सोमवार, 5 अक्टूबर 2020

अटकन-चटकन : इस एक फिल्म में पूरा बचपन जी लिया

  

कुछ दिन पहले जी5 पर एक फिल्म देखी ‘अटकन-चटकन’....

फिल्म की कहानी बहुत साधारण सी, कोई तुर्रमबाजी नहीं। एक मजदूर वर्ग का बच्चा जिसकी रुचि संगीत में लेेकिन घर चलाने के लिए चाय की दुकान पर काम करता है। परेशान बचपन में अपना प्रिय कोई तो छोटी बहन और एक किताब बेचने वाला दोस्त। किसी तरह जुगाड़ कर करके संगीत बजाता है और फिर चार लोगों की एक मंडली तैयार हो जाती है जो कबाड़ के सामान से संगीत रचती है।

 

कुछ-कुछ कहानी मुंबई के धारावी-रॉक्स की तरह...

लेकिन मुझे फिल्म इसकी कहानी, ट्रीटमेंट की वजह से पंसद नहीं आयी और ना ही तकनीकी खामियों की वजह से मैं इसे दरकिनार कर सकता हूं।
मेरे फिल्म पसंद करने की वजह इसका मेरे बचपन से सीधी जुड़ा होना और हर एक सीन में बचपन को जी लेना है।
फिल्म की शूटिंग झांसी के गली-मोहल्लों में हुई है और उन गलियों में हम हाफ पैंट में घूमे-फिरे हैं।
फिल्म में मुख्य किरदार गुड्डू जिस चाय की दुकान पर काम करता है, ‘तिवारी चाय’ वह नवरात्र के दिनों में दुर्गा पंडाल पर देर रात तक बैठने के चलते लगने वाली भूख मि्टाने का ठिकाना होता है शहर के लोगों का। रात को तीन बजे भी जाएंगे तो चाय और आलू के पराठे आपका पेट भर देंगे।
फिर गुड्डू जब झांसी की गलियों में थपथपाते हुए घूमता है तो ‘सिंघल कार्ड’ नाम से खुद के चाचा की दुकान दिखती है। मानिक चौक से लेकर झरना गेट तक के बाजार दिखते हैं और जब गुड्डू अपने जमनिया गांव से बस की छत पर बैठकर शहर आता है तो लक्ष्मी दरवाजे से गुजरता दिखता है।
इस लक्ष्मी दरवाजे का भी शहर के दुर्गा उत्सव से अनोखा रिश्ता है। नवरात्रों में देवी की प्रतिमा के विसर्जन के लिए जब इस दरवाजे से गुजरना होता है तो कंधे पर प्रतिमा उठाकर चलते नौजवानों को उस दौरान प्रतिमा हथेलियों पर संभालनी होती है। इतना ही नहीं पूरे 90 डिग्री के कोण पर 20-20 फुट ऊंची प्रतिमाओं को घुमाना होता है।
फिर गुड्डू जब विदेशियों के सामने अपना पहला परफॉर्मेस देता है तो ओरछा के मंदिर की याद आ जाती है। उसके पीछे भूल-भुलैया दिखायी दे रही होती है। जहां से उसे तानसेन संगीत विद्यालय के प्रधानाचार्य अपने साथ ले जाते हैंं। वह जिस स्कूल में ले जाते हैं वह असल में तानसेन संगीत विद्यालय नहीं बल्कि शहर का सबसे पुराना डिग्री कॉलेज बिपिन बिहारी कॉलेज है।
गुड्डू स्कूल के बच्चों के सामने जहां अपना पहला परफॉर्मेंस देता है वह शहर का गणेश मंदिर है, इसी मंदिर में झांसी की रानी की शादी हुई और मैंने छह साल लगातार उस मंच पर तबला बजाया।
फिल्म में जहां आखिरी प्रतियोगिता होती है, उस मैदान पर आठवीं तक पढ़ाई की है और पत्थर की गेंद बनाकर ना जाने कितने जूते फाड़े हैं।

मेरा मानना है कि इस फिल्म में झांसी के छोटे शहर को जितनी बेहतरीन तरह से दर्शाया गया है वह बहुत कम देखने को मिलता है। कहानी सिर्फ गुड्डू की नहीं बल्कि झांसी शहर भी कहानी का हिस्सा है।
वरना बॉलीवुड में बनारस, लखनऊ, कानपुर जैसे कई शहरों की कहानी अक्सा दिखायी जाती है लेकिन अधिकतर फिल्मों में कहानी का हिस्सा नहीं बन पाते, सिर्फ लोकेशन भर रह जाते हैं। अटकन-चटकन इसी को तोड़ती है।
कहानी में बनारस को देखना हो तो पंकज कपूर की ‘धर्म’ देखिए, कोलकाता को देखना हो तो विद्या बालन की ‘कहानी’, लेेकिन अगर लखनऊ देखना हो तो अमिताभ बच्चन की ‘गुलाबो-सिताबो’ बिल्कुल नहीं देंखें।

गुरुवार, 31 मई 2018

'समय' कुछ कहना चाहता है...

पुराने नगर का एक अलंकरण
 "मैं समय हूँ।" दूरदर्शन पर जब 'महाभारत' की कहानी सुनाने के लिए ये आवाज आती थी तो शायद उस 'समय' को खुद नहीं पता था कि उसे ऐसा भी एक वक़्त देखना होगा, जो बीते समय को ही हमारा दुर्भाग्य बता दे। किसी का भी अतीत उसके वर्तमान का आईना होता है, क्योंकि हमारे वर्तमान की मीनार उसी नींव पर खड़ी होती है।


 अभी जो समय है वो हमें बताने पे तुला है कि एक दौर में हम विश्वगुरु थे, लेकिन कब और कहाँ ये उसे भी नहीं पता। हालाँकि हो सकता है कि उस बात में सच्चाई हो, लेकिन इतिहास तथ्य पर चलता है। ऐसे में अगर एक प्रदर्शनी आपको अपने अतीत के करीब ले जाये, आपको उस समय में जीने का मौका दे और इतना ही नहीं आपको आपकी वैश्विक हैसियत से भी रूबरू कराये तो उससे बेहतर क्या हो सकता है ?

सिंधु सभ्यता से जुड़ा एक खिलौना
 पिछले हफ्ते जब दफ्तर से एक दिन की छुट्टी मिली तो मैं भी पहुँच गया इंडिया गेट के पास नेशनल म्यूजियम, जहाँ 'भारत और विश्व : नौ कहानियों में इतिहास' प्रदर्शनी लगी है। यहाँ न सिर्फ मुझे हिदुस्तान के 20 संग्रहालयों या टाटा ट्रस्ट जैसे कुछ निजी संग्रहों की वस्तुएं देखने को मिली, बल्कि लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम से आयी कई तरह की ऐतिहासिक वस्तुओं ने भी मेरा ध्यान खींचा।

 यह प्रदर्शनी दरअसल एक रास्ता है इतिहास के उन रोशन झरोखों में झांकने का, जो कभी हमारे पूर्वजों का वर्तमान हुआ करता था। यह वो गलियारा है जहाँ हम अपने और विश्च के साझा इतिहास में चहलकदमी कर सकते हैं। यह किसी को भी मानव सभ्यता के आदिकाल से सभ्य समाज तक आने की क्रमवार जानकारी तो देती ही है। साथ ही भारत के विश्व इतिहास से जुड़ाव और उसके आधुनिक राष्ट्र बनने तक के सफर से रूबरू कराती है।

मरियम
युद्ध के देवता
 जैसे ही मैंने प्रदर्शनी में प्रवेश किया मुझे ‘साझा शुरुआत’ खंड मिला। इसमें भारत में मिले आदिमानव काल के पत्थर के औजार और उसी जैसे अफ्रीका में मिले एक पत्थर के औजार के बीच तुलना करके देखी जा सकती है कि हमारी और उनकी विकास गाथा में हम कितना इतिहास साझा करते हैं। इसके आगे प्रदर्शनी में दुनियाभर में मिले बर्तनों की समानता दिखती है, जिसने मानव को खाने के भंडारण और उसमें विविधता लाने के लिए प्रेरणा दी।

सिकंदर महान की एक मूर्ति
 आगे बढ़ा तो मुझे ‘पहले शहर’ नाम का खंड मिला, यहाँ मैंने देखा कि कैसे उस शुरुआती समय में भी भारत के आम जनमानस ने सिंधु सभ्यता और उसके नगरों का निर्माण किया और कैसे लगभग उसी समय विकसित हुईं मेसोपोटामिया और मिस्र की सभ्यताएं हमें विश्व इतिहास में करीब लाती हैं। इसके बाद जब मैं आगे बढ़ा तो मेरा सामना ‘साम्राज्य’ खंड से हुआ। यह बताता है कि हम अकेले नहीं थे जिसने दुनिया में साम्राज्यों का दौर देखा। जहां भारत के मौर्य साम्राज्य की झलक यहाँ देखी जा सकती है, वहीं चीन और मिस्र के साम्राज्यों का इतिहास भी यहाँ दिखता है।

इस्लामी कला का एक नमूना 
 इस खंड में विभिन्न साम्राज्यों के सिक्के भी रखे गए हैं जो बताते हैं कि कैसे साम्राज्य अपनी मान्यता के लिए सिक्कों का प्रयोग करते थे। कैसे इन सिक्कों ने व्यक्ति पूजा को स्थापित किया। जब सिक्के इस्लाम जगत में पहुंचते हैं तो कैसे व्यक्ति और राज्य के गुणगान का स्थान कुरान की आयतें सिक्कों पर ले लेती हैं। चीन के सिक्के भी इस खंड में हैं। इन सिक्कों के बीच में छेद है जिसकी वजह इन सिक्कों को रस्सी में बांधकर रखे जाने के लिए सुविधाजनक बनाना था।

 सिक्कों से निकलकर धर्म और राज्य मूर्ति विधा में कैसे पहुंचा और उसने साम्राज्य के वर्णन के साथ-साथ कला और चित्रकारी को नया रूप कैसे दिन इसकी जानकारी मुझे अगले खंड ‘चित्रित और मनोहारी वर्णन’ में मिली। इस खंड में ब्रिटिश म्यूजियम से लायी गई कई कलाकृतियां ऐसी थी जिसने मेरा मन मोहा। मां मरियम, यीशू मसीह के अलावा कबीलाई ईश्वर, युद्ध के देवता और काष्ठ की बनी कई मूर्तियों के साथ कपड़े पर उकेरी गई इस्लामिक चित्रकारी ने  इतिहास के खूबसूरत पहलू की जानकारी करायी। आगे ‘भारतीय समुद्र व्यापार’ खंड में भारत के विश्व के साथ होने वाले समुद्री व्यापार की झलक देखने को मिली। यह खंड दिखाता है कि कैसे व्यापारिक आदान-प्रदान ने हमारी संस्कृति को प्रभावित किया।
राणा संग्राम की ढाल

रोमन शैली की काली मिर्च की डिब्बी
 यहां ब्रिटिश संग्रहालय से आयी एक 300 से 400 ईसवी की एक पुरानी काली मिर्च छिड़कने की डिब्बी ने मुझे सोचने पर मजबूर किया कि मानव सभ्यता में हमारा वर्तमान कितना कलाहीन होता जा रहा है। उस समय में मानव ने कैसे इतनी मामूली वस्तुओं में भी कला को इतना निखरा रुप दिया। यह कहीं ना कहीं वर्तमान में हमारे कलाबोध के ह्रास को दिखाती है। 

अकबर की युद्ध पोशाक
 इससे आगे  ‘दरबारी संस्कृति’ खंड में मुझे मुगल दरबार की शानोशौकत दिखी। इसमें अकबर की युद्ध पोशाक और तलवार के साथ राजपूतों के शौर्य को दर्शाती कला से परिपूर्ण राणा संग्राम सिंह की एक ढाल ने थोड़ी देर मुझे वंही खड़े रखा। इस ढाल पर उनकी कई लड़ाइयों की चित्रकारी की गयी है। इतना ही नहीं इस खंड में मैंने ईसाई संस्कृति के राजसी प्रतीक भी देखे।

 इसके बाद ‘आजादी के जुनून’ में भारत की आजादी की लड़ाई के कई पहलू और अंत में ‘असीमित काल’ खंड में वर्तमान में जारी युद्धक सोच और उससे समाज पर पड़ते प्रभाव यहाँ बहुत अच्छे से दिखाया गया है।



 कुल मिलाकर इसे एक बार जरूर देखा जा सकता है। अभी तो यह 30 जून तक यहाँ लगी है, तो देख लीजिये, क्योंकि वर्तमान में जब हम इतिहास का कुछ बिखरा कुछ धुंधला स्वरूप देख रहे हैं तो इस तरह की प्रदर्शनियां उसे एक नयी रोशनी देती हैं।

 साथ एक वीडियो भी साझा कर रहा हूँ...



गुरुवार, 24 मई 2018

ये है बनारसी ब्रेड पकौड़ा...


 ज हम बनारस की तरफ चलते हैं थोड़ा, वैसे भी इतनी गर्मी में गंगा के तीरे ही थोड़ी राहत की उम्मीद है। यूँ तो बनारस को वाराणसी और काशी भी कहा जाता है लेकिन पता नहीं मुझे क्यों को इसे बनारस कहना ही पसंद है। मैं चाहकर भी इसे किसी और नाम से नहीं बुला पाता।

 मैं बनारस पहले भी जा चुका हूँ। सारनाथ देखा, जैन मंदिर देखे, घाट देखे और गंगा आरती का भी आनंद लिया। अस्सी घाट पर कुल्हड़ में चाय की चुस्की हो या गदौलिया पर ठंडाई का मज़ा, ये सब बनारस के अपने रंग हैं। मैंने सुबह-ए-बनारस में राग भी सुने हैं, तो गंगा मैया के साथ नाव की सैर करते-करते शाम-ए-अवध सा आनंद भी बनारस में लिया है।

 लेकिन इस बार की यात्रा थोड़ी अलग रही। नवंबर में मैं बनारस गया तो ऑफिस के काम से ही था। लेकिन जिस जिस कार्यक्रम में शामिल होने गया था वो कबीर से जुड़ा था। इसलिए इसका अनुभव बाकी यात्राओं से अलग रहा। कबीर से जुड़े कई पहलुओं को जानने का मौका मिला, तो वंही जुलाहा समुदाय के साथ बातचीत भी की, जो उस समय भी नोटबंदी की मार झेल रहा था।

 उस समय हमारी सुबह छह बजे दरभंगा घाट पर प्रभात के राग और गंगा पर सूर्योदय के नज़ारे से शुरू होती थी। खैर ये बात इसलिए नहीं शुरू की थी।

 तो बात यह कि जब भी बनारस की बात होती है तो वहां के खाने की भी बात होती है। फिर वो चाहे विश्वनाथ मंदिर के पास काशी की चाट हो या गोदौलिया चौक की कुल्हड़ वाली लस्सी। इन सबके बारे में बहुत कहा गया, लिखा गया। हिंदी साहित्य की कई रचनाएँ इन सबके इर्द-गिर्द बुनी गयीं। अस्सी घाट की अड़ी की दास्तान बताने वाला "काशी का अस्सी" जैसा उपन्यास तो पूरे हिंदुस्तान की राजनीति और राम मंदिर आंदोलन की कलई खोल देता है।

 इतना ही नहीं गली ठठेरान की कचौड़ियों के भी अपने चर्चे हैं और रंगीली के मलाई पान और लाल पेड़ा के भी कई किस्से सुनने को मिल जातें हैं। लेकिन इस बार मेरा परिचय एक नए तरह के नाश्ते से हुआ।

 आम तौर पर उत्तर प्रदेश और बिहार के इलाकों में ब्रेड पकौड़ा वैसा नहीं होता, जैसा ये दिल्ली में दिखता है। उसकी एक बड़ी वजह उसका वहां पर समोसे का विकल्प नहीं होना है, क्योंकि समोसा वो है जिसमें आलू है और ब्रेड पकौड़े में आलू का क्या काम ये समझ से परे है वहां।

 तो आप जब बनारस में लहुराबीर चौक से तेलियाबाग चौक की तरफ बढ़ते हैं, तो आपको राजकीय क्वींस इंटर कॉलेज दिखाई देता है। बस इसी के ठीक सामने मुझे अबकी बार ब्रेड पकौड़े का एक नया रूप देखने को मिला।

 हमारा होटल वंही नज़दीक में था और मेरे साथ इस यात्रा पर इम्ति भाई भी थे। चार दिन की यात्रा में शुरू के दो दिन वो मुझसे कहते रहे कि आपको ब्रेड पकौड़ा और घुघनी खिलाना है। मैं बहुत असमंजस में कि ये कौन सी बला है ?

 कितना रोचक है ना कि देशज शब्दों से हमारे दूर होने के चलते हम आम बातों का भी अर्थ नहीं समझ पाते। अब बताइये भला कि जिस बात को मैं बला समझ रहा था दरअसल वो उबला हुआ देसी चना है जिसे घुघनी कहा जाता है।

 खैर, तीसरे दिन जब गए तो दुकान हमे बंद मिली, क्योंकि रविवार को कॉलेज बंद होता है इसलिए दुकान खुलती नहीं। तो अब क्या करें ? अंत में मुकर्रर हुआ कि कल सुबह में जल्दी उठकर इसका स्वाद जरूर लिया जायेगा। अब सोमवार के दिन मैं और इम्ति भाई सुबह कुल्हड़ की चाय पीकर निकल पड़े घुघनी और ब्रेड पकौड़ा खाने को।

 वाह क्या नज़ारा था, एक कढ़ाई में गर्म-गर्म पकौड़े छन रहे थे और दूसरी ओर एक भगौने में चने या घुघनी एक दम गर्म...लेकिन मैं अभी भी ठिठका क्योंकि पकौड़े तलने के दौरान जो बेसन की बूंदियां कढ़ाई में तैर रही थी उन्हें एक अलग थाल में जमा किया जा रहा था। मैं सोच रहा कि अब इसका क्या काम ?

 लेकिन देखिये जनाब, हमने जब दो प्लेट ब्रेड पकौड़ा माँगा तो यही बची हुई बूंदियां उसकी गार्निशिंग कर रही थीं। मतलब कुछ भी बर्बाद नहीं। बढ़िया से एक दोने में ब्रेड पकौड़े के छोटे-छोटे टुकड़े और उस पर गर्म-गर्म उबले चने के साथ चटनी, वाह अलग ही मज़ा। साथ ही नींबू के रस की बूंदों ने उस मज़े को दोगुना कर दिया। उस पर वो बची हुई करारी बूंदियां ऊपर से डाली गयीं तो चने से गल गए ब्रेड पकौड़े का दुःख भी जाता रहा।

 मतलब आप सोचिये सुबह-सुबह बेसन का फाइबर पेट में पहुंच गया और शरीर के लिए जरुरी थोड़ा सा तेल भी और साथ में चने का प्रोटीन अलग, साथ में दुकान पर जमा नए लोगों से बातचीत, दोस्तों के साथ चर्चा और साथ में अगर चाय भी पी ली जाए तो आनंद ही आनंद। इसके अलावा ब्रेड से पेट भी भर गया और गयी दोपहर तक के खाने की। अब 20 रुपये में सुबह-सुबह आपको क्या चाहिए।

 मुझे लगता है कि मोदीजी के पकौड़ानॉमिक्स को भी यहीं से प्रेरणा मिली होगी। 

शुक्रवार, 18 मई 2018

बहुत सी बातों पर 'राज़ी' करती एक फिल्म


 किसी भी फ़िल्म का वजूद, वह किस दौर में आयी है उस पर निर्भर करता है। चार्ली चैपलिन की 'द ग्रेट डिक्टेटर' सिर्फ इसलिए खास नहीं हैं कि वो हिटलर पर व्यंग्य करती है, या फिर वह क्राफ्ट की दृष्टि से बहुत ही बेहतरीन फिल्म है, बल्कि इन सबके बावजूद उसके अनोखे होने की एक और वजह उसका हिटलर के दौर में ही परदे पर और जनता के बीच आना थी।

 यही बात हाल में भारत में रिलीज हुई 'राज़ी' के बारे में कही जा सकती है। निर्देशक मेघना गुलज़ार ने फिल्म की कहानी पर बहुत अच्छे से काम किया है। उनकी पिछली फिल्म 'तलवार' के बाद यह उनकी नयी पेशकश है।

 मेघना की फिल्म उस दौर में आयी है जब हम अपनी 'राष्ट्र्भक्ति और 'देशभक्ति' का पैमाना सिनेमाघर में 'राष्ट्रगान' पर खड़े होने से नाप रहे हैं। यह फिल्म उस वक़्त में है जब पूरे कश्मीर को सिर्फ 'आतंकवादी' या  'देशद्रोही' मान लिया गया है।

 उस दौर में मेघना दर्शक को इस बात के लिए राज़ी करती हैं कि कश्मीरी भी देशभक्त होते हैं। उन्होंने भी इस राष्ट्र के निर्माण में अपनी भूमिका अदा की है। साथ ही यह फिल्म हमें हमारे वर्तमान के राष्ट्रभक्ति और देशभक्ति के पैमाने को दुरुस्त करने की बात पर भी राज़ी करती है। यह ‘सीमा पर हमारे जवान लड़ रहे हैं...’ के तर्क से शुरु नहीं होती बल्कि यह बताती है कि सीमा पर लड़े बिना भी अगर आप की नज़र में देश सबसे ऊपर है तो आप 19 साल की छोटी सी उम्र में भी बहुत कुछ कर सकते हैं।

 इसके अलावा यह फिल्म हमें किसी और बात के लिए राज़ी करती है तो वह है ‘अंधराष्ट्रभक्ति’ से बचने की बात पर। कैसे एक परिवार अपना सब कुछ देश के लिए लुटा देता है, फिल्म में इसे हिंदुस्तान और पाकिस्तान दोनों के पक्ष से बखूबी दर्शाया गया है। राष्ट्रभक्ति दिखाने के लिए बड़े-बड़े दावे फिल्म का कोई किरदार नहीं करता, बस वह अपना काम पूरी ईमानदारी से करता है। कैसे एक पिता अपनी किशोर बच्ची को दुश्मन के घर सिर्फ इसलिए भेज देता है क्योंकि उसे देश की फिक्र है। और कैसे एक बेटी इसके लिए तैयार हो जाती है और उसके बारे में बनायी गई सोच को तोड़ते हुए अपनी सीमाओं से आगे जाकर देश की मदद करती है। यहीं फिल्म दिखाती है कि ‘अंधराष्ट्रभक्ति’ और वास्तविक ‘देशभक्ति’ में कितना अंतर है।

 आलिया भट्ट का किरदार इस बात के लिए राज़ी करता है कि देश से ऊपर कुछ नहीं, लेकिन उसमें भी मानवता को बनाए रखने की एक झलक दिखाई देती है। जहां वह भारत के देशभक्ति के पक्ष को रखती हैं तो वहीं विकी कौशल पाकिस्तान के पक्ष को फिल्म में दिखाते हैं।

 और इसी पूरी उधेड़बुन के बीच मेघना ने दोनों किरदार के बीच एक प्रेम कहानी को भी बड़े भावपूर्ण तरीके से बुना है।

 अगर बात फिल्म की स्टारकास्ट पर की जाए तो मेघना ने फिल्म के हर किरदार का चुनाव बहुत सावधानी से किया है। हर अभिनेता को अपने किरदार के साथ न्याय करने का मौका मिला है सिवाय विकी कौशल के, मेरे हिसाब से उनसे और बहुत कुछ फिल्म में कराया जा सकता था। रजित कपूर बहुत छोटी भूमिका में हैं, लेकिन प्रभाव छोड़ते हैं।

 हालाँकि आलिया भट्ट ने अपने अभिनय से सिद्ध किया है कि भले फ़िल्मी परिवार की पृष्ठभूमि से आने के चलते उनका फिल्म इंडस्ट्री में प्रवेश आसान रहा हो लेकिन उनके पास अभिनय की प्रतिभा है। आपको पूरी फिल्म में कंही भी महसूस नहीं होगा कि आप आलिया को देख रहे हैं, बल्कि आपको उनमें सिर्फ 'सहमत' नज़र आएगी। पूरी फिल्म को आलिया ने अपने कंधों पर टिकाये रखा है। इसके अलावा जयदीप अहलावत और शिशिर शर्मा भी अपनी छाप फिल्म में छोड़ते हैं।

 हालांकि फिल्म में कुछ तकनीकी खामियां हैं जिनमें एक दृश्य मेरे ज़हन में बस गया है। यदि फिल्म 1971 के दौर की बात कर रही है तो हेयरड्रायर भी उसी दौर का होना चाहिए जो कि नहीं है। ऐसी ही और कई तकनीकी खामियां है लेकिन आम दर्शक को उससे कोई फर्क नहीं पड़ता।

 फिल्म का संगीत, कहीं भी कहानी से कम नहीं बैठता। शंकर-एहसान-लॉय ने बहुत समय बाद लीक से हटकर संगीत दिया है और गुलज़ार के अल्फ़ाजों के साथ वह खूबसूरती से पिरोया गया है। यह बहुत हद तक आपको ‘मिशन कश्मीर’ की याद दिलायेगा। सबसे खूबसूरत फिल्म में ‘एे वतन’ गाने का फिल्मांकन है। आलिया और बच्चों के साथ फिल्माये गए इस गाने की अनोखी बात यह है कि बच्चे इस गाने को पाकिस्तान के लिए गा रहे हैं और ठीक उसी वक्त में आलिया इसे हिंदुस्तान के लिए गा रही हैं। इस गाने में इकबाल के ‘बच्चे की दुआ’ के कुछ बोलों को रखा गया है जो पाकिस्तान के स्कूलों में आज भी गायी जाती है और यह वही इकबाल हैं जिन्होंने ‘सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा’ लिखा है।

 ऐसे में यह फिल्म भारत-पाकिस्तान की दुश्मनी को तो दिखाती ही है लेकिन उनकी साझा विरासत को बरकरार रखने के लिए भी कहीं ना कहीं राज़ी करती है।

शुक्रवार, 22 दिसंबर 2017

एडिटिंग की मिसाल है, एन इन्सिग्निफिकेंट मैन

फिल्म का एक दृश्य
 दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की "आम आदमी पार्टी" ने अपने पांच साल पूरे होने का जश्न हाल ही में मनाया है। पार्टी के भीतर और पार्टी से अलग हुए नेताओं की टिप्पणियां भी हुईं और विपक्षियों के आरोप-प्रत्यारोप भी। पार्टी से नाराजों के भी बोल भी रहे और पार्टी के रास्ता भटक जाने की बातें भी। इसी समय में हमारे बीच एक फिल्म आई  "एन इन्सिग्निफिकेंट मैन", मैं इसे डॉक्युमेंट्री इसलिए नहीं कहना चाहता क्योंकि ये फिल्म उससे बहुत आगे जाती है।

 इस फिल्म के राजनीतिक पहलू पर बहुत बातें हुई हैं। इससे जुड़े लोगों के बारे में भी बहुत बातें हुईं हैं। लेकिन मेरा मानना है कि इस फिल्म ने एक बहुत बड़े स्टीरियोटाइप को तोड़ा है। यह मैं इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि मैंने इसे महसूस किया है। फिल्म रिलीज हुई 17 नवंबर को और मैं इसे 19 को ही देख आया।

 आमतौर पर भारत में दर्शक इस तरह की फिल्मों के लिए थिएटर में पैसा नहीं खर्च करता। लेकिन इस फिल्म में कुछ अलग है, मैंने दिल्ली के अनुपम साकेत में जब यह फिल्म देखी तो हॉल खचाखच भरा पाया। इसमें भी खास बात देखने वालों में युवाओं की संख्या ज्यादा होना लगी।

 अब लोग कह सकते हैं कि केजरीवाल की ब्रांड वैल्यू इससे जुड़ी है इसलिए भीड़ चली आयी। लेकिन मेरे हिसाब से सचिन की "बिलियन ड्रीम्स" को भी ऐसा रिस्पांस नहीं मिला था, और सचिन तो पीढ़ियों पर राज करने वाला ब्रांड रहे हैं। तो फिर क्या खास है इस फिल्म में जो इसे लोगों के लिए इतना रुचिकर बनाता है।

 मेरे हिसाब से इस फिल्म की एडिटिंग इसकी जान है और यही इसे इतना खास बनाती है। मैंने शुरू में ही कहा कि इसे डॉक्युमेंट्री कहना इससे जुड़े लोगों की काबिलियत को काम आंकना होगा। मुझे नहीं लगता कि इसके निर्देशकों के पास किसी तरह के फुटेज की कमी रही होगी, लेकिन उन फुटेजों का कैसे और कहाँ इस्तेमाल करना है। कैसे फिल्म की कहानी को आगे बढ़ाना है, ये काम किया है इसकी एडिटिंग ने।

 फिल्म में एक दृश्य जो मुझे प्रभावित कर गया वो था केजरीवाल का सत्याग्रह फिल्म देखकर थिएटर से बाहर निकलना और एक टीवी रिपोर्टर को इंटरव्यू देना। उस दौरान कैमरा का एक फोकस केजरीवाल के अपनी शर्ट के कोने से साथ खेलने को दिखाता है। यह अपने आप में किसी फिल्म के नायक के चरित्र को स्थापित करने वाला दृश्य है।

 यह किसी फीचर फिल्म की तरह ही अपने नायक को गढ़ने का दृश्य है। फिर धीरे-धीरे फिल्म में योगेंद्र यादव का असर दिखना शुरू होता है, जो बताता है कि फिल्म में नायक है लेकिन एक प्रति नायक भी है। प्रति नायक शब्द का इस्तेमाल हूँ क्योंकि योगेंद्र खलनायक नहीं हैं।

 चूँकि नायक अरविन्द हैं तो फिल्म में खलनायक होना तो जरुरी है ही, और इसके लिए चुना गया उस समय दिल्ली की मुख्यमंत्री रहीं शीला दीक्षित को। उनके ऐसे फुटेज इस्तेमाल किये गए जो आपको बरबस हंसने पर मजबूर कर देंगे। फिर वह चाहें चुनाव प्रचार के दौरान दलेर मेहंदी के गाने पर उनका मेज थपथपाना हो या चुनाव नामांकन के दौरान अरविन्द के ऊपर जोक सुनाना। यह उनके चरित्र को फिल्म में पूरी तरह खलनायक तो नहीं लेकिन उसके लगभग बराबर ही रखता है।

 फिल्म बोझिल न लगे इसलिए इसमें एक मसाला फिल्म के लगभग सभी मसाले दिखते हैं। जब आप पार्टी की नेता संतोष कोली की मौत हो जाती है तो उसके अगले दिन की एक सभा का फुटेज फिल्म में इस्तेमाल  किया गया है। उस दृश्य में अरविन्द के चेहरे पर वह सारे भाव नज़र आते हैं जो इस घड़ी में हक़ीक़त में होने चाहिए और ये दृश्य फिल्म के नायक को दर्शक के करीब लाता है।

 ऐसा ही एक और दृश्य है जहाँ एक मोहल्ला सभा में एक महिला अरविन्द को पावर देने की बात करती है। इस फुटेज को फिल्म में रखने का निर्णय बताता है कि निर्देशक अपने चरित्र को कैसे गढ़ना चाहता है। फिल्म में एक दृश्य कुमार विश्वास और अरविन्द के बीच हास-परिहास का भी है। यह हमारे नेताओं के बीच आम इंसान की तरह होने वाले हंसी मजाक के साथ-साथ उनकी एक मिथक छवि को तोड़ने का भी काम करता है।

 भारतीय समाज अपने नेता को इंसान मानने के लिए तैयार ही नहीं है। वह या तो कोई दैवीय पुरुष, शक्ति या परमावतार होता है, वह इंसान नहीं होता। इसलिए जब हम उनके लिए कहानी या फिल्म लिखते हैं तो वह "लार्जर देन लाइफ" होती है। एक समय में अरविन्द ने इस छवि को तोडा था और यह फिल्म उसी को आगे बढाती है। यह हमे हमारे नेताओं को अपने बीच का समझने में मदद करती है।

 और अंत में एक बात फिल्म बनाने वालों के लिए, हिंदी में "मुख्यमंत्री" सही शब्द है, "मुख्यामंत्री" नहीं जैसा कि फिल्म के अंत में लिखा दिखाया गया है।

फिल्म के निर्देशक विनय और खुशबू

सोमवार, 27 नवंबर 2017

कुछ यूँ बदल गयी हमारी खिलौनों की दुनिया

कनॉट प्लेस के डी ब्लॉक में राम चन्दर एंड संस का बोर्ड
 म सभी ने अपने बचपन में खिlलौनों के साथ वक़्त बिताया जरूर होगा। लेकिन इस बार मैंने वक़्त बिताया उस शख्स के साथ जो अपने जीवन के 62-64 साल इन खिलौनों के बीच बिता चुका है। पाँच पीढ़ियों से चल रही अपनी खिलौनों की दुकान में न जाने उसने कितने बच्चों के अरमान सजते देखें होंगे और कितनों के टूटते भी।

 हालांकि मैंने ये स्टोरी अपने काम के चलते की थी लेकिन ऐसा बहुत कुछ रह गया जो वहां कह नहीं पाया। दिल्ली के दिल कहे जाने वाले कनॉट प्लेस में अंग्रेजों के ज़माने की कई दुकानें हैं। इन्हीं में एक नाम ओडियन सिनेमा के बगल वाली राम चन्दर एंड संस का है।

 इसके बारे में कहा जाता है कि यह भारत की सबसे पुरानी खिलौने की दुकान है। लगता भी ऐसा ही है क्योंकि 1890 में शुरू हुई इस दुकान के अंदर आप जैसे ही दाखिल होंगे आपको लगेगा ही नहीं यह कनॉट प्लेस की ही कोई दुकान है।
अपनी उसी बेतरतीब टेबल के साथ वाली कुर्सी पर सतीश सुंदरा
 कनॉट प्लेस में जहाँ कांच के शोकेसों वाली दुकानें तमाम तरह के दीप आभूषण धारण किये मिलती हैं। इस दुकान को देखकर पहली नजर में आपको किसी गोदाम में जाने की अनुभूति होगी। सब सामान इधर-उधर बेतरतीब सा पड़ा है। इन्हीं के बीच में दाहिने तरफ एक दराजों वाली टेबल है जिस पर एक कम्प्यूटर है और ढेर सारा सामान भी साथ ही बगल की कुर्सी पर कोई 70-75 साल बुजर्ग बैठा है।

यह बुजुर्ग व्यक्ति सतीश सुंदरा हैं जो इस दुकान से जुड़े परिवार की चौथी पीढ़ी से हैं। करीब आठ साल की उम्र में दुकान पर बैठना शुरू कर चुके सतीश अभी अपने बेटा-बहू के साथ मिलकर इस दुकान को चलाते हैं।

 दुकान पर बैठने की अपनी शुरुआत के बारे में सतीश बड़े रोमांच के साथ बताते हैं,
''मेरे परिवार में मारवाड़ी माहौल था। इसलिए मैं सात—आठ साल की उम्र से ही दुकान पर बैठने लगा। तब से अब तक मैंने खिलौनों की इस दुनिया को बड़े नजदीक से बदलते देखा है।"
 बकौल सतीश 1940 के दशक में भारत में ज्यादातर खिलौने ब्रिटेन-अमेरिका से आते थे। तब खिलौनों में रेलगाड़ियां अहम होती थीं। इसमें भी सबसे ज्यादा जर्मनी की गाड़ियों को पसंद किया जाता था। मुझे खुद एक इलैक्ट्रानिक रेलगाड़ी बहुत पसंद थी। इसके अलावा ब्लॉक आपस में जोड़ने वाले खिलौनों का ही विकल्प हमारे पास होता था।

 हमारे परिवार की कुल पांच दुकानें थी। पहली दुकान अम्बाला में खुली और 1935 में यह यहां कनॉट प्लेस में आ गयी। पिताजी और उनके भाइयों के बीच बाद में ये दुकानें बंट गयी और फिर मेरे और भाई के बीच भी बंटवारा हुआ। सबने अपनी दुकानें बेच दी। शिमला और कसौली में भी हमारी दुकान थी लेकिन अब बस यही एक बची है।

  बकौल सतीश खिलौनों की दुनिया में अमेरिका और ब्रिटेन के दबदबे को चुनौती जापान ने दूसरे विश्वयुद्ध के बाद देनी शुरू की। 1950 के दशक में जापान ने कबाड के टिन से खिलौने बनाने शुरु किए। उसने अंतरिक्ष विज्ञान से जुड़े खिलौने बनाने शुरू किये। हम खुद 1969 तक इनका भारत में बेरोकटोक आयात करते थे। लोग इसे बहुत पसंद करते थे। बाद में 1970 में सरकार ने कई तरह के आयात पर रोक लगा दी और यह रोक 1980 के दशक तक जारी रही।

 वर्ष 1980 के दशक में आयात तो खुल गया लेकिन तब तक खिलौने जापान से ताइवान चले गए। तभी कई तरह के इलेक्ट्रॉनिक खिलौने आये। बाद में 2000 के बाद से चीन ने इसमें अपनी साख बनायी है। लेकिन एक बात जो यूरोपीय खिलौनों में थी तो वो थी ''दादा खरीदे, पोता बरते'' लेकिन अब यह बात कहीं नहीं बची।

 बीते के दिनों को याद करते हुए सतीश कहते हैं कि तब का दौर और था। हमारे पास खिलौनों के साथ खेलने का वक़्त होता था। मेले-तमाशे होते थे, आँगन और गलियों में भी बच्चे खेला करते थे। अब तो पार्कों में भी जाने पर बच्चे खेलते नहीं दिखते। मेरे भी जानकारी में कई बच्चे हैं जिन्हें मोबाइल वगैरह पर खेलते हुए देखकर बड़ा कष्ट होता है।

 बड़े कौतुहल के साथ सतीश बताते हैं कि हर खिलौना एक शिक्षा देता है। किसी भी बच्चे के शारीरिक, मानसिक और तार्किक विकास में खिलौनों की भूमिका होती है। बचपन में मेलों में मैंने एक खेल देखा है जिसमें एक इलैक्ट्रॉनिक तार से एक छल्ले को पार निकालना होता था। सोचिए यह बच्चों को कितना ज्यादा एकाग्र बनाता था। यह बात बताते हुए उनकी आँखों में एक अजब तरह की चमक उभर आती है।

 आजकल ​िखलौनों की जगह फिल्मों से जुडी मर्चेंडाइज ने ले ली है। इनके आने से एक तो बच्चों में थोड़ी हिंसक प्रवृत्ति बढ़ने लगी और हमारे खुद के चरित्रों और नायकों को हम अपने बच्चों के जीवन में वह स्थान नहीं दिला पाए जो सुपरमैन वगैरह को मिला।

 एक और बात जो मुझे कचोटती है, वो यह कि आजकल माँ-बाप बच्चे को खिलौना तो दिला देते हैं। लेकिन उसके साथ समय नहीं बिताते। ना ही उस खिलौने को लेकर बच्चे के साथ खेलते हैं। देखा जाए तो हमारे बच्चे आजकल बहुत अकेले हो गए हैं।

सतीश जी की बहू दीप्ति दिव्या
 हमारी दुकान का विशेष नियम है कि हम बच्चे को वही खिलौना देते हैं जो उसकी उम्र के हिसाब से सही हो।  सिर्फ बेचने के लिए खिलौना हम नहीं बेचते। हम चाहते हैं कि बच्चे अपने खिलौने का पूरा मज़ा उठायें ताकि उसका बचपन भी यादों से भरा हो। 

रविवार, 1 अक्टूबर 2017

कुछ छोड़ आते हैं हम...

सच है ये...
छोटे शहर से आकर...
इन बड़े शहरों को...
जवाँ बनाते हैं हम,

पर तुम क्या जानो...
इन पलों के लिए...

न जाने कितने पलों को... 
बूढ़ा बनाते हैं हम,

एक ही समय में...
बड़े शहर की ये जवानी...
कई छोटे शहरों के समय से...
अपनी भूख मिटाती है...
उस समय में...
कितने बड़े शहर बनाते हैं हम,

दिवाली पर हमारी भी...
माँए राह देखती है...
लेकिन दिए यहीं जलाते हैं हम...
यहाँ के आशियानों की रौशनी के लिए...
खुद घर के दिए बुझा आते हैं हम,

इंतज़ार तो उसे...
होता है हर त्यौहार...
पर कभी-कभार ही...
घर जाते हैं हम...
यहाँ होली की रंगत के लिए...
घर बेरंग छोड़ आते हैं हम,

दफ़्तर-कॉलेज में...
साथ रहकर भी...
रहते बाहरी ही हैं...
कभी चिंकी, कभी बिहारी बन...
यूँही भीड़ में पिट जाते हैं हम,

सपने यहीं सजते हैं...
इसमें हम क्या करें...
कुछ सपने सँजोए...
संदूक उठाये चले आते हैं हम,

किराये के कमरों में...
लड़कपन से जवानी तक...
दोस्ती लफ्ज़ के...
मायने तुम्हें समझाने को...
बचपन की दोस्ती को...
खूँटी से दीवार पर...
टांक आते हैं हम,

तुम क्या जानों...
इधर की जवानी के लिए...
अपने घर पर...
बूढ़ी आखें निहारते...
छोड़ आते हैं हम,

फिर छोटे शहर को...
जवाँ रखने के लिए...
गाँवों में कुछ और...
बुढ़ापे छोड़ आते हैं हम,


अच्छे दिन...

पहले वो हिंदू-मुसलमान करेंगे,
फिर तुम्हें आपस में लड़ाएंगे,
इसकी आदत डलवाएंगे,
संवेदनशीलता को रौंदेगे,
एक-दूसरे की जान का,
प्यासा बनाएंगे,
फिर किसी दिन तुमसे,
किसी का क़त्ल करवाएंगे,
फिर एक दिन तुम्हें ही,
निर 'आधार' बता कर,
तुम्हें देश का दुश्मन बताएँगे,
गरीब को अमीर का हक़
मारने वाला बताएँगे,
फिर एक दिन सेना आएगी,
जो तुम्हें रौंद जाएगी,
इसे वो देशहित जताएंगे,
सच कहता हूँ "मित्रों'
तब तुम्हें ये "अच्छे दिन"
बहुत याद आएंगे...

गुरुवार, 7 सितंबर 2017

कहने को बस यही है...

 ल शिक्षक दिवस था तो यह बात मैं कल भी लिख सकता था। लेकिन एक डर था कि कल की भीड़ में ये बात कहीं खो जाती। वैसे आजकल डर कई तरह के हो गए हैं, फिर वह चाहे अपनी बात कहने का डर हो, या सोशल मीडिया पर ट्रोल किये जाने का या सरकार से सवाल पूछने का। खैर इन सभी के बारे में फिर कभी बात की जा सकती है क्योंकि ये बात मैं आज करना ही नहीं चाहता... 

 बचपन में अक्सर हम अपने शिक्षकों से ही या आस-पास के लोगों से या बड़ों से ये सुना करते थे कि एक शिक्षक के जीवन का सबसे अच्छा पल क्या होता है...? जवाब होता था कि जब किसी शिक्षक का पढ़ाया कोई विद्यार्थी बहुत सालों बाद उससे मिलता है और अपने जीवन में बहुत सफल होने के बावजूद शिक्षक के पैर छू लेता है तो शिक्षक का सीना गर्व से फूल जाता है। 

 हमारी फ़िल्में भी शिक्षक जीवन के इस पहलू को दिखाती रही हैं। हाल के वर्षों में आयी "दो दूनी चार" और "चॉक एंड डस्टर" नाम की दो फ़िल्में मुझे याद हैं जिनमें यही बात दिखाई गयी है। लेकिन मेरा मानना है कि यह इस बात का केवल एक पहलू है।

 यदि कोई छात्र सफल होकर अपने शिक्षक का सम्मान करता है तो यह उस शिक्षक की निश्चित सफलता है। लेकिन उसके उन्हीं छात्रों में से कोई समाज का विनाशक हो जाता है तो क्या उसके पैर छूने से भी उस शिक्षक का सीना गर्व से फूल जाता होगा...?

 मेरा मानना है कि ये उस शिक्षक की असफलता तो है लेकिन उससे भी बड़ी ये उस छात्र की असफलता है कि वह अपने शिक्षक के लिए सम्मान का कारण नहीं है। यहीं पर एक छात्र की सफलता का प्रश्न भी खड़ा हो जाता है। 

 हमारे समाज की विडंबना भी यही है कि हम एक पक्ष से सारी जिम्मेदारियां निभाने को कहते हैं लेकिन हमारी दूसरे पक्ष के प्रति क्या जिम्मेदारी है, इस सवाल पर चूं तक नहीं करते। महिला-पुरुष संबंधों के दायरे में आप इस बात को देखेंगे तो ज्यादा बेहतर तरीके से समझ पाएंगे। तो यहाँ प्रश्न एक शिक्षक के प्रति विद्यार्थी की सफलता का है। इस छोटे से वाकये से समझाना चाहता हूँ... 
 "पिछले साल मैं अपने कॉलेज के पुरातन छात्र सम्मलेन में गया था। करीब 7-8 साल बाद कॉलेज जाना हुआ। तो अपने पुराने दोस्तों, शिक्षकों से मिलकर खुश था। सब यादों को ताज़ा कर रहे थे कि कौन क्या किया करता था ? कौन पढ़ाई में अव्वल था तो कौन किसी और काम में ?
इसी दौरान मेरे हिंदी के शिक्षक भास्कर रोशन वहां आये और वर्तमान वर्ष के छात्रों से मेरा परिचय कराने लगे।
भास्कर सर ने मुझे सिर्फ कॉलेज के फर्स्ट ईयर में हिंदी पढ़ाई थी। वो भी मेरा सिर्फ क्वालीफाइंग पेपर था। लेकिन उन्होंने जब मेरा परिचय कराया तो मेरे पास प्रतिक्रिया देने के लिए शब्द नहीं थे क्योंकि मुझे अंदाज़ा नहीं था कि उन्होंने मुझे इस तरह से याद रखा होगा। 
उनके शब्द थे, " ये मेरे उन छात्रों में से एक है जिसे मैंने शायद अपने जीवन में आज तक सबसे ज्यादा अंक दिए हैं। जबकि ये मुझसे सिर्फ क्वालीफाइंग पेपर ही पढ़ा करता था।"
 उस समय मुझे लगा कि ये शायद एक छात्र के तौर पर मेरी आंशिक ही सही लेकिन एक सफलता तो है।

 मुझे अहसास हुआ कि वाकई इस बात में कितनी गहराई है कि आप अपने शिक्षक को कैसे याद रखते हैं उससे बड़ी बात है कि वो आपको एक सफल छात्र के रूप में यद् रखता है जो समज को गढ़ रहा है या एक ऐसे छात्र के रूप में याद करता है जो समाज का विनाशक बन चुका है। 

 मेरा मानना है कि शिक्षक अपनी हिस्से का काम उसी दिन पूरा कर देता है जब वह अपने छात्र को डर से लड़ने की शक्ति दे देता है। उसके बाद जिम्मेदारी छात्र की होती है कि वह उस शक्ति का इस्तेमाल अपने शिक्षक का सीना गर्व से फुलाने में इस्तेमाल करना चाहता है या उसके मस्तक को शर्मसार कर झुकाने में...
भास्करोदय...
 वैसे भास्कर सर की दो बातें मुझे हमेशा याद रहती हैं-

"लिखते समय शब्दों का इस्तेमाल बहुत कंजूसी से करना चाहिए।"
"गुस्से को दबाना चाहिए ,ना कि सवालों को। "

शुक्रवार, 28 अप्रैल 2017

सफर, जीवन के एक दशक बीतने का

अब मैं ऐसा नहीं दिखता... 

 ज जब मैं यह लिख रहा हूँ तो दिल्ली आये हुए 10 साल का वक़्त बीत चुका है। इस दौरान किशोर से जवां होने का सफ़र इसी दिल्ली में पूरा किया है। हालाँकि अभी भी मैं बच्चा बना रहना पसंद करता हूँ और इसलिए कभी-कभी बच्चों की तरह हरकतें करता हूँ लेकिन मैं उसे गलत नहीं मानता। मुझे लगता है कि मेरा यही बचपना मुझे इस हीन-भावना से भरी दुनिया में थोड़ा अलहदा बनाता है क्योंकि अपनी भावुकता को मैंने मरने नहीं दिया है, हाँ लेकिन उसे छिपाना मैंने सीख लिया है।

 जब इस 10 साल के सफर को पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है कुछ भी तो नहीं बदला लेकिन बहुत कुछ बदला है। बहुत से अनुभव अच्छे-बुरे दोनों तरह के रहे, रिश्तेदारों, दोस्तों, बॉस, सहकर्मी  के रूप में कई तरह की पूँजी जमा की लेकिन आज ख़ुशी के मौके पर बात सिर्फ अच्छी यादों की क्योंकि बुरी यादों की दास्ताँ लम्बी होती है।

 इस 10 साल में सबसे बड़ा बदलाव मेरे छोटे भाई का मुझसे कई साल बड़ा हो जाना है क्योंकि उसने घर की जिम्मेदारियां संभाल ली हैं। घर पर बड़ी से बड़ी घटना के बारे में मुझे तब पता चलता है जब वो निबट जाती हैं। उसके भीतर त्याग की जो भावना मैंने बचपन से देखी वो अब एक अलग पायदान को पार कर चुकी है और शायद मैं अब तक उसका अल्पांश ही अपना पाया हूँ, हाँ लेकिन यह यात्रा अभी जारी है।

 हम दोनों के बीच भाई-भाई वाला स्वार्थ तो पहले भी नहीं था और अब वह ज़रा भी नहीं बचा क्योंकि बचपन में ही हम इतना झगड़ा सुलझा चुके हैं कि अब आपस में लड़ने के लिए भी वक़्त नहीं है हमारे पास। हुआ बस यह है कि वो मेरा बड़ा भाई बन गया है और मैं उसका छोटा।

 दिल्ली आने के बाद कई रिश्तेदारों, दोस्तों की मदद मिली जिसमें पार्थ जैसा दोस्त भी मिला। कॉलेज में एक वही था जिसने इस बात पर गर्व करना सिखाया कि भाषा का सवाल महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि आपकी काबिलियत मायने रखती है।

 हमारे बीच दोस्तों की तरह कई झगडे हुए, सुलह हुई लेकिन बस स्वार्थ कभी नहीं आया। हालाँकि एक झगड़ा है जो मेरे मन में अटका रह जाता है लेकिन हम दोनों को ही ये मालूम है कि वो हमारी बढ़ने की उम्र थी। किशोर से जवां होने की उम्र। हम दोनों अब ज्यादा मिल नहीं पाते, ज्यादा बात भी नहीं करते। लेकिन उसकी एक बात है जो मुझे याद रहती है ,वो तब जैसा था आज भी वैसा ही है। अपने जीवन में आज तक मैंने उससे ज्यादा जमीन से जुड़ा व्यक्ति नहीं देखा। शायद मैं भी कभी फिसल गया हूँ लेकिन वो नहीं फिसला।

 अभी मुझे उसके सफल होने है इंतज़ार है और अब मैं उसे लेकर थोड़ा प्रोटेक्टिव भी रहता हूँ लेकिन मुझे सच मैं नहीं पता कि उसकी सफलता की खबर मिलने पर मैं रोऊँगा या खुश होऊंगा क्योंकि बहुत ज्यादा खुश होना भी रुला ही देता है।

 रिश्तेदारों में रिंकू मामा जैसा गाइड और राजू मामा जैसा लोकल गार्जियन यहीं दिल्ली में मिला। नीरू मामी, रितु मामी और प्रीति मौसी से मैं दोस्त की तरह कुछ भी बात कर सकता हूँ। शुभम और उत्सव की वजह से दस साल में छोटे भाई की याद कम आई। जिगीषा मेरे सामने पैदा हुई और स्कूल में पहुँच गयी और वैशाली-मयंक स्कूल से कॉलेज में इन्हीं 10 साल में आये।

 ग्रेजुएशन के बाद जब आगे बढ़े तो प्रमोद जैसा दोस्त मिला। एक ऐसा दोस्त जो सुपरमैन की तरह गुमनाम रहता है लेकिन आप एक बार मदद के लिए बुलाओ तो चला आएगा। एक और अजीब सा दोस्त मिला राहुल जो बिलकुल ही अलहदा मेरे जैसा, जो मेरी ही तरह बचपना करता और कभी-कभी बड़े भाई की तरह रास्ता भी दिखाता।

 इन 10 सालों में जो एक और बात बदली वो मुझमें और मेरे शहर की सोच में आया एक सकारात्मक बदलाव है। इस वजह से स्कूल के समय कुछ दोस्त बिछड़ गए, कुछ दूर हो गए और कुछ साथ रह गए।

 कहते हैं कि जिन लोगों के स्कूल के दोस्त जीवनभर उनके साथ होते हैं वो बहुत भाग्यशाली होते हैं तो मैं वैसा ही सौभाग्यवान हूँ जिसके पास दिल्ली में 10 के दौरान स्कूल के अच्छे दोस्त रहे और वो और ज्यादा घनिष्ठ हो गए।

 कहानी शुरू होती है अनुज और विवेक से और फिर तीनों सौरभ के साथ होते हुए कृष्ण मोहन, सजल एवं अमितेष पर ख़त्म होती है। इनके साथ होने की वजह यह नहीं है कि इनकी सोच मेरे जैसी है या इनकी और मेरे शहर की सोच में जो बदलाव आया है ये भी उसी तरह बदल गए हैं। बल्कि इनके साथ होने की वजह बस इतनी है कि यह मेरे सोच के बदलाव को अपना पाए हैं।

 इसी 10 साल के दौरान नौकरी भी शुरू हुई और नए लोगों से मिलने का हुनर भी सीखा।

 हिंदुस्तान में काम करने के दौरान सबसे पहले सीनियर के तौर पर पूनम ने मुझे काम में ईमानदारी और वक़्त की अहमियत समझाई और गोविंद सिंह सर ने अवसरों को नहीं गंवाने की सलाह के साथ जीना सिखाया। बाद में जब नव भारत टाइम्स पहुंचा तो शिल्पा जैसी एक अच्छी सहकर्मी और दोस्त मिली। अनु हम दोनों की शायद अब तक की सबसे बेहतरीन बॉस रही है। हाँ हम दोनों जब साथ काम करते थे तो उसकी बुराई करते थे लेकिन हम हीरों को तराशने वाली जौहरी वही थी।

 इसके बाद नौकरी बदल गयी और अर्पणा मिली जो सच में बड़ी बहन ही है। वो मुझे मारती है तो दुलारती भी है। उसकी बुराई कोई करता है तो मेरे अंदर का हुमायूं जाग जाता है। हालांकि अपनी लड़ाई लड़ने में वो झाँसी की रानी से कम नहीं है, इसलिए मुझे किसी तरह के लाव-लश्कर की अब तक जरूरत नहीं पड़ी है। हम दोनों को जो बात कॉमन बनाती है वो ये कि हम दोनों जानते हैं कि हम परफेक्ट नहीं है क्योंकि वो कोई नहीं हो सकता और हम दुनिया के सामने परफेक्ट होने का ढोंग भी नहीं करते।

 इस नई नौकरी के दौरान मनीष, प्रणव जैसे दोस्त भी मिले जिनके साथ अलग-अलग तरह का कॉम्बिनेशन है। अंकित, नोमान, भास्कर और कृतिका भी अच्छे दोस्तों में हैं।

 परवाह करने वाले वैभव और अनवर भाई भी हैं। इनमें भी वैभव भाई के साथ बिल्कुल बड़े भाई जैसा रिश्ता है तभी तो मैं कई बार बहुत उलूल-जलूल हरकतें करता हूँ लेकिन वो कभी बुरा नहीं मानते। बिल्कुल बड़े भाई की तरह समझाते हैं। मैं भी क्या करूँ घर पे ठहरा मैं बड़ा, तो हमेशा आठ-आठ कजिन्स पे हुकुम चलाने की आदत सी बन गई है ऐसे में अभी छोटों वाली नम्रता सीख रहा हूँ क्योंकि ज़िंदगी सीखते रहने का ही तो नाम है।

 एक और सीनियर हैं जो बिलकुल माँ की तरह ख्याल रखती हैं। साथ ही जलीस सर भी इसी दफ्तर में मिले जिनके साथ का अनुभव पहले भी साझा कर चुका हूँ।

 तो अब जब मैं 10 साल की इस यात्रा पर नज़र डालता हूँ तो पाता हूँ कि ये सारी पूँजी मैंने यहीं तो जमा की है जिसमें रिश्ते हैं, दोस्ती है और इतने सारे अच्छे अनुभव हैं। हालाँकि मुझे पता है कि यह स्थायी नहीं हो सकता है लेकिन फिर भी जब तक मेरी संपत्ति यही है और जब नहीं रहेगी तो भी कोई मलाल नहीं होगा क्योंकि इसमें कोई स्वार्थ नहीं है और जहाँ स्वार्थ नहीं होता वहां अपेक्षा भी नहीं होती किसी तरह के बंधन की...

 तो यह रहा सफर तब से अब तक का, जीवन के एक दशक बीतने का।

अब ऐसा दिखता हूँ...

बुधवार, 26 अप्रैल 2017

बेग़म जान : बेहतरीन हुनर की बरबादी

 हुत दिनों से कुछ लिखा ही नहीं या यूँ कहें कि लिखने का मन ही नहीं। लेकिन जब आज सोचा कि कुछ लिखा जाए तो ख्याल आया कि इसकी शुरुआत किसी फिल्म से क्यों न की जाये?


 सोच तो रहा था कि "बेग़म जान" पहले ही देख लूंगा लेकिन जब आज देखा तो लगा कि सही किया जो इसे पहले नहीं देखा। हमारे यहाँ किसी के हुनर को बर्बाद कैसे किया जाता है, इसकी बानगी है ये फिल्म। कई बड़े नाम इस फिल्म में हैं जैसे नसीरुद्दीन शाह, आशीष विद्यार्थी , रजित कपूर, राजेश शर्मा, इला अरुण और विद्या बालन, जिन्होंने तरह-तरह के किरदार में अपने अभिनय का लोहा मनवाया है। लेकिन 'बेग़म जान' की लचर कहानी इनकी इस काबिलियत का ठीक से इस्तेमाल ही नहीं कर पाती। 

 फिल्म कहानी इतनी है कि हिंदुस्तान और पाकिस्तान का बंटवारा हो गया है। दोनों देशों के बीच सीमा रेखा खींची जानी है जो "बेग़म जान" के घर के बीच में से निकलती है। बेग़म जान के किरदार में विद्या बालन हैं और वो एक तवायफ़खाना की मालकिन है जिसके बीच से ये सीमा गुजरनी है। 

 फिल्म की इतनी पटकथा समझ में आती है और जायज़ भी लगती है। इतनी सी  कहानी को लेकर अगर चंद्रप्रकाश द्विवेदी जैसा कोई निर्देशक होता तो "पिंजर" जैसी शानदार फिल्म बना सकता था।

 लेकिन निर्देशक सृजित मुखर्जी बस यंही से अपनी कहानी से भटक जाते हैं जिसमें न तो वेश्याओं की संवेदनाएं हैं, न विभाजन की त्रासदी का असर और न ही अपने कोठे को बचाने के लिए जान दे देने के पीछे का तर्क, बस सब मरते जा रहे हैं , लेकिन क्यों, इसका जवाब कहीं भी फिल्म में नहीं हैं। 

 अगर फिल्म में विद्या बालन के दो चार संवाद के अलावा कुछ देखने लायक है तो बस आशीष विद्यार्थी और रजित कपूर के आधे-आधे चेहरों के साथ शूट किये गए कुछ दृश्य जिसके भाव भी अच्छे हैं और सिनेमाटोग्राफी भी बढ़िया है। यहाँ तक कि नसीर भी कोई असर नहीं छोड़ते। इससे बेहतर नवाब या राजा का किरदार उन्होंने "डेढ़ इश्क़िया" में किया है। इससे पहले हमने "इश्किया" में नसीर यार विद्या को साथ देखा है और वो दोनों किरदार आपके फलक पर आज भी ज़िंदा हैं लेकिन यहाँ दोनों ही फीके हैं।

 बाकी किसी किरदार में कोई जान नहीं है और न ही वो कोई प्रभाव छोड़ने वाला है। सिर्फ विद्या किसी तरह अपने कन्धों पर फिल्म को ढोती हुई नजर आ रही हैं। चंकी पांडे ने यूँ तो फिल्म में खलनायक की भूमिका निभाई है लेकिन  सिरहन नहीं पैदा करता बल्कि उन पर उनकी हाउसफुल सीरीज का छिछोरापन ही हावी दिखता है।

हालाँकि लाड़ली के किरदार में ग्रेसी का कपड़े उतारने वाला दृश्य पूरी तरह से अचंभित करने वाला है जहाँ उसकी आँखें अभिनय कर रही हैं। 

 इनमें से किसी की भी अभिनय क्षमता पर कोई सवाल नहीं हैं लेकिन अच्छे हुनर की बर्बादी ऐसे ही की जाती है। बहुत साल पहले "चाइना गेट" नाम से एक फिल्म आयी थी, तब मैं बहुत छोटा था तो उतनी समझ नहीं थी लेकिन जब हाल में उसे मैंने दुबारा देखा तो समझ में आया कि वो फिल्म कम बल्कि एक वृद्धाआश्रम ज्यादा थी।

 उस फिल्म में भी नसीर के अलावा अमरीश पुरी, जगदीप, ओमपुरी, डैनी जैसे अपने दौर के मंझे कलाकार थे। लेकिन उस फिल्म में नया कुछ भी नहीं था, क्योंकि हम इन कलाकारों को उसी रूप में देखने के आदि थे। इसी तरह "बेग़म जान" इन बड़े अभिनेताओं की नुमाइश है जो कुछ कर नहीं रहे हैं लेकिन बस कर रहे हैं। हम ये क्यों नहीं समझते कि अच्छी फिल्म अच्छी कहानी पे बनती है न की यूँ अभिनेताओं के जमावड़े से। 

 "बेग़म जान" की कमी सिर्फ उसकी लचर कहानी नहीं है, बल्कि फिल्म ट्रीटमेंट के हिसाब से भी ख़राब है। फिल्म में पहनावे और भाषा पे कोई ध्यान नहीं है। यदि वो होता तो शायद फिल्म को झेल पाना थोड़ा और आसान होता। विद्या अकेले के अलाव निर्देशक को सबको जिम्मेदारी देनी चाहिए थी और खुद भी थोड़ा ईमानदारी से काम करते तो फिल्म अच्छी होती। 

 अब देखना न देखना आपकी मर्जी है। मुझे तो ये ऐसी ही लगी। वैसे अगर आपने "पिंजर" न देखी हो तो एक बार देख जरूर लेना। 

बुधवार, 26 अक्टूबर 2016

कितना कुछ है गोलगप्पों के पास...

 मेरे हिसाब से गोलगप्पों को भारतीय खानपान में सबसे ऊपर रखना चाहिए क्योंकि स्वाद की पूरी की पूरी संस्कृति का समागम है इनमें। आप जहाँ भी जाएं गोलगप्पों का स्वाद उसी देस के रूप रंग में ढल जाता है। तभी तो "क़्वीन" फिल्म में भी जब कंगना रनौत को भारतीय खाने से रूबरू कराने की चुनौती मिलती है तो वो पूरे जी-जान से गोलगप्पे ही बनाती हैं।

 गोलगप्पे इन्हें दिल्ली की भाषा में कहा जाता है, लेकिन भारत में इसे अलग-अलग जगहों पर गुपचुप, पानी के बताशे, पानी की टिकिया और फुचकु जैसे न जाने कितने नामों से जाना जाता है। कुछ लोग इसे खाते हैं तो कुछ इसे पीते हैं।

 वैसे ये होती आटे और सूजी से बनी पूरियां ही, बस इनका मिज़ाज़ थोड़ा कड़क होता है। पूरियां तो नरम पड़ जाती हैं लेकिन ये खट्टा या मीठा पानी भरने के बाद भी करकरी ही बनी रहती हैं। 

हज़रतगंज के अजय भाई
 मेरा ये निजी मत है कि किसी उत्तर भारतीय शहर के स्वाद का अंदाज़ वहां के गोलगप्पों से ही समझ आ जाता है। अभी हाल ही में मैं जब खजुराहो गया तो मैंने सबसे पहले गोलगप्पे ही खाये। वहां इनमें आम स्वाद भी नहीं था तो शहर में क्या ख़ाक अच्छा मिलने वाला था खाने को? हुआ भी यही वहां कुछ भी ऐसा नहीं मिला खाने को जो उस शहर की रंगत का एहसास कराए।

 यूँ तो मैंने कई शहरों के गोलगप्पे खाये हैं लेकिन लखनऊ के हज़रतगंज के गोलगप्पों का जो नवाबी अंदाज़ है वो अपने आप में स्मृति में रह जाने वाला है। सितंबर में मैं जब लखनऊ गया तो मोती महल का स्पेशल समोसा खाने के बाद भी मेरा मन गोलगप्पे में ही अटका था क्योंकि इनका स्वाद पहले भी एक-दो बार ले चुका था। थोड़ा बाजार की तरफ बढ़ा तो साहू सिनेमा के सामने अजय भाई मिल गए, और मेरी गोलगप्पे खाने की तम्मना पूरी हो गयी।

मोती महल का स्पेशल समोसा


 लखनऊ के गोलगप्पों की खास बात उनमें भरा जाने वाला चटपटा पानी है। आम तौर पर दूसरे शहरों में गोलगप्पों के साथ खट्टा और मीठा पानी ही मिलता है लेकिन लखनऊ में आपको इसकी पांच से छह किस्में मिल जाएंगी। इसमें भी खास है इसे खिलाए जाने का क्रम। आप अपनी सुविधा के हिसाब से तीखे से शुरू कर मधुर या मधुर से तीखे स्वाद की तरफ रूबरू हो सकते हैं।

 अब ये ज़ायका इतना इंतिख़ाबीपन तो लिए होगा ही, नवाबों के शौक से जो पला है ये शहर। फिर अवध का क्षेत्र है तो "जी की रही भावना जैसे, प्रभु मूरत देखी वो वैसी"।

 लखनऊ के गोलगप्पों में जब पानी भरा जाता है तो क्रम के हिसाब से मीठा पानी बीच में ही कंही होता है। और ये अजय भाई का नहीं बल्कि सभी खोमचे वालों का तरीका है। इसकी वजह अजय भाई ने बताई नहीं लेकिन मैंने ही अंदाज़ा लगाया। मेरे हिसाब से बीच में मीठा पानी होने की वजह, हर तरह पानी के स्वाद का असल एहसास करना हो सकती है। अब अगर आप तीखे पानी से खाना शुरू करें तो आपकी जीभ की इन्द्रियां बहुत सक्रिय हो जाएँगी ऐसे में आगे जो पानी हैं उनका स्वाद कैसे आएगा ? इसलिए बीच में  मीठे पानी का गोलगप्पा खाने से जीभ को शांति मिलेगी और आगे के दूसरी तरह के पानी का ज़ायका अच्छे से उभरकर आएगा। ऐसे ही अगर दूसरी तरफ से शुरू करते हैं तो भी जीभ को वापस नए टेस्ट के मोड में लाने के लिए ही मीठे पानी का उपयोग होगा।
"गोलगप्पे से मेरे बचपन की भी एक याद जुड़ी है। मेरा ननिहाल मथुरा में है। तब छुट्टियों में नानी के घर जाने का बड़ा कौतूहल होता था। नानी के घर के पास शाम को एक गोलगप्पे वाला आता था। हम सब बच्चे उसे घेर के खड़े हो जाते थे। उसके पानी में एक अलग तरह का तीखापन होता था जो सीधा गले में लगता था। उसके पानी में टाटरी होती थी तो वो गज़ब का खट्टा होता था। पुदीना और हरी मिर्च की चटनी में काली मिर्च का हल्का सा स्वाद उस पानी को इतना अलग बना देता था कि मुझे आज भी याद है। उसके गोलगप्पों के पानी में इस काली मिर्च के प्रयोग से ही मथुरा के खाने का  आप अंदाज़ा लगा सकते हैं। आज भी मथुरा के असल खाने में आपको काली मिर्च का बहुत संतुलित प्रयोग देखने को मिलेगा। 
अच्छा उस गोलगप्पे वाले की एक और खास चीज मुझे याद है। वो उसमें मटर के साथ एक तली कचरी डाला करता था। कचरी का स्वाद हल्का सा  कड़वा होता है जो खट्टे पानी के साथ मिलकर अनोखा प्रभाव छोड़ता है। खैर तब हम छोटे थे तो बहुत ज़िद के बाद कचरी वाला एक गोलगप्पा खाने को मिलता था।"
  अब मथुरा जाता हूँ तो वो गोलगप्पे वाला नहीं मिलता। लेकिन मैं हूँ चाट का शौक़ीन तो वहां की घीया मंडी और मंडी रामदास की चाट का जवाब ही नहीं है।

 मथुरा के नजदीक ही आगरा में अगर आपको गोलगप्पे और चाट का स्वाद लेना है तो बेलन गंज का बाज़ार घूम आइये। दिल खुश हो जायेगा वहां की चाट और गोलगप्पे खाकर।

 मेरे गृहनगर झाँसी में भी गोलगप्पे का एक अलग मिज़ाज़ है। वहां पर उनमें भरे जाने वाले उबले आलू अच्छे से लाल मिर्च के मसाले में लपेटे जाते हैं जिन पर कच्चा प्याज़ लगाकर फिर गोलगप्पे में खट्टा पानी भरकर खाया जाता है।

 इस कहानी का अंत करते हुए एक बात और बताता हूँ। दिल्ली को छोड़कर आप इन जगहों में से कंही भी गोलगप्पे खाइये आपको पानी में मीठी चटनी खुद से नहीं मिलेगी, उसके लिए आपको गोलगप्पे वाले से कहना पड़ेगा। वंही दिल्ली में आपको "गोलगप्पे वाले भैया" से मीठा नहीं लगाने के लिए कहना होगा।

मोती महल हज़रतगंज

मंगलवार, 13 सितंबर 2016

दो रूपये का प्लेटफाॅर्म टिकट

 स दिन मैंने उसके लिए सिर्फ एक दो रूपये का प्लेटफाॅर्म टिकट ही तो खरीदा था बस, आठ साल करीब बीत चुके हैं इस घटना को। वो टिकट भी मैंने उसके लिए सिर्फ इसलिए लिया क्योंकि उसके पास खुले रूपये नहीं थे और उसे एक रिश्तेदार को गाड़ी में बिठाने जाना था। इसके अलावा हमारी कोई जान-पहचान नहीं थी तब।

 वो अपनी बुआ को छोड़ने आया था। उनकी और मेरी सीट आस-पास ही थी तो इस वजह से मेरी और जतिन की गाड़ी में ही थोड़ी बातचीत हुई। फिर जब ट्रेन चलने लगी तो वो मुझसे यह कहकर चला गया कि बुआजी को ग्वालियर उतारकर मैं उसे फोन कर दूं। मैंने ऐसा ही किया और उसके बाद बात आयी-गयी हो गई।

 उसके बाद मेरी और जतिन की एक-दो बार और बातचीत हुई। फिर एक बार वो राजौरी गार्डन में मेरी किराये की कोठी पर मिलने भी आया और उसके बाद हम अपने काम-धाम में व्यस्त हो गए। बस फेसबुक पर हमारी कभी-कभी राम-राम हो जाती थी, इससे ज्यादा मिलना-जुलना हो नहीं पाया।

 वैसे भी जतिन पुणे, कतर और भी ना जाने कहां-कहां काम के सिलसिले में गया तो मुलाकात तो वैसे भी संभव नहीं हो पायी। एक बार जतिन जब कतर से लौटकर आया तो ग्वालियर जाने से पहले उसने नयी दिल्ली स्टेशन पर मिलने के लिए बोला और मैं बस समय निकालकर पहुंच गया। उसके बाद हमारी करीब तीन साल बाद मुलाकात एक सफर में हुई जब मैं झांसी अपने घर और वो ग्वालियर अपने घर जा रहा था।

 आज मैं जब यह वृतांत लिख रहा हूं तो यह ख्याल मन में आ रहा है कि पिछले आठ सालों में हमारे बीच कुछ भी अनोखा नहीं घटा और एक सामान्य जान-पहचान का रिश्ता ही रहा। लेकिन फिर भी एक अलग तरह की घनिष्ठता है इस संबंध में, कम से कम मेरी ओर से तो है और जब मैं इसके पीछे की वजह टटोलता हूं तो मुझे लगता है कि इस दौरान शायद हमने आपस में एक-दूसरे से किसी भी तरह की कोई अपेक्षा नहीं रखी।

 आजकल के समय में संबंधों में अपेक्षाओं का बड़ा जंजाल देखने को मिलता है। दोस्ती से इतर वाले संबंधों में तो यह बड़े पैमाने पर दिखता है।

 जतिन और मेरे बीच सिर्फ सम्मान का भाव है, एक-दूसरे के व्यवहार के प्रति सम्मान। अपेक्षाएं कुछ भी नहीं, कम से कम मेरी ओर से तो बिल्कुल भी नहीं और शायद इसलिए यह मित्रता कायम है।
हमारे बीच आपस में कोई डबल स्टैंडर्ड नहीं है। एक-दूसरे को उसी रूप में स्वीकारते हैं क्योंकि वैसे भी हम मनुष्य हैं, मशीन नहीं कि एक जैसे सब हो जाएं। मेरे लिए वह वैसा ही दोस्त रहा जैसे कि मेरे कुछ और दोस्त हैं और शायद उसकी ओर से भी यही बात रही।

 शायद हम दोनों को यह भी समझ है कि किसी संबंध में प्रगाढ़ता के लिए जरूरी नहीं कि रोज बातचीत की जाए या अक्सर मुलाकात की जाए, हां लेकिन संबंधों में विश्वास बनाए रखा जाए।

 आज यह बात इसलिए लिख रहा हूं क्योंकि कुछ दिन पहले किसी से संबंधों के बारे में चर्चा हो रही थी तो मैंने उसे यह उदाहरण दिया कि संबंध को निभाना होता है वह भी निष्काम भाव से और उसे अपेक्षाओं से जितना दूर रखो उतना बेहतर वह होगा। बस अपना आत्मसम्मान बनाए रखो और दूसरे को बराबरी का सम्मान देते रहो। संबंध कभी खराब नहीं होंगे।

 अब जतिन से मेरी आखिरी मुलाकात और बातचीत उसके विवाह पर हुई थी। छह माह से ज्यादा हो चुके हैं और उसके परिवार से उस दौरान मैं पहली बार मिला था। पहली बार में उन्होंने जो सम्मान और आदर दिया बस इस दोस्ती में वह काफी है।

 अब यह दो रूपये का प्लेटफाॅर्म टिकट सरकार ने भले दस रूपये का कर दिया हो लेकिन उसकी वजह से जतिन की अच्छी दोस्ती फिलहाल मेरे पास है और दुआ है कि आगे भी बनी रहेगी। बाकी देखते हैं कि अब अगली मुलाकात कब होती है।