर्स : ऐज ऑफ़ अल्ट्रॉन" जैसी हॉलीवुड फिल्म में यह प्रयोग चौंकाने वाला है। "एवेंजर्स : ऐज ऑफ़ अल्ट्रॉन"  हॉलीवुड की कोई चलताऊ फिल्म नहीं है बल्कि बजट और स्टारकास्ट के लिहाज से यह बहुत बड़ी फिल्म है। इस फिल्म का बजट अनुमानित तौर पर 280 मिलियन डॉलर के आस पास है। और जब इतनी बड़ी रकम को दांव पर लगाकर कोई बाजार में दस्तक देता है तो वह स्थापित नियमों से खेलने की हिम्मत नहीं जुटा पाता।

अब तक हॉलीवुड की जितनी भी फिल्मे हिंदी में रूपांतरित होकर आयीं हैं, उनमें बेहद संतुलित हिंदी में अनुवाद किया जाता है और क्षेत्रीय बोलियों को फिल्मों के अनुवाद से दूर ही रखा जाता है। लेकिन इतनी बड़ी फिल्म ने इसके अनुवाद में  हरियाणवी जैसी बोली को दो प्रमुख पात्रों की आवाज दी है जिनमें से एक शायद अगली फिल्म में भी दिखाई दे। इस हिम्मत को जुटाने के लिए वे निश्चित रूप से बधाई के पात्र हैं। ( हो सकता है बिहार और पूर्वांचली क्षेत्रों में इन दोनों किरदारों ने भोजपुरी बोली हो, दिल्ली में तो यह हरियाणवी में ही बात करते हैं। )

हरियाणवी भाई और बहना
  आप कल्पना भर करके देखिये कि "एवेंजर्स : ऐज ऑफ़ अल्ट्रॉन" का यह प्रयोग सफल नहीं होता, तो उसे कितना नुकसान उठाना पड़ता, क्योंकि भारत आज के समय में हर इम्पोर्टेड आइटम के लिए एक प्रमुख बाजार है। हमारी क्रय शक्ति बढ़ रही है जिससे हमारा उपभोग भी बढ़ रहा है। इसलिए यदि यह प्रयोग असफल होता तो एवेंजर्स के निर्माताओं को भारी नुकसान  उठाना पड़ता। खैर अभी तक विश्वभर में यह फिल्म लगभग 800 मिलियन डॉलर का कारोबार कर चुकी है।

 हॉलीवुड की फिल्मों में यह बदलाव इंगित करता है कि उसके लिए हिंदी का बाजार कितना मायने रखता है। गैर मातृभाषी फिल्म होने के बावजूद फिल्म को हिंदी पट्टी के लोगों से जोड़ने का प्रयास किया गया है।
 अब हम उम्मीद कर सकते हैं कि देसी स्पाइडर मैन हमें यहाँ भारत में नहीं बनाना पड़ेगा बल्कि सीधा हॉलीवुड से ही बनकर आएगा। अब भई क्या इम्पोर्टेड फिल्में सिर्फ अंग्रेजी में ही देखी जाएंगी क्या ? बाजार का नियम तो साफ़ है पैसा दो सामान लो।