मंगलवार, 7 जुलाई 2015

क्या मानें इसे सम्मान या उपकार ?

अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस निश्चित रूप से भारत की 'सॉफ्ट डिप्लोमेसी' का शानदार उदाहरण है, लेकिन क्या इसके सिर्फ इतने ही निहितार्थ हैं ?

मुझे लगता है कि इसको थोड़ा व्यापक रूप में देखना चाहिए। यह बात सभी जानते हैं कि बाबा रामदेव ने चुनावों में भाजपा के पक्ष में खुला प्रचार किया था। सरकार ने उन्हें कई तरह से अनुग्रहीत  करने का प्रयास किया जैसे कि पहले पद्म


पुरस्कार से नवाजना चाहा, फिर बाद में उन्हें हरियाणा में कैबिनेट मंत्री का दर्जा दिए जाने की भी बात हुई लेकिन रामदेव बाबा ने इसे स्वीकार करने से इंकार कर दिया।

देखा जाये तो यह सही भी है, अब कारोबारी इंसान को तमगों का क्या करना ? उसे तो अपने कारोबार से मतलब है। योग दिवस इसे भुनाने का सबसे सही तरीका है। सरकार ने योग दिवस के माध्यम से रामदेव का ही फायदा कराया है। इस वजह से उन्हें बिना धेला खर्च किये अंतर्राष्ट्रीय प्रचार मिल गया।

योग दिवस के मनाये जाने से इसकी वैश्विक स्वीकार्यता बढ़ेगी तो उसका व्यापार भी बढ़ेगा और विश्वभर में इसके कारोबार में लगे लोगों को लाभ पहुंचेगा। बाबा रामदेव के लगभग 1100 करोड़ के पतंजलि समूह के लिए इससे बेहतर अवसर क्या हो सकता है। चूँकि वो इस कारोबार के पुराने खिलाड़ी हैं लिहाजा उसका फायदा उन्हें मिलेगा ही। एक अनुमान के मुताबिक अकेले अमेरिका में ही योग का कारोबार लगभग 27 अरब अमेरिकी डॉलर का है। अब उसमें से रामदेव बाबा कितना हिस्सा अपने नाम जुटाते हैं ये देखना होगा ?  इसके अलावा देश में भी इसका कारोबार बढ़ेगा तो रामदेव और अन्य योग बाबाओं का तो राजयोग आने वाला है।

लेकिन यह बात भी मौजूं है कि संयुक्त राष्ट्र ने इसे मान्यता कैसे दी ? ठीक है मान लेते है कि भारतीय राजदूत ने इसके लिए काफी लॉबिंग की होगी और खुद प्रधानसेवक भी इसके लिए लॉबिंग कर आये थे वहां जाकर लेकिन क्या लॉबिंग ही काफी थी ? अगर ऐसा होता तो कई सालों से संयुक्त राष्ट्र में स्थायी सदस्य बनने के लिए लॉबिंग  कर रहे भारत का ये सपना भी साकार हो जाता।

मैं इसे थोड़े व्यापक रूप में देखता हूँ। ये बात किसी से छिपी नहीं संयुक्त राष्ट्र किन देशों के प्रभाव में कार्य करता है। इन देशों को चीन के अलावा अपने व्यापारिक हितों की पूर्ति के लिए एक नया स्थान चाहिए और भारत इसके लिए सबसे मुफीद जगह है।

जिस तरह चीन विश्व राजनीति में दखल बढ़ा रहा है, साफ़ है पुरानी ताकतें उसे कुछ थामना जरूर चाहती हैं।ऐसा उसके विश्व व्यापार को प्रभावित करके किया जा सकता है और इस काम में उनका साथ देने के लिए भारत की नयी सरकार ने लाल कालीन बिछा रखा है। ऐसे में इस तरह के एक दो झुनझुने थमाने से उनका कुछ जायेगा नहीं और हम अपने मुंह मियां मिट्ठू बन लेंगे।

वैसे भी किसी धनवान को असल से ज्यादा सूद प्यारा होता है ऐसे में बस वो नए निवेश के रास्ते तलाशता रहता है ताकि सूद आता रहे।  तो ऐसे ही देसी और वैश्विक धनवानों को फायदा पहुँचाने के लिए इस तरह के आयोजन होते रहते हैं। 

रविवार, 7 जून 2015

मासभर का ये ब्लॉग

समय के साथ गुजरते दिन

 हाँ ब्लॉग की दुनिया में मुझे यूँ तो लगभग पांच साल हो गए हैं लेकिन इस ब्लॉग की उम्र अभी भी एक मास ही हुई है। इस दौरान मैं कई अनुभवों से गुजरा, कुछ को यहाँ दर्ज कर पाया तो कुछ सिर्फ जेहन में ही रह गए। हाँ लेकिन जीवन का हिस्सा बन चुके इस ब्लॉग पर जब भी समय मिलता है मैं चला आता हूँ।

 पहले इस ब्लॉग का नाम मैंने "बस ऐसे ही.… " रखा था,  फिर थोड़े समय बाद बदलकर इसका नाम  "अपने देस में" में भी रखा लेकिन ये नाम इस ब्लॉग के अधूरेपन को पूरा नहीं कर पा रहे थे, क्योंकि एक आम इंसान के तौर पर आप दायरे में नहीं बंधे होते बस आपकी कुछ सीमाएं होती हैं। आप किसी एक विषय पर बात करने के दायरे में नहीं बंधे होते बल्कि हर विषय पर बात करने आपकी कुछ सीमा होती है।

 जब मैंने इसका नाम "नुक्कड़ की चाय" रखा तो लगा कि यह नाम के सूनेपन को ख़त्म करता है, क्योंकि आपके नुक्कड़ पर जो चाय की दुकान होती है उसके यहाँ आपको बहुत से लोग मिलते हैं और उन लोगों के साथ कई कहानियां, खेल-फिल्म-राजनीति-सामाजिक पहलुओं के कई विषय आपसे बस यूँही मिलने चले आते हैं। आपके जीवन से जुड़ी लगभग हर तरह की बात को वहां कई सारे चरित्र चरितार्थ करते हैं। आपके अनुभव सिर्फ आपके नहीं हैं यह भी आपको वहीं पता चलता है।

 उस नुक्कड़ वाले की चाय के साथ जब आप अपने मित्रों, चचेरे-ममेरे-भाइयों, हमउम्र चाचा-मामा और ऑफिस के साथियों के साथ आप गपशप शुरू करते हैं तो किस्से बुने जाते हैं, बचपन की यादें संजोयी जाती हैं, ऑफिस की फ्रस्टेशन बाहर निकाली जाती है और भी ना जाने ऐसे कितने वाकये कह सुनाये जाते हैं जो बस यादों में रहते हैं या आपका  अनुभव भर होते हैं।

दिनों में बीतते मास-साल
 आज इस पोस्ट के साथ ब्लॉग पर मेरी कुल जमा 31 पोस्ट होंगी लेकिन समय पांच साल गुजरा है। समय के साथ उम्र बढ़ी और सोच-भावनाओं में बदलाव, राजनीतिक चिंतनों इत्यादि में परिवर्तन इन सभी पोस्ट में दिखता है। इसलिए आज जब पोस्ट के लिहाज से यह ब्लॉग एक मास पूरा कर रहा है तो बस यही चाहत है कि मेरे घर के नुक्कड़ के पास हमेशा चाय खतकती रहे ताकि जीवन से जुड़ी बातें साझा होती रहें।

गुरुवार, 28 मई 2015

रिटर्न ऑफ पंजाबी गाने

 वैसे मुझे पंजाबी बिल्कुल भी नहीं आती और मैं पंजाबी गानों का उतना बड़ा शौक़ीन भी नहीं इसलिए इस विषय पर लिखने का कायदे से मुझे कोई अधिकार नहीं लेकिन भांगड़े की ताल पर नाचना किसे नहीं पसंद, इसलिए इस विषय पर कुछ लिखने का मन था इसलिए सोचा लिख ही देते हैं।

Daler Mehandi : Source-Internet
  आपको वो दौर याद होगा जब दूल्हे की बारात दलेर मेहंदी के 'हो जाएगी बल्ले बल्ले', 'काला कौवा काट खायेगा' और ' तुनक तुनक तुन' जैसे गानों के बिना आगे ही नहीं बढ़ती थी। हंस राज हंस, गुरदास मान, जसपिंदर नरूला और ऋचा शर्मा उस दौर में पंजाबी गानों के सरताज थे। इनकी आम जनता में लोकप्रियता इतनी थी कि भारतीय फिल्मों में भी पंजाबी गानों को रखने का चलन  बढ़ गया। हंस के 'तोते तोते' और दलेर के "ना ना ना रे' गाने की लोकप्रियता  का अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि उस दौर में बच्चों को डांस क्लास में  इन्हीं गानों पर सबसे पहले थिरकना सिखाया जाता था।

  इसी दौरान स्टीरियो नेशन, जैज़ी बी, सुखबीर, मीका, जसबीर जस्सी और रब्बी शेरगिल ने पारम्परिक पंजाबी गानों के  साथ पश्चिमी वाद्यों का तालमेल कर अपनी अलग पहचान बनाई। उस समय भारत में शादियों  में डीजे का चलन शुरू ही हुआ था और शादियों में डांस फ्लोर पर नाचना नया फैशन बन गया। उस दौर में इन नए उभरते पंजाबी गायकों के गानों पर हर उम्र और पीढ़ी के लोगों ने ठुमके लगाये।

  इन पंजाबी गानों की जो एक बात सबसे खास थी वो यह कि हर गायक का अपना एक अलग अंदाज था लेकिन फिर भी वह देसीपन लिए हुए था। गुरदास मान के गाने खालिस पंजाबी थे और दलेर के गानों में भांगड़ा का मजा था। मीका, सुखबीर और जसबीर के गाने डीजे पार्टियों की शान बन गए थे।

Honey Singh : Source-Internet
  इसके बाद आया हनी सिंह का दौर और वह बेशक इस समय के सबसे तेजी से उभरे सितारे हैं। लेकिन उनके आने के बाद पंजाबी गानों में एक ठहराव सा देखने को मिला या यूँ कहें पंजाबी गाने कंही खो से गए। उनका पहले  एलबम 'इंटरनेशनल विलेजर' पंजाब के कई नए चेहरे थे और उसमें कुछ गाने भी थे जो पंजाबीपन से भरपूर थे।

  उसके बाद दिलजीत, बिलाल, दिलबाग, मिलिंद गाबा, गिप्पी ग्रेवाल, बादशाह,  रॉल और लिटिल छोटू  जैसे कई सितारे आये जो इस दौर में पंजाबी गाने गा रहे हैं लेकिन इनमें  सभी में एक बात जो खलती है वह है कि गायकों की अपनी कोई शैली नहीं है और गानों में जो वैरायटी होती थी वो ख़त्म हो गयी है। अब हर गाने में रैप ने एक जगह बना ली है जिनमें दो चार बातों को ही अलग अलग तरह से घुमा फिराकर कहा जाता है और उनके विषय भी तीन चार चीजों के आस पास ही घूमते हैं।

Jassi Gill : Source-Internet
  लेकिन हाल ही में आया जस्सी गिल का ' रिटर्न ऑफ मेलोडी' एलबम कुछ नयी उम्मीद जगाता है। इसमें फिर से वही पंजाब का खालिस देसीपन है। इसके गाने इन दिनों चार्टबस्टर्स में छाये हुए हैं। तो क्या यह हनी सिंह के दौर के अंत होने का इशारा करता है या लोगों का उनके अंदाज से ऊब जाने का। खैर अभी इस बात पर टिप्पणी करना जल्दबाजी होगी, तब तक आनंद लीजिये फिर छायी इस देसी बहार का। यही तो है रिटर्न  ऑफ पंजाबी गाने।