शुक्रवार, 15 अप्रैल 2016

हम सब का एक जैसा हो जाना

 मैं अक्सर अपने दोस्तों से लड़ जाता हूँ कि भाई मैं तेरे जैसा नहीं हो सकता क्योंकि मैं, मैं हूँ। दरअसल ये मेरे अहम की लड़ाई नहीं होती बल्कि ये उस विविधता की लड़ाई है, जो इस दुनिया को बहुत खूबसूरत बनाती है।

 इसे थोड़ा दूसरे तरीके से समझते हैं। फ़र्ज़ कीजिये एक शेर है जो जंगल में रहता है और आशिक मिजाज है। सारी शेरनियां उसे पसंद करती हैं और उस पर लट्टू हैं। जंगल के और शेर इस बात से जलते हैं और उसी शेर की तरह होते चले जाते हैं। लेकिन इसी समय में एक और शेर है जो उसके जैसा नहीं है। वह दिल फेंक आशिक़ न होकर शालीन है और यही एक बात उसे औरों से अलग करती है। कुछ समय सभी शेरनियां एक नए साथी की तलाश में निकलती हैं और वो उन सभी शेरों को नहीं चुनती जो पहले वाले शेर जैसे हो गए बल्कि वो चुनती हैं इस शेर को जो अपनी बात पर अटल रहा।

 हो सकता है ये थोड़ा गलत उदहारण हो लेकिन आप मेरी उस बात के मर्म को समझिए जो मैं कहना चाह रहा हूँ। समानता अच्छा विषय है और इसे होना चाहिए लेकिन एकरूपता से हमेशा बचना चाहिए वरना फिर हमारे पास सिर्फ शेर ही होंगे, बाघ, हिरण, मोर वगैरह नहीं। 

 यही वह बात है जो मैं अपने दोस्तों से कहता हूँ कि अगर मैं भी उनके जैसा हो गया तो फिर हमारे बीच आकर्षण, मतभेद, कहानियां सब खत्म हो जायेंगे और इसके बाद क्या हमारी सभ्यता ठहर नहीं जाएगी ?

 फ़र्ज़ कीजिये कि आप सब जो इस ब्लॉग को पढ़ रहे हैं वो सब भी मेरी तरह ही देखने, बोलने और सोचने लगें तो हमारी दुनिया कैसी होगी। मेरे हिसाब से कुछ-कुछ रोबोटों जैसी। आप इस ब्लॉग को पढ़ें, समझें या यूँहीं अनदेखा कर दें लेकिन अपने का समर्पण नहीं करें।

 हॉलीवुड की एक फिल्म है "आई रोबोट" जिसमें एक रोबोट अपने जैसे कई रोबोट बनाकर इंसान से लोहा लेता है।  इसके बाद मानव और मशीन की जंग छिड़ जाती है। ख्याल और रचनात्मकता के हिसाब से यह फिल्म एक अच्छी फिल्म है लेकिन अगर ये हकीकत में हो तो सोचिये कैसा होगा?

 सारी दुनिया के लोग एक जैसे होंगे, एक जैसे दिखेंगे और एक जैसा सोचेंगे और एक जैसा खाएंगे और और भी बहुत कुछ एक जैसा करेंगे, उनकी नस्लें भी वैसी होंगी। तब कितनी नीरस होगी वह दुनिया क्योंकि फिर आप किसी को निहारना नहीं चाहेंगे, किसी को घूरना भी नहीं चाहेंगे। आपके लिए ख़ूबसूरती और प्रेम के मायने नहीं रह जायेंगे। आपके शब्दकोष में मतभेद और विचारधारा जैसे शब्द नहीं होंगे। तब शर्म-बेशर्म नहीं होगा।  सही-गलत, अच्छे-बुरे की परिभाषाएँ भी बेमानी होंगी। सोचिये तो सही कितना उबाऊ होगा ऐसा संसार ?

 लेकिन अगर उस समय कोई अपनी अलग बात पर अडिग रहने वाला शेर हुआ तो उसके लिए पूरी दुनिया का तानाशाह बनना कितना आसान होगा...आप इसकी कल्पना भी नहीं कर सकते?

 हमारी दुनिया अन्य ग्रहों की तुलना में शायद इसीलिए इतनी सुन्दर और रोचक है क्योंकि यहाँ विविधता है। इंसानों को जो बात अन्य प्राणियों से श्रेष्ठ बनाती है वो यही है कि वह ज्यादा बेहतर तरीके से सोच सकता है और यही सोच उसे एक दूसरे से अलग करती, मतभेदों, विभिन्नताओं और विचारधाराओं का निर्माण करती है। 

 अब इसी पहलू को अगर संस्कृति, विचारधारा एवं राजनीति  के संबंध में समझने का प्रयास करें तो बात ज्यादा स्पष्ट तरीके से उभरकर सामने आएगी। 

 अक्सर हमें बाध्य किया जाता है कि कोई अमुक विचारधारा की बात ही ठीक है और बाकि सब बकवास है। फिर यही बात राजनीति में उतर आती है कि हमारी पार्टी का एजेंडा ठीक है बाकि सब बेकार की बातें करते हैं। भारत में वर्तमान राजनीति का आकलन करेंगे तो स्थिति स्वतः स्पष्ट हो जाएगी। एक विचारधारा को स्थापित करने का लक्ष्य ही होता है कि शासक अपनी सत्ता को टूटने नहीं देना चाहता फिर वह चाहे वामपंथी हो या दक्षिणपंथी। इसलिए आजकल कैडर आधारित राजनीति जोर पकड़ रही है क्योंकि कैडर बनने के बाद आप अपने प्रश्नों की विविधता का त्याग कर देते हैं।

 जब इसी बात को आप वैश्विक स्तर पर करते हैं तो वहां अर्थव्यवस्थाऐं जुड़ती हैं।  संस्कृतियों का मिलन होता है लेकिन क्या वाकई ये मिलन हो रहा है ? संस्कृतियों में एकरूपता लाने का प्रयास पहचान और वर्चस्व की जंग बनने लगता है क्योंकि मजबूत (शासक) हमेशा चाहता है कि सब उसके जैसे हो जाएँ ताकि उसकी सत्ता पर कोई आंच नहीं आये लेकिन मानव स्वभाव से विद्रोही होता है क्योंकि ये उसके जानवर से इंसान बनने के दौरान जीन में विकसित हो चूका है और वो कंही न कंही अपने इस स्वाभाव को बचाने का प्रयास करता है।

 ज़रा सोचिये कि रूस और अमेरिका में एक जैसा खाना, रहन-सहन, बोलचाल हो तो कैसा होता? अगर तनी भाषाओं का, शब्दों का, भावनाओं का संकलन नहीं होता तो कैसा होता? फिर हमे जानवर से इंसान बनने की जरुरत ही क्या थी ? काम तो चल ही रहा था आगे भी चल जाता।

 दुनिया में अगर कोई विरोधाभास नहीं होगा तब तो दुनिया की सारी तकलीफों का अंत हो जायेगा ??

 इसीलिए हम अलग रहें लेकिन एक रहें तो चलेगा किन्तु हम सबका एक जैसा हो जाना यह ख्याल ही कितना भयावह है...

मंगलवार, 12 अप्रैल 2016

परिवर्तन और अनुभव...

वर्ष 2007 में बनाया था मैंने इसे...
 हते हैं कि धरती पर परिवर्तन शाश्वत है। यही वो एकमात्र ऐसी बात है जो सदा होती रहती है निरन्तर, हर क्षण। हम एक परिवर्तन के दौर से लगातार गुजरते रहते हैं लेकिन हम अक्सर इन परिवर्तनों पर गौर नहीं करते और ये हमें महसूस ही नहीं होते। सम्भवतया इसी से दिनचर्या का निर्माण होता है जिससे हम अपना काम नियमित तौर पर कर सकें और यह प्रति क्षण होने वाले परिवर्तन हमारे लक्ष्य के लिए बाधक नहीं बनें। इसलिए हम बस लगातार चलते रहते हैं।

 राजकपूर के गाने 'मेरा जूता है जापानी...' की एक पंक्ति है 'चलना जीवन की कहानी, रुकना मौत की निशानी',  मेरे हिसाब ये दो वाक्य परिवर्तन की इस पूरी परिभाषा को समझाने में सक्षम हैं क्योंकि मनुष्य के जीवन में मौत के बाद ही परिवर्तन का अंत होता है उसके बाद परलौकिक दुनिया की जितनी भी कहानियां है वह सभी काल्पनिक हैं और उनकी सत्यता का कोई प्रमाण नहीं है। मृत्यु शाश्वत है....लेकिन उसके बाद की बातें कोरी कपोल कल्पना।

 खैर परिवर्तन से जुड़ी इतनी बातें करने के पीछे की मंशा 'ज्ञान' देना नहीं थी और ना ही किसी बहुत बड़े खुलासे से पहले की भूमिका बांधना। दरअसल यह बस उन कुछ अनुभवों को साझा करने का प्रयास है जो बीते दो साल के दौरान दफ्तर में काम के दौरान हुए और अब जब उस कड़ी में कुछ नया जुड़ने जा रहा है तो सोचा क्यों न एक बार यादों के पन्ने पलट लिए जाएँ।

 शुरू से मेरा रुझान राजनीतिक ख़बरों की तरफ कम रहता है इसके पीछे वजह ये है कि अब राजनीतिक पत्रकारिता एक तरफ़ा अधिक हो गयी है और वहां सृजन की सम्भावनाएं कम ही दृष्टिगोचर होती हैं। फिर नृत्य, संगीत और लेखन से जुड़ाव भी मुझे राजनीतिक ख़बरों के प्रति आकर्षित नहीं करता।

 इसीलिए घुमक्कड़ी, सिनेमा, नाटक, प्रदर्शनियां, नवाचार, स्वास्थ्य, फीचर और विज्ञान से जुडी ख़बरों पर ही मेरा अधिकतर ध्यान रहता है। इसलिए 'भाषा' में काम करते हुए जब पहली बार मुझे राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों की रिपोर्टिंग का अवसर प्राप्त हुआ तो मैं बहुत प्रसन्न था, क्योंकि इस पूर्व घोषित कार्यक्रम में भी सृजन की सम्भावना बची हुई थी।

 यहाँ मुझे कई बार विज्ञान की ऐसी ख़बरों से दो-चार होना पड़ा जिनका भारतीय समुदाय से कोई लेना-देना नहीं था लेकिन हमेशा उन ख़बरों का अनुवाद करते समय मैं उन ख़बरों में 'ह्यूमन कनेक्ट' को ढूंढने का प्रयास करता और फिर उसे भारतीय समाज से जोड़कर कॉपी बनाने का प्रयास करता। इस वजह से मैंने कई बार अपने सम्पादकों से डांट भी खायी कि खबर का इंट्रो छोटा और तथ्यपरक ज्यादा होना चाहिए और मैं हूँ जो भूमिका में ही दो पैराग्राफ खा जाता हूँ लेकिन फिर जब वो कॉपी ज्यादा छपती तो मैं अपनी बात को स्थापित कर देता कि आखिर हम ख़बरों को पढ़ते क्यों हैं क्योंकि हम 'ह्यूमन' हैं और इसलिए खबरों में 'ह्यूमन कनेक्ट' ढूंढने की मेरी कोशिश होती है।

 'भाषा' में कभी-कभी हमें काम के दौरान फिल्म समीक्षा का भी अनुवाद करना पड़ता है। यह बहुत दुष्कर काम है, इस काम में आपको अपनी रचनात्मकता और सृजनात्मकता को बक्से में बंद करना होता है और बिना किसी फिल्म को देखे हुए उसकी समीक्षा करनी होती है। लेकिन मैं हमेशा इसमें भी प्रयास करता हूँ कि वह समीक्षा मात्र अनुवाद न लगे और इसलिए मैं उसमें अपना अक्स जोड़ ही देता हूँ और बाद में संपादक की थोड़ी डांट खा लेता हूँ।

 खैर ये तो बीते अनुभवों की बात है लेकिन अब जो नया अनुभव प्राप्त करने के लिए मैं अग्रसर हूँ वो यह कि कुछ दिनों के लिए मैं अब अर्थ-वित्त से जुडी ख़बरों से रूबरू होने जा रहा हूँ। मुझे दो साल बाद ऐसा लग रहा है कि फिर से नयी नौकरी मिल गयी हो, क्योंकि ये जो परिवर्तन हुआ है मैं उसे सकारात्मक तौर पर लेता हूँ। जिस सृजन के चलते मैं खुद को राजनीतिक खबरों से दूर रखने  का प्रयास करता हूँ अब क्षेत्र से जुड़ी नयी ख़बरों को बनाने, उनका अनुवाद करने और उसकी रिपोर्टिंग करने के लिए जो उत्सुकता मेरे भीतर है वो एक नए सृजन को जन्म दे रही है क्योंकि कुछ नया सीखना भी तो सृजन है।

 अर्थ जगत में मेरी थोड़ी रूचि पहले से भी रही है क्योंकि देश कैसे चलता है और हम स्वयं कैसे धन से शासित होते हैं यह अर्थ जगत का हिस्सा है और इसे जानना अच्छा ही होता है एवं इसे मैंने खुद से थोड़ा-थोड़ा जानकर ही जाना है।

 उम्मीद है कि यह परिवर्तन नए अनुभव देगा। वैसे भी मेरा मानना है कि जीवन से जुड़ा हर परिवर्तन आपको आपकी स्थापित सीमाओं से बाहर आने का अवसर प्रदान करता है और इस तरह आने वाले बहुत से परिवर्तन आपको सीमाओं से परे ले जाते हैं।

रविवार, 10 अप्रैल 2016

वो बस वाली लड़की...

स्रोत - गूगल सर्च से साभार 

चार दिन से वो मुझे रोज़ बस में मिल रही है,
सुंदर आँखें लेकिन खोयी-खोयी,बस दीदार की मूरत वो, लेडीज़ सीट पर शांत सी बैठी,

और नज़र मिलने पर दोनों शरमाते,मैं भी कनखियों से उसे झांकता, आँखें उसकी न गुस्सा होती,न जाने कब से वो न मुस्कुराई है,


न हँसती, न विरोध जताती,कुछ तो है जो वो मन में दबायी है,क्या पता कंही किसी रोज़, अब मैं रोज उसी बस से आता हूँ,उसके सीट के बगल में खड़ा हो जाता हूँ,उसकी आँखें मेरे सवालों का जवाब दे दें...

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