मंगलवार, 24 मई 2016

सैर सुबह की : हुमायूँ का मकबरा

हुमायूँ का मकबरा
ये बात उसी दिन की है जब मैं और मनीष सुबह की सैर पर हुमायूँ का मकबरा देखने गए थे। सबसे पहले हमने ईसा खान का मकबरा देखा था जिसके बारे में मैंने पहले लिखा है। ईसा खान का मकबरा देखने के बाद हमने मुख्य इमारत की ओर अपना मार्ग प्रशस्त किया।
अरब की सराय में जाने वाला दरवाजा

 जैसे ही हम आगे बढ़े हमारे पीछे वो तीन लड़के भी आ गए जो अपने संभवतः नए-नवेले डीएसएलआर कैमरे से ईसा खान के मकबरे में खेल रहे थे। मनीष उनसे पहले ही खीझ चुका था इसलिए हम अरब की सराय की ओर मुड़ गए।

 अरब की सराय के बारे में ज्यादा कुछ खास जानकारी तो हमें हासिल नहीं हो पायी लेकिन इतना पता चला कि इसका निर्माण हुमायूँ के मकबरे का निर्माण करने वाले मजदूरों के रहने के लिए कराया गया था। इसी से लगी अफ़सर की मस्ज़िद पर हम थोड़ी देर रुके और कई फोटो लिए।

अफ़सर की मस्ज़िद के पास योग करती महिलाएं
 हुमायूँ के मकबरे का परिसर वहां आस-पास रहने वाले लोगों के लिए खुला है इसलिए सुबह के समय लोग कसरत करते, योग करते हुए आपको इस परिसर में यहाँ-वहाँ दिख जाएंगे। हमें भी अफ़सर की मस्जिद से लगे हुए अफ़सर के मकबरे के आगे दो युवतियां योगाभ्यास करते हुए नज़र आयीं। पता नहीं क्यों हम दोनों को वहां घूमता देख वो थोड़ी देर के लिए रूक गईं। शायद हम दोनों अकेले लड़के थे इसलिए या लड़कों के बारे में हमारे समाज की लड़कियों के मन में जिस तरह का असुरक्षा का भाव व्याप्त है उस वजह से लेकिन वो थोड़ी देर तक बिलकुल शांत रही। जब उन्हें लगा कि हमसे उन्हें कोई हानि नहीं होगी तो वो फिर से अपने योगाभ्यास में व्यस्त हो गईं।

मकबरे के मुख्य द्वार का एक दृश्य
 इसके बाद अंततः हम मुख्य परिसर की ओर चल दिए और अब तक वो तीन लड़के भी हमसे दूर हो चले थे जिनकी वजह से विशेष तौर पर मनीष परेशान था। मैं तो हुमायूँ के मकबरे को तीसरी बार देखने आया था लेकिन मनीष के लिए यह अनुभव नया था क्योंकि वो पहली बार यहाँ आया था। इतनी बड़ी इमारत देख के उसे कैसा लगा ये तो वही जाने लेकिन मुझे इस इमारत की जो बात सबसे पसंद है वो है इसकी तकनीक।

 आज जैसे अत्याधुनिक साधनोंं के बिना इतनी बड़ी इमारत की परिकल्पना और उसमें भी ख़ूबसूरती को पिरोना अपने आप में अभूतपूर्व है। मैं तो इतिहास का विद्यार्थी रहा हूँ तो मेरी दिलचस्पी शुरू से ऐसी इमारतों में रही है। भले ही आजकल तथाकथित बुद्धिजीवी इन्हें सामंतवाद या निरंकुशता का प्रतीक मानते हों लेकिन कल्पना कीजिये कि ये प्रतीक नहीं होते तो फिर हमारे पास इतिहास के नाम पर होता क्या ?

गुम्बद के अंदर का नज़ारा,
साथ में लटकता झाड़फानूस
 खैर यहाँ ये चर्चा का विषय नहीं है, मैं बात कर रहा था हुमायूँ के मकबरे की। इस मकबरे की सबसे बड़ी खासियत जो मुझे लगती है वो है इसका गुम्बद क्योंकि ये मुख्य इमारत की मूल पहचान है और इसे साधने में जो तकनीक इस्तेमाल की गयी है वो काबिले तारीफ है। बचपन में हम पढ़ा करते थे कि यदि किसी वस्तु के भार को विभिन्न भागों में बाँट दिया जाये तो उसे साधना आसान हो जाता है ठीक वैसे ही जैसे किसी बड़े पत्थर को हटाने के लिए हम एक बांस का प्रयोग कर खुद की मेहनत कम कर लेते थे और उसका भार उस बांस पर डाल दिया करते थे। अब ये नियम कौन सा है वो मुझे याद नहीं लेकिन इस इमारत में भी गुम्बद के वजन को इसके आस-पास की दीवारों पर डाल दिया गया है तभी तो कई फुट ऊंचे प्लेटफॉर्म पर स्थित होने के बावजूद ये गुम्बद अटल खड़ा है।

झरोखा
 हुमायूँ के मकबरे की एक और खास बात इसमें प्रयोग की गयी जालियां हैं जो बाद में मुग़लकाल की लगभग हर इमारत में नज़र आती हैं और सलीम चिश्ती की दरगाह (फतेहपुर सीकरी) में संगमरमर में ढलकर इसका अनोखा स्वरूप उभर के आता है। मुग़लकाल की 'बादशाह का झरोखा दर्शन' परंपरा में भी इन जालियों का अहम योगदान है। इस इमारत में झरोखे की अहमियत मुझे इसलिए ज्यादा नज़र आती है क्योंकि ईमारत को ठंडा, हवादार और प्रकाशमान बनाए रखने में इसी का सर्वाधिक योगदान है। हर तरफ से और हर समय की सूर्य की रोशनी मुख्य इमारत के बीच बनी हुमायूँ की कब्र तक पहुंचाने का बंदोबस्त ये झरोखे ही करते हैं।


नहर-ए-बहिश्त
 इसके पीछे एक वजह ये भी कि दरअसल इस इमारत को जन्नत का स्वरूप देने की कोशिश की गयी है और बादशाह को परवरदिगार के बराबर का दर्ज दिया गया है। इसलिए इसमें चारबाग शैली के बीच में मुख्य इमारत बनायी गयी है। चारों बागों को एक नहर विभाजित करती है जो दिल्ली के लाल किले की नहर-ए-बहिश्त की तरह है और जिसकी तस्दीक ताजमहल में भी होती है। कब्र का प्रतीक जमीन से ऊपर बनाया गया है जो अल्लाह के हमसे ऊपर होने का संकेत देता है। उस कक्ष में भरपूर रोशनी, उसकी दुनिया में उजियारे का स्वरूप है और विस्मय से भर देने वाली इसकी भव्यता अल्लाह की अभूतपूर्व छवि का निर्माण करने के लिए हैं जिसके बराबर यहाँ बादशाह को दर्जा दिया गया है।

 असल में यह विशेषताएं मुग़लकाल की सभी इमारतों का मूल स्रोत है जिसकी परिणति आगरा के ताजमहल में जाकर होती है। वहां पर अल्लाह का स्वरुप और सौम्य रूप में सामने आता है और जन्नत का भव्यतम दृश्य भी दृष्टिगोचर होता है क्योंकि वह  इमारत पूरी तरह सफ़ेद संगमरमर से बनी है। 

नाई का मकबरा
 इसी इमारत में एक नाई का मकबरा भी है जिसके बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है लेकिन हाँ मनीष इसे देखकर बहुत खुश हुआ और अंततः उसने एक फोटो तो इस मकबरे के साथ खिचवाई वरना इस पूरी सैर के दौरान मैं ही मॉडलिंग करता रहा। मनीष के यहाँ पहुंचकर खुश होने की वजह शायद यहां पसरी वो छाँव थी जो उस धूप के मौसम की दरकार थी या वहां उठता वो धुआं जिसकी मनमोहक महक ने उसके मन को आबाद किया, लेकिन ये सिर्फ मेरा आकलन है असल बात तो वही जानता होगा। 

 तो गर्मियां बीतने दें और एक छोटी-सी सैर आप भी कर आएं इस खूबियों से भरी ऐतिहासिकता की।







हुमायूँ के मकबरे का स्मरणीय दृश्य

NOTE-All Picture Courtesy-Manish Sain

शनिवार, 14 मई 2016

बारिश में प्यार का खुमार..


कनखियों से देख-देख कर हम,
एक दूसरे के लिए जिंदा थे,

बारिश के मौसम में,
रोज एक दूसरे को देखने,
हम हो जाते बेताब थे,

पहली बारिश के बाद दूसरी,
फिर तीसरी, चौथी और,
बस इंतजार रहता,बारिश हो,
छत-छज्जे जहाँ भी हों,
बस किसी तरह दीदार हो,

दिल की बातें ज़ुबाँ पर आएँ,
उनकी नज़रों से गुलजार अब,
मेरा मन,छत-छज्जा सब था,

इल्म नहीं रहता कई बार,
कि क्या कर रहे होते,
कहाँ जाना है कहाँ चले जाते,

फिर एक दिन,बारिश की बूँदों के बीच,
उसने कुछ कहना चाहा,
पर मैं उसे सुन न पाया,

इन निगाहों से मैं,
उसे निहारता रहा,
जब मैं समझा उसकी बात,
तो बस आगे क्या कहूँ,
चलो उसे फिर कभी कहता हूँ...


यह मेरी पिछली कविता पहली बारिश का एहसास का दूसरा भाग है..

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रविवार, 8 मई 2016

दिल छीछालेदर, फेंक जूता लेदर


 ये बॉलीवुड फिल्म "गैंग्स ऑफ वासेपुर" का एक गाना है जिसके शब्दों को मैंने बस थोड़ा इधर-उधर करके लिखा है। अब लिखूं भी क्यूँ नहीं, हम सब अब इसी काम में तो लगे पड़े हैं, एक-दूसरे की छीछालेदर करने और आपस में एक-दूसरे पर जूता उछालने में।

  हाल के दिनों में आप ज़रा नज़र दौड़ाएं तो आपको समझ आएगा कि हम कहाँ जा रहे हैं। वैसे मुझे कहने का हक़ नहीं है लेकिन फिर भी गौर करें कि राजनीतिक जीवन का हमारे निजी जीवन में कितना अतिक्रमण हो गया है। आम तौर पर राजनीति और निजी जीवन के बीच एक तटस्था रहनी चाहिए लेकिन पिछले कुछ सालोंं में हम नितांत राजनीतिक हो गए हैं और समाज के परिदृश्य से ये ज्यादा अच्छा नहीं है। 

 हालाँकि ये मेरा निजी मत हो सकता है कि इस तरह हमारा राजनीतिक होते चले जाना या यूँ कहूं कि राजनीति में पगलाए जाना सामाजिक जीवन को गर्त में ले जाने वाला है वंही कुछ लोग इसे लोकतंत्र की मजबूती मान सकते हैं।

 लोकतंत्र में लोग किसी एक पार्टी के समर्थक या किसी दूसरी पार्टी के विरोधी होते रहे हैं लेकिन आप देखें इस जमात में "भक्त" एक नया शब्द आया है। भक्त कहना हमारे लोए थोड़ा सुविधाजनक है क्योंकि भारत में आपको इनके अनगिनत प्रकार मिलेंगे जिनमें राजनीतिक भक्त भी शामिल रहे हैं लेकिन आजकल इसका चलन थोड़ा ज्यादा हो गया है।

 लेकिन अब इस जमात का काम तर्कों और कुतर्कों पर बहस करने तक सीमित नहीं रहा बल्कि अब ये एक दूसरे की छीछालेदर और जूता फिंकाई का काम करने पर ही अपना ध्यान लगाते हैं। इसके दो फायदे हैं नेता-अभिनेता का प्रचार हो न हो इनकी साख जरूर बढ़ जाती है।

 अब इसे ज़रा ऐसे समझें कि जब स्मृति ईरानी की शिक्षा पर प्रश्न खड़ा हुआ तो हमने राहुल गांधी, तोमर इत्यादि सबकी शिक्षा पर प्रश्न खड़े कर दिए। मतलब सनम हम तो डूबेंगे ही लेकिन साथ तेरा वहां भी ना छोड़ेंगे। फिर वो चाहे बाद में गिरिराज सिंह, कठेरिया और भी ना जाने कितने नाम आये लेकिन हमारी कोशिश अपना दामन बचाने से ज्यादा दूसरे का गन्दा करने की रही।

 जनाब हम कब कह रहे हैं कि हमे पढ़े-लिखे नेता की जरुरत है क्योंकि मनमोहन सिंह पढ़े-लिखे हैं और हमने उनकी सरकार देखी है। इसके अलावा लालू यादव कथित तौर पर नहीं पढ़ें हैं, हमने उनकी भी सरकार देखी है तो नेता की पढ़ाई से भारतीयों को उतना फर्क नहीं पड़ता।

 पड़ेगा भी कैसे, हम तो अभी तक सामाजिक तौर पर बच्चों की पढ़ाई की जद्दोजहद में व्यस्त हैं। हम उन्हें पढ़ाई में लगाएं या कमाई में , बेटों को पढ़ाएं या बेटियों को हम इसी में पिसे जा रहे हैं तो भला नेताओं की पढ़ाई का हम क्या आचार डालेंगे ?

 माना कि आप पढ़े नहीं हैं तो फिर शर्माना कैसा? भैया दुनिया में ऐसे बहुत से लोग हैं जिन्होंने बिना पढ़े ही बड़े काम किये हैं।  एडिसन, सचिन तेंदुलकर ऐसे ही नाम हैं। तो आप शरमाते क्यों हैं बल्कि आप कुछ ऐसा सकारात्मक क्यों नहीं करते कि लोगों के सामने मिसाल पेश की जा सके कि देखो बिना पढ़ा-लिखा इंसान भी कमाल कर सकता है।

 जनाब तकलीफ आपके गैर पढ़े-लिखे होने से किसी को कहाँ है समस्या तो आपके दोगलेपन से है जो सामने कुछ बात करते हैं और पीठ पीछे कुछ। यही हाल आपने "भारत माता की जय" के नारे का भी किया।

 खैर राजनीति में ये जूता फिंकाई होती रही है वो बात और है कि मम्मी-पापा ने बचपन में ही बता दिया था कि "आजकल जमाना बड़ा ख़राब है" नहीं तो हम इसे ही ज़माने का सच मान बैठते।


लेकिन अब हम एक नए तरह की छीछालेदर बॉलीवुड में भी देख रहे हैं। मान लो कि कंगना-ऋतिक का प्रेम प्रसंग रहा और ये खबर लीक भी हो गयी लेकिन उसके बाद क्या..? हम और वो दोनों भी एक दूसरे की छीछालेदर करने उतर आये फिर बीच में सुमन-सुत भी कूद पड़े।

 आप इस बात को छोड़ दीजिये, हमने तो रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन के "अंधों में काना राजा" वाली बात तक की छीछालेदर की जबकि उन्होंने सिर्फ एक मुहावरे का प्रयोग करके यथास्थिति बताने की कोशिश की थी। वो तो भले मानुष ठहरे राजन साहब जो माफ़ी मांग ली वरना लोग उनके बयां के साथ-साथ उनकी भी छीछालेदर करना जल्दी ही शुरू कर देते।

 अब ज़रा इसे गौर से समझें कि ऐसा क्यों हुआ? क्योंकि हम वास्तव में नितांत राजनीतिक होते जा रहे हैं और हमारा अब हमने छीछालेदर को प्रचार बना दिया है। पहले हम कीचड़ मुंह पर लगने पर साफ़ कर लेते थे लेकिंन अब साफ़-सफाई तो हम झाड़ू की फोटो के साथ करते हैं हाँ लेकिन कीचड़ हाथ में लेकर दूसरे पर उसी समय फेंक देते हैं।

 इसलिए तो मैंने शुरुआत में ही कहा कि हमारा समाज "एक दूसरे की दिल से छीछालेदर" और "फेक लेदर का जूता नहीं" बल्कि "फेंक जूता लेदर" की ओर बढ़ रहा है। गौर से देखिये अपने आस-पास जो राजनीति के नाम पर हो रहा है वो क्या वाकई राजनीति है या बस हमने छीछालेदर को ही राजनीति बना दिया है या जिस समाज की ओर हम बढ़ रहे हैं वो अच्छा समाज है या नहीं, ये हमें सोचना होगा।

 बाकि आप जावेद अख्तर साहब का संसद का आखिरी भाषण सुनिए एवं समझिए और "भक्तों" को ढिंढोरा पीटने दीजिये क्योंकि वो इसी काम में माहिर हैं।

राज्यसभा टीवी के यूट्यूब चैनल से साभार