शनिवार, 14 मई 2016

बारिश में प्यार का खुमार..


कनखियों से देख-देख कर हम,
एक दूसरे के लिए जिंदा थे,

बारिश के मौसम में,
रोज एक दूसरे को देखने,
हम हो जाते बेताब थे,

पहली बारिश के बाद दूसरी,
फिर तीसरी, चौथी और,
बस इंतजार रहता,बारिश हो,
छत-छज्जे जहाँ भी हों,
बस किसी तरह दीदार हो,

दिल की बातें ज़ुबाँ पर आएँ,
उनकी नज़रों से गुलजार अब,
मेरा मन,छत-छज्जा सब था,

इल्म नहीं रहता कई बार,
कि क्या कर रहे होते,
कहाँ जाना है कहाँ चले जाते,

फिर एक दिन,बारिश की बूँदों के बीच,
उसने कुछ कहना चाहा,
पर मैं उसे सुन न पाया,

इन निगाहों से मैं,
उसे निहारता रहा,
जब मैं समझा उसकी बात,
तो बस आगे क्या कहूँ,
चलो उसे फिर कभी कहता हूँ...


यह मेरी पिछली कविता पहली बारिश का एहसास का दूसरा भाग है..

नोट- इस कविता को फेसबुक पर पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें- Facebook Link

रविवार, 8 मई 2016

दिल छीछालेदर, फेंक जूता लेदर


 ये बॉलीवुड फिल्म "गैंग्स ऑफ वासेपुर" का एक गाना है जिसके शब्दों को मैंने बस थोड़ा इधर-उधर करके लिखा है। अब लिखूं भी क्यूँ नहीं, हम सब अब इसी काम में तो लगे पड़े हैं, एक-दूसरे की छीछालेदर करने और आपस में एक-दूसरे पर जूता उछालने में।

  हाल के दिनों में आप ज़रा नज़र दौड़ाएं तो आपको समझ आएगा कि हम कहाँ जा रहे हैं। वैसे मुझे कहने का हक़ नहीं है लेकिन फिर भी गौर करें कि राजनीतिक जीवन का हमारे निजी जीवन में कितना अतिक्रमण हो गया है। आम तौर पर राजनीति और निजी जीवन के बीच एक तटस्था रहनी चाहिए लेकिन पिछले कुछ सालोंं में हम नितांत राजनीतिक हो गए हैं और समाज के परिदृश्य से ये ज्यादा अच्छा नहीं है। 

 हालाँकि ये मेरा निजी मत हो सकता है कि इस तरह हमारा राजनीतिक होते चले जाना या यूँ कहूं कि राजनीति में पगलाए जाना सामाजिक जीवन को गर्त में ले जाने वाला है वंही कुछ लोग इसे लोकतंत्र की मजबूती मान सकते हैं।

 लोकतंत्र में लोग किसी एक पार्टी के समर्थक या किसी दूसरी पार्टी के विरोधी होते रहे हैं लेकिन आप देखें इस जमात में "भक्त" एक नया शब्द आया है। भक्त कहना हमारे लोए थोड़ा सुविधाजनक है क्योंकि भारत में आपको इनके अनगिनत प्रकार मिलेंगे जिनमें राजनीतिक भक्त भी शामिल रहे हैं लेकिन आजकल इसका चलन थोड़ा ज्यादा हो गया है।

 लेकिन अब इस जमात का काम तर्कों और कुतर्कों पर बहस करने तक सीमित नहीं रहा बल्कि अब ये एक दूसरे की छीछालेदर और जूता फिंकाई का काम करने पर ही अपना ध्यान लगाते हैं। इसके दो फायदे हैं नेता-अभिनेता का प्रचार हो न हो इनकी साख जरूर बढ़ जाती है।

 अब इसे ज़रा ऐसे समझें कि जब स्मृति ईरानी की शिक्षा पर प्रश्न खड़ा हुआ तो हमने राहुल गांधी, तोमर इत्यादि सबकी शिक्षा पर प्रश्न खड़े कर दिए। मतलब सनम हम तो डूबेंगे ही लेकिन साथ तेरा वहां भी ना छोड़ेंगे। फिर वो चाहे बाद में गिरिराज सिंह, कठेरिया और भी ना जाने कितने नाम आये लेकिन हमारी कोशिश अपना दामन बचाने से ज्यादा दूसरे का गन्दा करने की रही।

 जनाब हम कब कह रहे हैं कि हमे पढ़े-लिखे नेता की जरुरत है क्योंकि मनमोहन सिंह पढ़े-लिखे हैं और हमने उनकी सरकार देखी है। इसके अलावा लालू यादव कथित तौर पर नहीं पढ़ें हैं, हमने उनकी भी सरकार देखी है तो नेता की पढ़ाई से भारतीयों को उतना फर्क नहीं पड़ता।

 पड़ेगा भी कैसे, हम तो अभी तक सामाजिक तौर पर बच्चों की पढ़ाई की जद्दोजहद में व्यस्त हैं। हम उन्हें पढ़ाई में लगाएं या कमाई में , बेटों को पढ़ाएं या बेटियों को हम इसी में पिसे जा रहे हैं तो भला नेताओं की पढ़ाई का हम क्या आचार डालेंगे ?

 माना कि आप पढ़े नहीं हैं तो फिर शर्माना कैसा? भैया दुनिया में ऐसे बहुत से लोग हैं जिन्होंने बिना पढ़े ही बड़े काम किये हैं।  एडिसन, सचिन तेंदुलकर ऐसे ही नाम हैं। तो आप शरमाते क्यों हैं बल्कि आप कुछ ऐसा सकारात्मक क्यों नहीं करते कि लोगों के सामने मिसाल पेश की जा सके कि देखो बिना पढ़ा-लिखा इंसान भी कमाल कर सकता है।

 जनाब तकलीफ आपके गैर पढ़े-लिखे होने से किसी को कहाँ है समस्या तो आपके दोगलेपन से है जो सामने कुछ बात करते हैं और पीठ पीछे कुछ। यही हाल आपने "भारत माता की जय" के नारे का भी किया।

 खैर राजनीति में ये जूता फिंकाई होती रही है वो बात और है कि मम्मी-पापा ने बचपन में ही बता दिया था कि "आजकल जमाना बड़ा ख़राब है" नहीं तो हम इसे ही ज़माने का सच मान बैठते।


लेकिन अब हम एक नए तरह की छीछालेदर बॉलीवुड में भी देख रहे हैं। मान लो कि कंगना-ऋतिक का प्रेम प्रसंग रहा और ये खबर लीक भी हो गयी लेकिन उसके बाद क्या..? हम और वो दोनों भी एक दूसरे की छीछालेदर करने उतर आये फिर बीच में सुमन-सुत भी कूद पड़े।

 आप इस बात को छोड़ दीजिये, हमने तो रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन के "अंधों में काना राजा" वाली बात तक की छीछालेदर की जबकि उन्होंने सिर्फ एक मुहावरे का प्रयोग करके यथास्थिति बताने की कोशिश की थी। वो तो भले मानुष ठहरे राजन साहब जो माफ़ी मांग ली वरना लोग उनके बयां के साथ-साथ उनकी भी छीछालेदर करना जल्दी ही शुरू कर देते।

 अब ज़रा इसे गौर से समझें कि ऐसा क्यों हुआ? क्योंकि हम वास्तव में नितांत राजनीतिक होते जा रहे हैं और हमारा अब हमने छीछालेदर को प्रचार बना दिया है। पहले हम कीचड़ मुंह पर लगने पर साफ़ कर लेते थे लेकिंन अब साफ़-सफाई तो हम झाड़ू की फोटो के साथ करते हैं हाँ लेकिन कीचड़ हाथ में लेकर दूसरे पर उसी समय फेंक देते हैं।

 इसलिए तो मैंने शुरुआत में ही कहा कि हमारा समाज "एक दूसरे की दिल से छीछालेदर" और "फेक लेदर का जूता नहीं" बल्कि "फेंक जूता लेदर" की ओर बढ़ रहा है। गौर से देखिये अपने आस-पास जो राजनीति के नाम पर हो रहा है वो क्या वाकई राजनीति है या बस हमने छीछालेदर को ही राजनीति बना दिया है या जिस समाज की ओर हम बढ़ रहे हैं वो अच्छा समाज है या नहीं, ये हमें सोचना होगा।

 बाकि आप जावेद अख्तर साहब का संसद का आखिरी भाषण सुनिए एवं समझिए और "भक्तों" को ढिंढोरा पीटने दीजिये क्योंकि वो इसी काम में माहिर हैं।

राज्यसभा टीवी के यूट्यूब चैनल से साभार 

मंगलवार, 3 मई 2016

पहली बारिश का एहसास..


आज की बारिश ने पहली बारिश के
अहसास को ताज़ा कर दिया..
मैं खड़ा था छत पर
कि तभी नज़र वो आई..
बारिश का मौसम इतना सुहाना
पहले कभी नहीं लगा..

अब छत से भागे हम उसके पीछे
पर वो फुरफुरा रही थी,काँप रही थी..
जब वैसे में उसने मुझे देखा..
तो वो सहम गयी..
अपने परों को समेटकर..
टकटकी निगाहों से मुझे देखने लगी..

मैं भी उसके पास जाने को बेताब था..
तभी एक हवा के झोंके ने उसे..
फिर मोहिनी रूप दे दिया..
और मैं अपने को रोक न सका..

चला उसको अपनी बाहों में बांधने..
उसे अपने आकंठ से लगाने..
उसका आलिंगन करने..

बारिश में उसका अधर रस..
पीने को मैं लालायित..

किन्तु जैसे ही मैं उसके नज़दीक पंहुचा..
वो शर्मा गयी..
और छिपा के आँचल में अपना मुखड़ा..
चली गयी घर के अन्दर..

फिर छज्जे पर वो खड़ी हो गयी.
तब से शुरू हुआ एक नया अध्याय..
मेरा और उसका खिडकियों से झाँकता..
प्रेमगान..!! 


नोट - इस कड़ी में दो और कविताएं लिखी हैं जिन्हें आगे साझा करूँगा. ( It is a poetry trilogy.)
फेसबुक पर इस लिंक के माध्यम से पढ़ सकते हैं- Facebook Link